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पुस्तक मिलने का पता-- .( १) बैदिक-पुस्तकालय, अजमेर.

(२) वैदिक-यन्त्रालय, अजमेर.

ओोश्म अप सत्यार्धअकाशस्य सूचीपयरस

विषया) प्ठठ-पृष्टएू |. पिषया) 420 | 8/2।

भूमि »*».. **. १-४ | पठनपाठनविशेषविधि] **. * ३६-8२

प्रस्थप्रामाण्याप्रामाए्यवि ४२-४४

सप्न्नास) खीयद्राध्ययनविधि। ** "९ ४४-४५ इंश्वर्वामब्याए्या.. ४. १-१३

सम्ृन्नात३ मद्जज्ञाचरणसमीज्षा '** 7, श्३

हि समावत्तनविषयः श्इ

सम्ुव्रात्र) दूरेरे विवादकरणम्‌ **. *** ४६-४७ गालरिक्षाविपय/. ४. १४-१४ | विवादे खीपुरुषपशीक्षा “४० ,एफश८ सूतप्रेताविनिषिष८. ४. १५-१६ | भव्पदयसि पिवाहूनिपेषर ++ एप-४६ जन्‍्मप्रसंयीदि्रएसगिण्ा “१६-१६ शुर्षकशामुमारेण पशब्यत्स्या ««« श्ह्श् विश्एलएणानि हा »« इए-६ | खरीपुरुषध्ययद्दारः +००... «००

सद्न्नाम)

अध्ययना5प्यापनाविषