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लेखक की रचनाएँ

जीत या हार (उपन्यास )

भारत और संसार

भारत की सुरक्षा

भारत की विदेश नीति एवं अन्य समस्याएँ भारत में लोकतन्‍्त्र

भारतीयकरण

हिन्दू राष्ट्र

भारतीय जनसंघ एक राष्ट्रीय मंच

डॉ० श्यामाप्रसाद मुखर्जी (जीवनी )

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हिन्दू राष्ट्र

( एक ऐतिहासिक विवेचन )

बलराज मधोक

भारती साहित्य सदन, नई दिल्‍ली-१

प्रकाशक वितरक

संस्करण

मूल्य मुद्रक

भारती साहित्य सदन

भारती साहित्य सदन सेल्स,

३०/६० कनाट सरकस, नई दिलली-१

प्रथम १६५८

द्वितीय १६६८

तृतीय १६७१

दो रुपये

एन० एल० ऐण्ड एल० एन० कम्पोजिंग ए्जेन्सी द्वारा

अजय प्रिंटर्स, नवीन शाहंदरा, दिल्‍्ली-३२

प्रावककथन

यह राष्ट्रीयगा का युग है। संसार के सभी देशों में राष्ट्र भावना अन्य सभी भावनाशरं पर हावी हो रही है। संसार के मजदूरों, एक हो जा्रो' की रट लगाने वाले कम्युनिस्ट देश भी राष्ट्रीयता के प्रभाव से अ्रछते नहीं रहे कम्युनिस्ट रूस और कम्युनिस्ट चीन का संघर्ष मुख्य- तया दो राष्ट्रीयताश्रों का संघर्ष है, जिसने उनकी कम्युनिज़्म-जनक एकता को छिन्न-विच्छिन्न करके रख दिया है

राष्ट्रीयता के आधारों के सम्बन्ध में भी सर्व दूर मतंक्‍्य है। देश की भूमि श्रौर उसकी संस्कृति, परम्परा, इतिहास भ्रौर महापुरुषों के प्रति सर्वोपरि आस्था राष्ट्रीय भावनाओ्रों का मूल भ्राधार माना गया है। विभिन्‍न प्रकार की विभिन्‍नताझ्रों के बावजूद लगभग सभी देशों के सभी लोगों श्रौर दलों में इसके सम्बन्ध में मतभेद नहीं है। हमारी राष्ट्रीयता क्या है श्रौर इसके स्रोत क्‍या हैं, यह कहीं भी विवाद का विषय नहीं है

' परन्तु भारत एक ऐसा श्रभागा देश है, जिसमें इस मूलभूत प्रश्न पर भी मतभेद विद्यमान है। कांग्रेस तथा कांग्रेस से निकले हुए विभिन्‍न राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीयता को एक ऐसा विकृत रूप देने का प्रयत्न कर रहे हैं जो भारत की एकता के लिये घातक सिद्ध हो सकता है। १६९४७ का देश-विभाजन भी मुख्यतया भारतीय राष्ट्रीयता के गलत निरूपण भौर उसके मूल ख्रोतों के प्रति दुर्लेक्ष्य करने का ही परिणाम था। उससे कुछ पाठ सीखने के स्थान पर, कांग्रेस दल ने प्रपने दलगत स्वार्थों के लिये उन्हीं गलत परम्पराञ्रों और नीतियों को तये नाम देकर जारी रखा। वयस्क मताधिकार के ग्राधार पर लोकतंत्र को प्पनाने से

विघटनकारी नीतियों को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक था लोकतंत्र की यह एक बुनियादी कमजोरी है कि विभिन्‍न दल और प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिये क्षेत्रीय, जातीय श्रथवा ग्रन्य भावनाश्रों को उभार कर सामूहिक मत प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। लोकतंत्र के इस विघटनात्मक प्रभाव की काट विशुद्ध और प्रबल राष्ट्र भावना होती है जो कि राष्ट्रीय हितों को विभिन्‍न दलीय, क्षेत्रीय, जातीय अथवा वर्गीय स्वार्थों से ऊपर मानने और रखने की प्रेरणा देती है यही कारण है कि संसार के सभी लोक- तंत्रीय देशों में राष्ट्रीयता की भावना को दृढ़ करने के लिये विशेष प्रयत्न किये जाते हैं प्रबल राष्ट्रीयता और परम्पराओं के प्रति अनुराग लोकतंत्र की सफलता और लोकतंत्रीय देशों की एकता बनाये रखने के लिये श्रति आवश्यक है

स्वतन्त्र भारत ने लोकतंत्र को तो अपना लिया परन्तु इसके विघटन- कारी परिभाषाझ्रों से देश को बचाने के लिये श्रावश्यक राष्ट्र भावना को जगाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया परिणामस्वरूप, राष्ट्रीयता की गलत धारणा के कारण तथाकथित भारतीय राष्ट्रीयवा भी विघटन की पोषक बन गई

कम्युनिस्ट चीन और पाकिस्तान के आझ्राक्रमणों के समय क्षणिक रूप में विशुद्ध राष्ट्र भावना जगी, परन्तु उससे कांग्रेस और उसके पृष्ठ-पोषकों को भय लगने लगा। उन्होंने उस राष्ट्र भावना को सुदृढ़ और स्थायी बनाने के स्थान पर उसे यथाशी क्र दबाने का ही प्रयत्न किया

फलस्वरूप राष्ट्रीयता की भावना लगातार कमजोर होती जा रही है इसका लाभ उठाकर विघटनकारी शक्तियों श्रौर तत्त्वों की गति- विधियाँ लगातार तेज होती जा रही हैं। शासन की गलत नीतियाँ और चुनावों की विवशताओं के कारण ऐसे तत्त्वों को देश के अ्रन्दर भौर बाहर से प्रभावी समर्थन मिलने लगा है। उनका झापस में गठजोड़ हो रहा है पाक-परस्त और चीन-परस्त तत्त्व तो घी-शक्कर हो चुके हैं भर भव मास्को-परस्त कम्युनिस्ट भी उनके गठजोड़ में शामिल हो रहे हैं

हक जीवन-शक्ति के रुप में राष्ट्रीयता के पुनविवेचन को आ्रावश्यकता

राष्ट्रीयता व्यक्ति को अपने राष्ट्र के लिए उच्चकोटि के शौय तथा बलिदान की प्रेरणा देने वाली सामूहिक भावना की एक ऐसी उच्चतम अभिव्यक्ति है जिसका संसार के इतिहास-निर्माण में बहुत बड़ा हाथ है विशेषतया फ्रांस की क्रान्ति, जिसको श्राज के यूरोप में उदारबाद तथा राष्ट्रवाद का जनक कहा जाता है, के समय से तो राष्ट्रीयवा की भावना का प्रभाव इतिहास पर बढ़ गया है। पिछली दो सदियों में इसने संसार में युद्ध श्रर शान्ति करने का तथा समान एवं विपरीत राष्ट्रीयता रखने वाले जन-समूहों देशों के एकीकरण भ्रथवा विघटन के मुख्य कारण भ्रौर प्रेरक बनने का काम किया है

किन्तु यह सोचना नितान्‍्त भ्रमपूर्ण होगा कि राष्ट्रीयता की भ्रनुभूति _अ्रभी कुछ शताब्दी पहले से ही होने लगी है भौर इससे हमारे पूर्वज सवंथा अनभिन्न थे | सामूहिक भावना मानव का स्वभाव है। प्रारम्भ से ही इसने मनुष्य के राजनीतिक और सामाजिक विकास में एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम किया है | सृष्टि के प्रारम्भ से ही सामाजिकता सामूहिक जीवन का मूल रही है। मनुष्य की भ्रावश्यकताएँ भी इसके पनपने में सहायक रही हैं। परिवार, जाति, उपजाति तथा घर, गाँव, जनपद और देश, मानवीय विकास के ही दो पहलू हैं। किन्तु इस विकास की उत्तरो-

१० हिन्दू राष्ट्र

त्तर वृद्धि के साथ-साथ मनुष्य की सामाजिक श्रनुभूति का क्षेत्र भी बढ़ता गया और अब भी वह निरन्तर बढ़ रहा है। आज स्थिति ऐसी है कि संसार के अधिकांश भागों में राष्ट्रीय इकाइयाँ व्यक्ति की निष्ठा पर सबसे ग्रधिक दावा रखने लगी हैं

प्रन्तर्राष्ट्रीयता राष्ट्रीयता का पूर्वाभास

सारे संसार की एक इकाई हो और सभी मनुप्य एक जाति-समूह

में गिने जाएँ, ये विचार सामूहिक चेतना की, एक बहुत ही ऊंची अवस्था है अन्तर्राष्ट्रीयाा के भाव तथा विश्व-संघ की स्थापना मनुष्य की स्वदेशीय स्वार्थ से ऊपर उठने की इच्छा को ही प्रकट करते हैं राष्ट्र- संघ ([,८820०० 0 'पि०॥5) तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ (0.)५.०0.) ज॑ंसे संघटन मनुष्य की इच्छा को ही कार्यरूप देने के माध्यम हैं। किन्तु इतने से ही यह नहीं समझा जा सकता कि अनन्‍्तर्राट्रीयता मनुष्यमात्र पर पूर्णतया व्याप्त हो गई है बल्कि यह तो अभी तक केवल उन थोड़े से शक्तिशाली पश्चिमी सत्ताग्नों का ही विषय है, जिन्हें राष्ट्रीयताजन्य सब लाभ सहज ही प्राप्त हैं किन्तु जब से वे अनुभव करने लगे हैं कि उनके अधीन देश भी अपने राष्ट्रीय श्रधिकारों के विषय में सजग हो गये हैं और इसकी वे जोरदार शब्दों में माँग करने लगे हैं, तब से उन शक्ति- शाली सत्ताओं की श्रन्तर्राद्रीयता की पुकार केवल उन अधीन देशों के जन्मसिद्ध अधिकारों की माँग को भुलावे में डालने का साधन बन रही है। इसीलिए वे अधीन अ्रथवा भ्रविकसित देश जहाँ श्रभी तक राष्ट्रीयता का विकास नहीं हो पाया है और जो इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं, इस ग्रन्तर्रष्टीयता को शंका की दृष्टि से देख रहे हैं। उनकी यह धारणा तकंसंगत ही है कि अन्तर्राष्ट्रीयवा का अ्रंकुर राष्ट्रीयता से प्रस्फुटित होता है। ग्रतः जिन राष्ट्रों की अ्रवस्था श्रभी प्रतिष्ठापूर्ण नहीं है, जहाँ सक्रिय राष्ट्रीयवा की भावना अभी नहीं जगी, वहाँ भ्रन्तर्राष्ट्रीयवा का राग फलदायक नहीं हो सकता संभवत: इसीलिए वर्तमान चीन के

जीवन-दक्ति के रूप में राष्ट्रीयवा के पुनविवेचन की श्रावश्यकता . ११

निर्माता स्वर्गीय डॉ० सनयात सेन ने चीन के तरुणों से यह माभिक भ्रपील की थी कि वे अन्तर्राष्ट्रीयीवा के इन नारों से प्रभावित हो जाएँ, जो पाइचात्य लोग चीन के दृढ़ीकरण श्रौर पुनर्निर्माण-कार्य से उनका ध्यान हटाने के लिए लगा रहे हैं। डॉ० सनयात सेन ने कहा था, “हमें यह समभ लेना चाहिए कि विश्वनागरिकता की उत्पत्ति राष्ट्रीया से ही हुई है यदि हम उसकी स्थापना करना चाहें तो हमें चाहिए कि पहले हम अपनी राष्ट्रीयता को सुदृढ़ बनाएँ। क्‍योंकि जब तक राष्ट्रीयता सुदृढ़ नहीं होगी तब तक अन्तर्राष्रीयता कभी पनप नहीं सकती राष्ट्रीयता का परित्याग कर विश्वनागरिकता का राग अलापने का तात्पये घोड़े के आगे गाड़ी जोड़ देने के समान ही होगा

साम्यवादो रूस में राष्ट्रीयता

राष्ट्रीयता में कितना सामथ्य है, देशभक्ति की भावना की प्रगति में इसका कितना महत्व है श्रौर देश के लिए स्वयं को बलिदान करने की भावना के उद्रेक में इसका कितना हाथ है, इसका सबसे उत्तम दृष्टान्त साम्यवादी रूस ने उपस्थित किया है। 'संसार के मज़दूरो ! एक हो जाग्रो' के अनुसरण में रूस के बोल्शेविकों ने समस्त संसार में क्रान्तिपूर्ण उत्तेजना उन्पन्न कर देने की प्रबल इच्छा के वशीभूत होकर राष्ट्रीयता का तिरस्कार कर जम॑नी श्ौर ब्रिटेन के मज़दूरों से अ्रपनी-भ्पनी राष्ट्रीय सरकारों के सामने सिर उठाने का आग्रह किया था। अपने देश के ग्रतीत की घटनाओं को उन्होंने मध्य श्रेणी का कल्पना-मात्र, तुच्छ श्रौर प्रतिक्रियावादी कह- कर निन्‍दा की थी बे चाहते थे कि रूसी अपने ग्रतीत एवं राष्ट्र भावना को भुलाकर भ्रन्तर्राष्ट्रीय क्रान्ति के भ्रग्दूत के रूप में सन्‌ १६१७ से भ्रपता नबीन इतिहास प्रारम्भ करें। उन्होंने रूस के महान्‌ योद्धा एलेक्जेण्डर नावेस्की, जो सातवीं सदी में देश के लिए आक्रमणकारियों से लड़ा, पीटर महान्‌ और कंथरिन, जिन्होंने रूस को उसकी वतंमान स्थिति तक पहुँचाने में बहुत योग दिया, राजकुमार सुजोनोब, जिसने नेपोलियन के विरुद्ध

१२ हिन्दू राष्ट्र

रूसी सेनाश्रों का नेतृत्व किया और श्रनेकों श्रन्य राजाओं तथा सेनापतियों तथा विद्वानों को रूस के कालिमापूर्ण अ्रतीत के प्रतिक्रियावादी प्रतिनिधि कहकर तिरस्कृत किया और चाहा कि रूस की जनता उस अतीत को एकदम ही भुला दे क्‍

किन्तु द्वितीय महायुद्ध के समय उसी रूस के साम्यवादी नेताश्रों ने यह अनुभव किया कि वे परिस्थितियों तथा समय की माँग के अनुसार केवल रोटी और “क्रान्ति' के साम्यवादी नारों से वहाँ के नवयुवकों को वीरता की प्रेरणा नहीं दे सकते इसके लिये उन्हें रूस के अ्रतीत गौरव तथा इतिहास की शरण लेकर, रूसी राष्ट्रीयता को पुनर्जागृत करना पड़ा जिन्हें श्रब तक उन्होंने प्रतिक्रियावादी कहकर उपेक्षित कर दिया था, उन्हें ही श्रब इन नेताओं ने आदर्श के रूप में सामने रखना प्रारम्भ किया एवं नवयुवकों से भ्रनुरोध किया कि वे भी उनसे प्रेरणा लें

इस नई नीति से रूस के प्रशंसक तथा ञ्रालोचक दोनों ही स्तम्भित रह गये इससे प्रभावित होकर मारिश हिन्दस ने श्रपनी पुस्तक “मदर रशिया' में लिखा--“सोबियतों के क्षेत्र में श्राने के पश्चात्‌ रूस वालों ने पहली बार स्वयं को अतीत के पन्‍नों पर इतनी अ्विराम गति और उत्साह से प्रतिबिम्बित कर उसे नए श्रर्थ और गौरव से विभूषित किया है'*'। यह सोवियतवाद का श्रत्यधिक विस्मयकारी सामाजिक दृश्य है। रूस में राष्ट्रीय भावना का यह पुनरुद्धार सोवियतवाद का सबसे अभ्रधिक विस्मय- जनक पहनुू है और हमारे युग में राष्ट्रीयया के बल का नवीनतम प्रमाण

है भारत में राष्ट्रीयवा की विफलता

किन्तु इसके बिल्कुल विपरीत गत लगभग साठ वर्षों से जिस राष्ट्रीया का भारत में प्रचार किया जा रहा है, वह भारत की श्नेकों युगों से चली रही भौगीलिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक एकता को सुरक्षित सुदृढ़ बनाने में बिल्कुल असमर्थ सिद्ध हुई। इतना ही

जीवन-शक्ति के रूप में राष्ट्रीयता के पुनविवेचन की श्रावश्यकता १३

नहीं बल्कि यह द्वि-राष्ट्रवादी सिद्धान्त, जो भारत की वास्तविक राष्ट्रीयता के लिए चुनौती था, के भ्राधार पर देश के विभाजन को भी रोक सकी

जहाँ एक ओर इटली झौर जमंनी सदश श्रनेकों भागों में विभक्त देशों को एकरूप करने में राष्ट्रीयता का प्रमुख भाग रहा है, वहाँ भारत में प्रचारित की जाने वाली राष्ट्रीयता ने एक देश को दो टुकड़ों में बंटवा दिया है। इसने सभी विचारशील व्यक्तियों को यह सोचने के लिए बाध्य कर दिया है कि, “हमारी राष्ट्रीयता में कौन-सी त्रुटि है ? यह भारतीयों में एकता की भावना जागृत करने में, जो राष्ट्रीया। का विशेष गण है, क्यों भ्रसफल रही है

स्वतन्त्र भारत के नेताश्रों तथा नवनिर्माताश्रों से श्राशा तो यही की जाती थी कि भारतीय राष्ट्रीयवा की इस असफलता के कारणों पर गहन विचार कर, वे इसकी छानबीन करेंगे और निश्चय करेंगे कि भारतीय राष्ट्रीयता का सुदृढ़ तथा वैज्ञानिक मूलाधार क्या होना चाहिये किन्तु दुर्भाग्य की बात तो यह है कि त्रुटियों के कारणों को जानकर उन्हें दूर करना तो श्रलग रहा, वे नेतागण भ्राज भी उसी राष्ट्रीयता का पृष्ठपोषण . कर रहे हैं, जिसने इस विशाल भारत को दो टुकड़ों में बाँट दिया इतना ही नहीं प्रत्युत श्रपनी उस तथाकथित राष्ट्रीया की भ्रसफलता का दोष प्ग्रेज़ों एवं साम्प्रदायिकतावादियों के सिर मढ़कर जनसाधारण के साथ- साथ स्वयं को भी धोखा दे रहे हैं। उनमें यह स्वीकार करने का नैतिक बल नहीं है कि भारतीय राष्ट्रीयता के प्रति उनका दृष्टिकोण मूल से ही गलत रहा है। सच्ची बात का सामना करने का सामथ्यं उनमें नहीं रहा है, इसलिए वे उन सभी का विरोध करने लगे हैं, जो निर्भीक होकर उनकी त्रूटिपूर्ण राष्ट्रीयीग का खंडन कर, इसके पुनविवेचन की माँग करते हैं। ग्रथता भ्पनी भ्रसफलताओों की भोर से लोगों का ध्यान बँटाने के लिए वे प्रन्तर्रष्ट्रीयता की भ्राड़ ले रहे हैं।

परिणाम-स्वरूप भारत की वह राष्ट्रीय चेतना, जो ब्रिटिश सरकार

१४ हिन्दू राष्ट्र

की विनाशकारी नीतियों के बावजूद भी जीवित रही, अब क्रमशः निर्बल होती जा रही है और सारे देश में विघटनकारी प्रवृत्तियाँ भयंकर रूप में प्रकट हो रही हैं। जातिवाद, साम्प्रदायिकता श्रौर प्रान्तीयता तथा अपने-अपने दलगत स्वार्थ राष्ट्रीयगा की ओट में देश की एकता को नष्ट कर रहे हैं। इस स्थिति ने जागरूक व्यक्तियों में भी उक्त राष्ट्रीयता के प्रति विरक्ति उन्पन्‍न कर दी है। अन्‍्तर्राष्रीयता में उन्हें एक प्रकार का बौद्धिक पलायन मिलता है वे या तो व्यक्तिवादी बनते जा रहे हैं या अ्न्तर्राट्रीयतावादी और जनता जातिवाद और प्रान्तीयता के दलदल में धंसती चली जा रही है

राष्ट्रीय एकता और दढ़ता के लिए संघर्ष रत भारत को इस परिस्थिति ने एक नये संकट में डाल दिया है। उसकी सुरक्षा और एकता ही नहीं बल्कि उसका अस्तित्वमात्र भी बाहरी तथा भीतरी विनाशकारी शक्तियों के चंगल में फंस गया है

इस परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए ग्रावश्यक है कि भारत को अपने एक-एक नागरिक की देश-भक्ति पर विश्वास हो। यह तभी सम्भव हो सकता है, जब सभी भारतीय स्वस्थ राष्ट्रीयता से श्रनुप्रेरित हो, अपने व्यक्तिगत, दलगत, स्वार्थों तथा साम्प्रदायिकता एवं प्रान्तीयता से ऊपर उठकर भारत के सामूहिक हितों की रक्षा के लिए कटिबद्ध हो जाएँ।

भारतीय राष्ट्रीयता में यह बल पैदा करने के लिए भारतीय राष्ट्रीयता का वेज्ञानिक भ्रध्ययन कर, इसके मूल स्रोत को समभने श्र इसकी वर्तमान विफलता के कारणों को जानने की आवश्यकता है। इसके बिना

भारतीय राष्ट्रीयता को राष्ट्रएक्ता का सशक्त साधन नहीं बनाया जा सकता

र्‌ राष्ट्रीयता के मुल भ्राधार

राष्ट्रीयता के वास्तविक भ्राधार को स्थिर करने के लिए झ्राज निम्न बातों पर विचार करना नितान्‍्त आ्रावश्यक है---

राष्ट्रीयाग की कल्पना, जनसम्‌ह में राष्ट्रीय भावना उत्पन्न करने वाले कारणों एवं शक्तियों का परिज्ञान, राष्ट्रीयता की उत्पत्ति और उसका विकास, भारतीय राष्ट्रीयवा की वर्तमान गतिविधि का सृक्ष्म भ्रवलोकन तथा इसकी अ्रसफलता के कारणों का विवेचन

राष्ट्त्व की परिभाषा

राष्ट्र और राष्ट्रीयता के विषय में संद्धान्तिक चर्चा उस समय प्रारम्भ हुई जब इनके श्रस्तित्व को एक युग हो चुका था शौर इतिहास निर्माण में इनकी जीवन्त शक्ति का परिचय मिल चुका था। पश्चिमी राजनीतिज्ञों का ध्यान इस ओर विशेषकर, उस समय गया जिस समय फ्रांस की क्रान्ति के बाद राष्ट्रीयता के उमड़ते बवण्डर ने यूरोप का नक्शा बदलना प्रारम्भ कर दिया। तभी उन्होंने यूरोप के विभिन्‍न भागों में प्रचलित राष्ट्रीय आ्रान्दोलनों का विश्लेषण कर राष्ट्रीयता के सिद्धान्तों पर मत प्रकट करने प्रारम्भ किये

प्रो० होलीकोम के मतानुसार, “राष्ट्रीयता विध्िष्ट मातृभूमि से सम्बन्धित सामूहिक भावना, एक सहानुभूति तथा परस्पर संवेदना की वृत्ति है जो एक विशिष्ट भू-भाग से सम्बन्ध रखती हो इसका जन्म

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१६ हिन्दू राष्ट्र

प्रतीत की सफलताश्रों, गौरव, विपत्ति श्रौर दुःख की सावंजनिक स्मृतियों से होता है ।”

बर्जस के मतानुसार, “एक ही भू-खण्ड में रहने वाले लोगों के समूह को राष्ट्र कहते हैं, जिनकी भाषा, साहित्य, रीति-रिवाज एक समान हों ओर उचित-अश्रनुचित के प्रति जिनकी समान जागरूकता हो

ब्लंटर्ली के मतानुसार “विभिन्‍न व्यवसायों श्रौर सामाजिक स्तर के व्यक्तियों का ऐसा समूह, जिसकी वंशगत चेतना, भावना तथा जाति समान हो, जिनकी भाषा एक हो तथा परम्पराएँ समान हों, जो उन्हें एकता के सूत्र में पिरोकर राज्यनिरपेक्ष रूप में सभी विदेशियों से प्रथक अस्तित्व दे ।”

गेटल के मतानुसार, “राष्ट्र ऐसा जन-समूह है, जिसकी जाति, भाषा, धमं, रीति-रिवाज और इतिहास एक ही हो इनसे जन-समूह में एकता की भावना पैदा होती है और वह उन्हें राष्ट्रीयता के सूत्र में पिरो देती है।'

उपर्युक्त परिभाषाओं तथा वास्तविक श्रनुभव के श्राधार पर किसी जन-समूह को राष्ट्र का नाम देने के लिए उनमें निम्नोक्त पाँच बातों की एकता का होना नितान्‍्त प्रावश्यक समझा जाता है--

१. देश, २. जाति, ३. भाषा, ४. संस्कृति तथा ५. घमम

रनन तथा सर गअरनेंस्ट बाकर जैसे कुछ अन्य विचारकों ने राष्ट्री- यता की दाशंनिक रीति से व्याख्या की है। रैनन के मतानुसार, “राष्ट्र एक आत्मा है, जिसकी जड़ें मनुष्य के हृदय की गहराइयों में हैंन कि उन पाँच एकताओं में वे तो इसके सहायक तत्त्व मात्र हैं।” उसके मतानुसार, “दो वस्तुएँ जो वास्तव में एक ही हैं, इस झात्मा का निर्माण करती हैं। उनमें से एक श्रतीत की होती है तथा दूसरी वर्तमान की पहली जन-साधारण की समान बपौती है भौर दूसरी साथ रहने तथा साँफ़ी पेतृक देन का भ्रधिकाधिक उपभोग करने की बलवती इच्छा है। व्यक्ति के समान ही राष्ट्र भी चिरकाल के परिश्रम, त्याग झौर भनु- .._ राग का फल है। क्‍योंकि हमारे वर्तमान अस्तित्व का भ्राधार हमारे

राष्ट्रीयता के मूल श्राधार १७

पू्व॑ज ही हैं। श्रत: उनका गुणवाद सवंथा उचित ही है। राष्ट्रीयता के विचारों की खोज में वीरोचित श्रतीत महापुरुषों का स्मरण तथा वास्त- विक गौरव हमारी सम्पत्ति होनी चाहिए ।”

सर भ्रनेंस्ट बाकर इस विषय में श्रधिक स्पष्टता बताते हैं वे राष्ट्र की एक जीवित शरीर के रूप में तुलना करते हुए कहते हैं कि इस शरीर के दो मूल अश्राधार हैं, एक है बाह्य शरीर जो एक सीमाओं से घिरा देश के रूप में प्रकट होता है और दूसरा भ्रात्मा जो जनसाधारण की संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाजों और आकांक्षाश्रों के रूप में मिलकर राष्ट्र की आत्मा का निर्माण करता है। जिस प्रकार अ्रस्थि श्रोर चमं मिश्रित शरीर में प्राणों का होना अनिवार्य है, ठीक उसी प्रकार किसी राष्ट्र के लिए इन दोनों का होना भी परमाश्यक है

यद्यपि इन सब कारणों एवं एकताओों का राष्ट्रीयता की कल्पना में अ्रच्छा महत्व है तथापि प्रत्यक्ष प्रनुभव में इसके कुछ भ्रपवाद भी मिलते हैं। राष्ट्र के विकास में इन सब का योग जानने के लिए इनका श्रलग- झभ्लग मूल्यांकन करना आवश्यक है

देश

यह निविवाद सत्य है कि राष्ट्र बनने के लिए किसी जनसमूह के पास प्राकृतिक सीमाओं से युक्त क्षेत्र का होना परमावश्यक है ऐसा क्षेत्र उस राष्ट्र का भौतिक झ्राधार होता है। बिना देश के राष्ट्र की कल्पना विचारणीय नहीं हो सकती जो दशा मुस्लिम श्ररबों के द्वारा निकाले जाने पर यहूदी तथा पासियों की हुई, ठीक वही दशा उन लोगों की होती है, जिनका पभ्रपना कोई देश नहीं होता और ही उनको राष्ट्र कहा जा सकता है, चाहे उनमें प्रन्य सभी एकताएँ विद्यमान हों दूसरी भोर जिनके पास अपनी भूमि है तथा भ्रपनी सरकार है थे दूसरी एकताझों को प्राप्त कर राष्ट्र बन जाते हैं। यू० एस० ए०, कनाडा क्या ग्मास्ट्रेलियां इस तथ्य

दम क्‍

राष्ट्रीयता के मूल श्राधार १६

और राष्ट्र शब्दों को समानार्थक भी मान लिया जाता था। किन्तु मानव- जाति-सम्बन्धी विद्या के हाल ही के शअ्रध्ययन से यह पता चलता है कि उसका श्राधुनिक राष्ट्रों के निर्माण में बहुत थोड़ा हाथ है। अभ्रधिकतया ये राष्ट्र उन अनेकों मानव-जातियों के सम्मिश्रण से बने हैं, जो कालचक्र के अनुसार शर्ने:-शरने: संसार के सभी हिस्सों में मिल गई हैं। उदाहरणार्थ अंग्रेजी राष्ट्र आईबेरियन, रोमन और ऐंग्लो-सेक्सन आदि श्रननेकों जातियों का सम्मिश्रण है परन्तु समान जातीय भावना, समान ग्रुण-दोष, जो पहले भले ही किसी एक जाति-विजद्येष के गुण-दोष रहे हों, पर जिन्हें समय पाकर किसी राष्ट्र में सम्मिलित सभी जातियों ने श्रयना लिया हो, पर आधा- रित जातीय एकता का राष्ट्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण भाग रहता है। उदाहरण के लिए, इंगलैण्ड की ऐंग्लो-सक्सन जाति ने अंग्रेजों के जीवन तथा प्रकृति को अधिकतया प्रभावित किया है इसी ने इंगलेण्ड को नाम झौर भाषा दी है। इस कारण यह भंंग्रेज़ों की मातृजाति कहलाने का दावा कर सकती है। ऐंग्लो-सेक्सन जाति के बिना श्रंग्रेज़ी राष्र की कल्पना नहीं की जा सकती। इसी प्रकार भारत में भी श्रायं जाति को मातृजाति का स्थान प्राप्त है। अनेक जातियों तथा उपजातियों से बने भारतीय जनों को भार- तीयता में ढालने का कार्य प्राय सभ्यता तथां श्रादर्शों ने किया है। इस प्रकार जातीय एकता को केवल वैज्ञानिक श्रथवा प्राणी विद्या विषयक श्रर्थ में लेने पर हम इसे राष्ट्र के विकास में प्रमुख कारण नहीं मान सकेंगे किन्तु एक समान जाति-भावना के रूप में आधुनिक सभी राष्ट्रों में इसका महत्व अ्रसंदिः्ध है, क्योंकि इससे सर्वसाधारण की भाषा, सम्यता और परम्पराओ्रों का विकास होता है। ऐसे तत्त्व जो किसी देश की मातृजाति में विलीन नहीं हो पाये भ्रथवा जो जातीय चेतना का विकास नहीं कर पाये, वे वहाँ जातीय तत्त्व बनकर रह जाते हैं। यदि वे मातुजाति भौर उंसके जीवन-दृष्टिकोण को ही समाप्त

२० हिन्दू राष्ट्र

कर दें तो बात और है जैसा कि मुस्लिम प्रबों ने सातवीं सदी में मिस्र में किया था। श्राज मिस्र के लोग अ्ररब जाति के अंग माने जाते हैं। उनकी मूल जातीय विशेषताभ्रों, भाषा श्रौर सभ्यता का उसी तरह अन्तलोप हो गया है, जिस तरह इंगलंण्ड में केल्टों का ऐंग्लो-सेक्सन जाति में हुआ था

इस प्रकार हम देखते हैं कि किसी राष्ट्र के निर्माण में उसके श्रन्तर्गंत सर्वेप्रमुख जातीय अभ्रंश का भी बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि उसकी भाषा तथा संस्कृति से प्रभावित समान जातीय चेतना उस राष्ट्र की राष्ट्रीय संस्कृति के रूप में अ्रभिव्यक्त होती है

संस्कृति

संस्क्ृति एक व्यापक शब्द है। इसका उपयोग विशिष्ट जीवन-दर्शन सामाजिक आदशं, कलात्मक रीतियाँ, बौद्धिक विकास, ऐतिहासिक सफलताएँ और अतीत की स्मृतियों का परिचायक है। धामिक विश्वास और जीवन-दर्शन भी संस्क्रति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं देश झौर काल की सभ्यता का इससे गहरा सम्बन्ध है। स्वाभाविकतया वे ही कला, साहित्य तथा दर्शन-जीवन पर स्थायी प्रभाव डालती हैं, जिनमें ग्रसाधारण विशेषताएं होती हैं। वे ही उनके विशिष्ट जीवन-मूल्यों की प्रतीक समझी जाती हैं। भारतीयों भश्रौर पग्रेज़ों के साहित्य-क्षेत्र में कालिदास और शेक्सपियर सफलता की सीमा-रेखा को पार कर गये हैं, इसी से वे अपने-भ्रपने देश में सांस्कृतिक प्रतीक बन गये हैं।

कभी-कभी जन-समुदाय की संस्कृति पर उसके धर्म का बहुत प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ ईसाइयत ओर इस्लाम श्रपने अनुयायियों के जीवन के प्रत्येक प्रहलू को प्रभावित करते रहे हैं। यही कारण है कि कई बार ईसाई भ्र॒थवा मुस्लिम संस्कृति की चर्चा सुनने को मिलती है किन्तु राष्ट्र-चेतना के विकास के साथ-साथ अ्रब राष्ट्रीय संस्कृतियाँ भी पनपने लगी हैं। फलत: हम ईसाई अथवा मुस्लिम संस्कृति की. अ्रपेक्षा

राष्ट्रीयता के मूल श्राधार २१

जमंन, फ्रेन्च एवं तुर्क संस्कृति के विषय में भ्रब भ्रधिक सुनते हैं

समान संस्क्रेति का विकास और इसके द्वारा पनपने वाली सांस्कृतिक एकता की भावना राष्ट्र के निर्माण का कारण और कार्य दोनों हैं यू० एस० ए० का उदाहरण सामने है। एक झ्लग राज्य बनकर राष्ट्र कहलाने के कारण ही वहाँ प्रमेरिकन संस्कृति का विकास हुझा किन्तु इसके विपरीत जमंनी और इटली में समान संस्कृति, परम्परा और भाषा ने उन्हें एकता प्रदान करके राष्ट्रीय राज्य की प्रतिष्ठा दी

संस्कृति चाहे कभी और कैसे पनपे किन्तु राष्ट्रीयता के निर्माण में उसका प्रमुख प्रभाव पड़ता है। संस्कृति ही राष्ट्र बनने की इच्छा को जन्म देती है यही कारण है कि इसे राष्ट्र की आत्मा कहा जाता है। सांस्कृतिक एकता से राष्ट्रीय एकता को बल मिलता है। जिस राष्ट्र में सांस्कृतिक एकता का श्रभाव है, उसकी राष्ट्रीय एकता को झाज या कल धक्का लगना गवश्यम्भावी है

भाषा

भाषा को भी ररशष्ट्र-निर्माण में एक पृथक साधन माना जाता है।. भाषा मनुष्य के मस्तिष्क के विचारों की वाहक होती है। जमंन दाशे- निंक फिल्शे ने बहुत समय पहले कहा था--“भाषा के निर्माण में मनुष्य का इतना हाथ नहीं जितना कि मनुष्य के निर्माण में भाषा का है।” क्‍

मनुष्य का मानसिक दृष्टिकोण बनाने में भाषा का सबसे महत्वपूर्ण योग होता है। जीवित भाषा राष्ट्र के जीवन-दर्शन को प्रकट करने में समथे होती है। कहावत है--“भाषा का नाश कर दो तो राष्ट्र स्वयमेव नष्ट हो जायेगा यही कारण है कि भारत में भ्रपती सत्ता बनाये रखने के लिए अंग्रेजों ने भारतीयों पर प्रपनी भाषा थोपने का भरसक प्रथत्त किया प्ररबों ने मिस्र में भ्रपनि भाषा का प्रचार कर फेरोह के प्राचीन मिस्र का अ्रस्तित्व ही मिटा दिया

२२ हिन्दू राष्ट्र

यू० एस० ए० जेंसे नये देशों में, वहाँ यूरोप के विभिन्‍न भाषाभाषी प्रवासी बिखरे पड़े थे, सर्वंसुगम अंग्रेज़ी भाषा ने उनमें एकसूत्रता का संचार कर उन्हें एक राष्ट्र बना दिया है। इससे राष्ट्र-निर्माण में भाषा का महत्व सिद्ध होता है

स्विटज़रलेंड इसका अपवाद है जमंन, फ्रांसीसी तथा इटालवी इन तीन भाषाओ्रों के प्रयोग करने पर भी वह एक सुदृढ़ राष्ट्र है। वहाँ कुछ ऐसी परम्पराएँ एवं विधियाँ प्रतिष्ठित हो चुकी हैं, जो उनके' भाषा के ग्रन्तर को गौण बना देती हैं। इसके श्रतिरिक्त उन्हें किसी ऐसी परि- स्थिति का भी सामना नहीं करना पड़ा, जिससे उनकी राष्ट्रीय एकता की परीक्षा होती उस राष्ट्र का मुख्य आधार राजनीति है, उसके पड़ोसी देशों को, जो उसे अपना साँफ़ा क्रीडास्थल समभते हैं, उसका अस्तित्व अखरता नहीं इसलिये यह एक ऐसा राष्ट्रीय राज्य है, जिसे अन्तर्राष्ट्रीय पृष्ठपोषण प्राप्त है।

किन्तु इस तथ्य से कभी भी विमुख नहीं हुआ जा सकता कि राष्ट्र- निर्माण में भाषा एक प्रभावशाली माध्यम है। देश की साहित्यिक निधियों के रूप में राष्ट्रीय संस्कृति के विकास में इसका प्रमुख स्थान है

|.

घम

इतिहास साक्षी है कि धार्मिक एकता ने सामूहिक चेतना को जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। यूरोप के भ्रधिकांश देशों में श्रभी तक भी धघामिक एकता को उस प्रचण्ड शक्ति का रूप प्राप्त है, जिसने उन्हें एक सूत्र में पिरोया है। यही कारण है कि धामिक एकता के लिये वे लोग सदा प्रयत्नशील रहते हैं

परन्तु वैज्ञानिक चेतना का विकास एवं धाभमिक उदारता बढ़ जाने के कारण पश्चिम के अ्रधिकांश देशों में धर्म राष्ट्र-निर्माण में प्रमुख नहीं रह गया है। वहाँ भ्रब इसका सम्बन्ध श्रन्य चेतना से ही अधिक बढ़ता जा रहा है। एक मनुष्य राष्ट्रीय दृष्टि से चाहे वह जमंन हो, अ्रंग्रेज हो

र्‌४ हिन्दू राष्ट्र

बदल जाता है वह भूल जाता है अपने पूर्वजों को, वीर पुरुषों को, इतना ही नहीं राष्ट्रीय महत्व की प्रत्येक वस्तु को वह भूल जाता है धर्म के साथ-साथ उसकी राष्ट्रीयता भी बदल जाती है

ऐसा भी समय झा सकता है कि जब मुस्लिमों में भी धर्म केवल उपासना-विधि ही रह जाय कमाल श्रता तुके ने टर्की में इसका प्रयास भी किया था, किन्तु श्रधिकतर मुस्लिम राज्यों में प्रभी भी राष्ट्रीय चेतना की श्रपेक्षा धामिक चेतना भ्रधिक बलवती है। हिन्दुस्तान-जैसे अमुस्लिम देश में रहने वाले मुसलमानों के विषय में तो कहना ही क्‍या

इस प्रकार स्पष्ट है कि धर्म का स्थान जहाँ केवल उपासना-विधि तक ही सीमित नहीं है, वहाँ वह राष्ट्र-चेतना में प्रमुख स्थान पाता रहेगा; किन्तु जहाँ ऐसा नहीं है, वहाँ राष्ट्र-निर्माण में बह उतना प्रभावी तत्त्व नहीं रहा है

साधारणतया संस्कृति, भाषा और धर्म तीनों का राष्ट्र-निर्माण में सम्मिलित योगदान रहता है। कुछ समय पूर्व से ही इन तीनों का अलग-अलग मूल्यांकन किया जा रहा है। वे संयुक्त रूप में ही राष्ट्र की ग्रात्मा अथवा आध्यात्मिक आधार की स्थापना करते हैं। वास्तव में वे राष्ट्र की जीवन-शक्ति के प्रेरक हैं, सष्टू-निर्माण के आदर्श एवं आकांक्षा हैं। आात्म-चेतना को भूलकर कोई भी राष्ट्र श्रपनी विशिष्ट- ताओझों को स्थिर नहीं रख सकता

कुछ ग्राधुनिक कारण क्‍

कुछ भ्राधुनिक विचारक उपरलिखित पाँच तत्त्वों के महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी सांमृहिक चेतना के जागरण में झआथिक भ्रौर राजनीतिक कारणों का अधिक हाथ मानते हैं इसी मान्यता के झ्राधार पर कालंमाक््स ने संसार के श्रमिकों की एकता के सिद्धान्त का प्रतिपादन- किया था। किन्तु वर्तमान तथा अतीत के अश्रनुभव इस सिद्धांत का खण्डन. . करते हैं। आज मे ये

राष्ट्रीयता के मूल आधार २५

बहुत देर नहीं हुई, जब जमंन मजदूरों ने रूसी मज़दूरों से दो बार लड़ाई की सुडेटन जमंन और जैक लोगों के एक समान श्राथिक हित होने पर भी उनमें एकता हो सकी रनन के कथनानुसार सत्य तो यह है कि जनसाधारण के श्राथिक हितों के श्राधार पर “व्यापारिक सन्धियाँ तो हो सकती हैं किन्तु राष्ट्र नहीं बन सकता राष्ट्रनिर्माण में देह और प्राण का झनिवाय संयोग है और इसका भावनात्मक पक्ष ग्राथिक पक्ष की भ्रपेक्षा बहुत भ्रधिक महत्वपूर्ण है। स्वदेशानुराग राष्ट्रीय भावना से पनपता है और देश को सुरक्षित रखता है किन्तु उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता गत महायुद्ध के समय साम्यवादी रूस का भी यही भ्रनुभव रहा है |

राजनीतिक कारणों के विषय में भी यही सत्य है। राष्ट्रीय चेतना झऔर एकता के लिए किसी एक सरकार के अधीन मिलने वाली राजनीतिक एकता महत्वपूर्ण है। किन्तु यह केवल एक सहायक का कार्य कर सकती है इसे आधार नहीं बनाया जा सकता ये एकताएं राष्ट्रीयता की वृद्धि में सहयोग प्रदान करती हैं। इन एकता्रों के भ्रभाव में, विशेषतया जन- तन्त्रीय शासन में, राजनीतिक एकता संघटन की भ्रपेक्षा विघटन में ही सहायक होती है। यूरोप और भारत का अभी हाल ही का इतिहास इसका उदाहरण है

यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय एकता के मूल आ॥राधारों में से सभी का होना परमावश्यक नहीं वर्तमान कई राष्ट्रों का उदाहरण हमारे सम्मुख है, जहाँ सभी एकताएँ विद्यमान नहीं हैं। ऐसे भी उदाहरण हैं जहाँ एक की अपेक्षा दूसरी एकता ने राष्ट्र-निर्माण में अ्रधिक योग दिया है

परन्तु इन सब में एक राष्ट्र होने की सजगता और पूर्णनिष्ट सामू- हिक चेतना, जो शभ्रन्य सामाजिक, राजनीतिक, झाथिक तथा धार्मिक निष्ठाश्रों से, समय झाने पर प्रतिस्पर्धा में सबलतर सिद्ध होने की क्षमता रखती हैं, भ्वश्य विद्यमान रही हैं। यही उनके राष्ट्रीयत्व का मूल श्रमाण है।

भारतीय राष्ट्रीयता के ऐतिहासिक मूल

भारत का इतिहास तथा संस्कृति का ग्रध्ययन करने से पता चलता है कि राष्ट्रीय के लिए जिन श्रावश्यक तत्त्वों की विवेचना की गई है, वे यहाँ सदा ही विद्यमान रहे हैं। यह बात सवंधा निराधार एवं तथ्य- हीन है कि भारतीय राष्ट्रीयता का भ्रभी-अ्भी उदय हुग्ना है श्रथवा यह पाश्चात्य विचारों का प्रतिफल है। राष्ट्रीयीाग की भावना भारतीयों में चिरकाल से ही रही है। यही कारण है कि भारत जैसे विशाल एवं विविधता से परिपूर्ण देश की एकता भ्रभी तक स्थिर रह सकी है। एकता की यह चेतना ही भारतीय राष्ट्रीयता का मूल है

भारतीय राष्ट्रीय की स्पष्ट कल्पना इससे लक्षित होती है कि भारतीय जन भारत को भारतीयों का देश मानकर उसके प्रति श्रद्धा का भाव रखते हुए स्वयं को गौरवान्वित समभते हैं। भारत की सारी परम्पराएं, साहित्य--वहु चाहे धामिक हो श्रथवा लौकिक--देश के प्रति भारतीय जनों के ग्रादर तथा गौरव की भावनाओं से भ्रोत प्रोत हैं

भारत हमारी मातृभू तथा पृण्यभू है, इस प्रकार के ज्ञान का, धर्म और जाति के भेद-भाव के बिना विकास भारतीयों में इतिहास के प्रारम्भ से ही हुआ है। हमारा प्राचीन वेदिक साहित्य वेदिक भ्रार्यों द्वारा भ्रपनी मातृभूमि की स्तुति से गाये गए मन्त्रों से भरपूर है। ऋग्वेद के पृथ्वी सृक्त

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भारतीय राष्ट्रीयता के ऐतिहासिक मूल २७

में भूमि की माता के रूप में बन्दना की गई है। देश के लिये राष्ट्र शब्द का प्रयोग भी सर्वप्रथम ऋग्वेद में ही मिलता है

थ्रार्यों का विस्तार

प्रारम्भ में आरयों की भूमि और मुल स्थान भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों तक ही सीमित माना जाता है। ऋग्वेद में इसको “ब्रह्मावते' अभ्रथवा 'सप्तसिन्धु--अश्रर्थात्‌ सात नदियों का देश कहा है। जब ञाय॑ पूर्व की ओर बढ़े और सारा उत्तर-भारत उनके प्रभाव में गया, तब इस सारे भू-भाग को आझारयविते नाम दिया गया किन्तु आरयों का प्रसार यहीं पर समाप्त नहीं हो गया शीघ्र ही विन्ध्याचल को पार कर समस्त दक्षिण- भारत को उन्होंबे श्रायत्व की शिक्षा दी

भारतवर्ष

इस प्रकार आ्रार्य संस्कृति के दक्षिण-भारत तक प्रसार हो जाने से इस समस्त देश के लिये भ्रार्यावर्त नाम अनुपयुक्त प्रतीत हुआ क्योंकि दक्षिणी लोग अ्रार्य जाति के नहीं थे, इसलिए सम्पूर्ण देश के लिये इस नाम का उपयोग यथार्थ नहीं था। श्रत: जातीय एकता की अपेक्षा सांस्कृतिक तथा राजनीतिक एकता के बोधक नाम की झावश्यकता प्रतीत हुई वह नाम है भारतवर्ष भारतीय परम्परा के अ्रनुसार, जिसने हिमालय से लेकर _ कन्याकुमारी तक फैले हुए समस्त देश को संगठित कर राज्य किया, उस चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर इस नाम का प्रचलन हुझा कालान्तर में किसी वर्ण, धर्मादि को विशेषता देते हुए सभी भारत- वासियों को भारतीय कहा जाने लगा

“विष्णु पुराण” में इस तथ्य की स्पष्ट विवेचना इस प्रकार की गई है. हे ््ि है . उत्तर यत्‌ समुत्रस्थ हिसादेश्लेव दक्षिणम्‌ | : बर्ष तत्‌ भारतं ताम भारतो यत्र संतत्ति *'

र्८ हिन्दू राष्ट्र

अर्थात्‌ महासागर से उत्तर तथा हिमालय से दक्षिण की ओर फैले हुए इस देश का नाम भारतवषं है, जहाँ भारत की सन्‍्तान निवास करती है इसके अतिरिक्त इसमें भारत के भौगोलिक आ्राकार तथा मुख्य नदियों एवं पर्वतों का भी वर्णन है | उसमें महेन्द्र, मलय, सह्दया, सक्तिमत, रिक्षा, विन्ध्य तथा पाणिपनत्रादि पव॑तों का उल्लेख आता है | उसमें यह भी लिखा है कि भारत के पूवव में श्रसभ्य किरात, पश्चिम में यवन और मध्य में श्रायें लोग निवास करते हैं वायु पुराण” में इससे भी विस्तार में लिखा है उसमें भारत का ठीक-ठीक आकार दिया गया है--- योजनानां सहर््न॑ तु द्वीपोयं दक्षिणोत्तरम भ्रायतो ह्याकुमारिक्यादागंगा प्रभवांच्य यः ।। अर्थात्‌ उत्तर में गंगा के उदगमस्थल से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक फंले हुए इस द्वीप की लम्बाई का एक सहस्र योजन है

हिन्दू श्रोर भारतीय उच्चारण

इसके पश्चात्‌ जब पश्चिम के लोग, पारसी श्र ग्रीक भारत के सम्पर्क में आये तो इसके प्रथम भौगोलिक चिह्न सिन्धु के नाम पर इन लोगों ने इसे कई नये नाम दिये। परसियन लोग सिन्धु का उच्चारण हिन्दू करते थे। संस्कृत को 'स' फारसी में 'ह' के रूप में उच्चारण किया जाता है। इस प्रकार सिन्धु के इस देश को उन्होंने हिन्दुस्थान भौर यहाँ के निवासियों को हिन्दू कहना प्रारम्भ किया उसके बाद जब ग्रीक लोग यहाँ आये तो उन्होंने श्रपनी उच्चारणानुसार सिन्धु को इण्ड्स तथा भारत को इण्डिया कहना प्रारम्भ किया एवं यहाँ के निवासियों को इण्डियन | इस प्रकार भारतवर्ष और उसके निवासियों के लिए इण्डिया तथा इण्डियन और हिन्दुस्तान तथा हिन्दू नामों का प्रथम प्रयोग प्रारम्भ हुआ स्वाभाविक ही यूरोपियनों में ग्रीक नाम झधिक

भारतीय राष्ट्रीयता के ऐतिहासिक मूल २६

प्रचलित हुए और तदनुसार वे श्राज भी इन्हीं नामों का प्रयोग करते हैं। किन्तु फारसी नाम सिन्धुस्थान अ्रथवा हिन्दुस्थान और सिन्धु अथवा हिन्दू पर्याप्त समय तक प्रचलित रहे तथा आज भी इनकी मान्यता है इन नामों की पृष्ठभूमि में जाति श्रथवा धमं की अपेक्षा भौगोलिकता की छाप भश्रधिक है। भ्रत: इनमें साम्प्रदायिकता की गन्ध का लाना सरासर गलती है

भारत राष्ट्र, इण्डियन नेशन भ्रथवा हिन्दू राष्ट्र तीनों शब्द एक ही ग्र्थ के द्योतक हैं। जो इण्डियन कहलाने में गौरव और हिन्दू कहलाने में लज्जा का अनुभव करते हैं, वे या तो अपने भ्रतीत के विषय में कुछ भी नहीं जानते या स्वयं को श्रभी तक भी भश्रंग्रेज़ी की मानसिक दासता से मुक्त नहीं कर पाये हैं। यह मानसिक दासता का ही लक्षण है कि श्रपने मूल नामों का तिरस्कार कर विदेशियों द्वारा प्रदत्त नाम की ही महिमा बखानी जाय

समस्त भारत को एक देश के रूप में मानना केवल भौगोलिक कल्पना नहीं है भ्रादिकाल से भारतीयों के हृदय में देश के प्रति श्रद्धा एवं श्रादर के भाव भरने के निरन्तर प्रयत्न होते आये हैं। इस श्रद्धा का स्पष्ट उदा- हरण हमें मह॒षि वाल्मीकि हारा लिखित रामायण में मिलता है, जिसमें उन्होंने श्री रामचन्द्र के मुख से कहलाया है--

भ्रपि स्वर्ण मयी लंका में लक्ष्मण रोचते जननी जन्मभूमिश्य स्वर्गादपि गरीयसो

प्र्थात्‌--हे लक्ष्मण, यह लंका स्वर्णमयी होने पर भी मुझे बिलकुल नहीं भाती क्‍योंकि जननी और जन्मभूमि मेरे लिए स्वर्ग से भी बढ़- कर है

उत्तर से दक्षिण तक फैले हुए, उपरबवर्णित सात पवंतों एवं गंगा, यमुना, सिन्धु, सरस्वती, नमेंदा, गोंदावरी तथा कावेरी इन सात नदियों के प्रति श्रद्धा ने भारत की एक देश के रूप में कल्पना को प्रोत्साहित किया है |

३० हिन्दू राष्ट्र प्राचोन राष्ट्र

इस प्रकार यह सुगठित एवं सीमाबद्ध देश अ्रति प्राचीन काल से भारतीय राष्ट्रीयता का भौतिक आ्राधार बना हुआ है चिरकाल से भारतीयों के मन में श्रपनी राष्ट्रीयता एवं अपने देश के प्रति श्रद्धा के भाव इस बात को प्रकट करते हैं कि भारतीयों के हृदयों में राष्ट्रीय भावना ने इतने पहले जड़ें जमा ली थीं, जिसकी पश्चिम के राजनीति-विशारद कल्पना भी नहीं कर सकते

जातीय तथा सांस्कृतिक एकता ने इस राष्ट्रीय एकता की भावना को बल प्रदान किया केबल जाति के श्रर्थ में जातीय एकता की भावना एक भ्रम मात्र है, प्रयोगात्मक नहीं संसार का कोई भी देश दात-प्रतिशत जाति बविशुद्धता का दावा नहीं कर सकता | भारत के विषय में भी यही कहा जा सकता है। वरतंमान भारतीय अ्रथवा हिन्दू समाज उन ग्रनेकों देशीय एवं विदेशीय तत्त्वों का मिश्रण है, जो कालानुक्रम से परस्पर अविछिन्न हो चुके हैं। इसलिए समस्त भारत में एक ही विरुद्ध जाति का दावा करने की हिटलर सदश घष्टता कोई भारतवासी नहीं कर सकता |

किन्तु जिस प्रकार ऐंग्लो-सैक्शन लोगों की जातीय विशेषताश्रों ने इंगलेण्ड के सभी लोगों को अपने रंग में रंग लिया है, ठीक उसी प्रकार श्रार्य संस्कृति ने भारत राष्ट्र में सम्मिलित सभी जातीय तत्त्वों को एक रंग में रंग डाला है, इस तथ्य को कोई श्रस्वीकार नहीं कर सकता

इन विभिन्‍न जातीय तत्त्वों के समावेश की प्रक्रिया बहुत रोचक है। इसके अध्ययन से भारतीय राष्ट्रीयवा के विकास को भी समभकने में पर्याप्त सहायता मिलेगी

किसी-न-किसी समय प्रत्येक जाति की अपनी विशिष्ट जीवन-पद्धति तथा संस्कृति श्रवश्य रही होगी किन्तु जैसे-जैसे वह जाति भारयों के सम्पर्क में श्राती गई और इससे पारस्परिक सम्पर्क बढ़तां गया, बैसे-वैसे

भारतीय राष्ट्रीयता के ऐतिहासिक मूल ३१

आारयों की जीवन-पद्धति श्रौर संस्कृति उन पर छा गई निद्चय ही द्रविड़ आदि जातियों ने इस संस्क्ृति-मिश्रण में योगदान किया था। उस योगदान का प्रभाव यह हुआ कि भारतीयों के जीवन में से झ्राय एवं द्रविड़ संस्क्ृति को पृथक पहचानना सर्वंथा श्रसम्भव हो गया यही कहना चाहिए कि वे एकरूप हो गये

यही दशा संसय-समय पर पश्चिम से झ्राने वाले आक्रामकों की भी हुई। वे सब भारतीय जीवन-प्रवाह में विलीन होते गये प्राज इस प्रवाह में से उनके भ्रस्तित्व को प्थक करना सर्वथा श्रसम्भव है। उनकी श्री गंगा की सहायक नदियों से तलता की जा सकती है, जिनका पानी संगम होते ही गंगाजल हो जाता है, केवल नाम में ही नहीं भ्रपितु गुण-धर्म में भी

भारतीयों की यह सांस्कृतिक एकता कई भाँति प्रकट होती रही. है

इसका ठोस प्रमाण भारत के एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक फैले हुए वे पवित्र तीर्थस्थान, नदियाँ, नगर औौर परत हैं, जो सभी वर्गों के लोगों के लिए, चाहे वे धनी हों ग्रथवा निर्धन, विद्वान्‌ हों श्रथवा अपढ़, समान महत्व रखते हैं

परन्तु इस सांस्कृतिक एकता का सबसे शसक्त तथा स्थायी उपकरण यहाँ की भाषा की एकता है जो इसे संस्कृत से प्राप्त हुई है। यद्यपि आज के युग में संस्कृत साधारण बोलचाल की भाषा नहीं रही, इस पर भी यह सब भारतीय भाषाओं की जननी एवं श्वृंखला-सूत्र है द्रविड़ भाषाएँ भी, जिनका विकास सीधे संस्कृत से नहीं हुआ, इससे प्रभावित हुई हैं और जहाँ तक कहा जा सकता है कि उनमें से भ्रधिकांश भाषाश्रों में संस्कृत भाषा के भ्राठ प्रतिशत से भ्रधिक शब्द मिलते हैं

संस्कृत में लिखा हुआ साहित्य तथा इनके महान्‌ लेखक यथा बाल्मीकि, व्यास तथा कालिदास सभी भारतीयों की साँक्री सम्पत्ति हैं तथा सभी को इन पर समान गये है ये हमारी संस्कृति के प्रतीक-रूप . बिना किसी जाति-भेद के, उत्तर से लेकर दक्षिण तक समान भाव से

३२ हिन्दू राष्ट्र

पूजे जाते हैं यही कारण है कि उत्तर तथा दक्षिण के सभी राजनीति- विशारद एवं विद्वान जन एकमत होकर कहते हैं कि संस्कृत के विकास एवं पठन-पाठन को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जिससे यहाँ की सांस्कृतिक एकता को बल मिले

इस सांस्कृतिक तथा भाषायी एकता की स्थापना में धर्मं का कितना महत्व है, यह अ्पने-प्रपने विचार करने की बात है। धर्मों के श्र्थ में जिस... प्रकार इस्लाम और ईसाइयत को लिया जाता है, भारत में इस प्रकार - का कोई धर्म नहीं है। बिना मोहम्मद, शरीयत और कुरान के इस्लाम की तो कल्पना नहीं की जाती इसी प्रकार ईसामसीह और बाईबल के बिना ईसाइयत के विषय में सोचना व्यर्थ है। यह एक विशिष्ट पैगम्बर तथा ग्रन्थ-विशेष में श्रद्धाभाव ही है, जिसके कारण एक व्यक्ति ईसाई प्रथवा मुसलमान कहलाता है ये मत अ्रथवा धर्म अ्रपने झनुयायियों से एकनिष्ठा की श्रपेक्षा रखते हैं

इस प्रकार का धर्म भारत में कभी नहीं रहा भारतीय संस्कृति श्रौर दर्शन के मुख्य स्रोत ऋग्वेद में लिखा है---

एक सद्‌ विप्रा बहुधा वदन्ति

भर्थात्‌ ईश्वर एक है, भले ही विद्वान्‌ जन उसे प्ननेकों नामों से पुकारते हों।

यही कारण है कि भारतवासियों ने सभी मतों, पूजा-विधियों एवं धामिक विश्वासों के प्रति उदारता तथा सहिष्णुता का दृष्टिकोण रखा है

जिस प्रकार ईसाई और मुस्लिम देशों में श्राज भी धामिक एकता पाई जाती है और कहीं-कहीं तो वहाँ की प्रजा को बलपूर्वक उस धर्म को स्वीकार करने के लिए विवश किया जाता है, इस प्रकार की धारभिक एकता भारतवर्ष में कभी नहीं थी ही यहाँ पर प्रजा को राजघधम्ं मानने के लिए विवश किया जाता था। भारतीयों के धामिक ज्ोत वेदों में इस प्रकार की धामिक एकता को हेय माना गया है

३४ हिन्दू राष्ट्र

गया और हुण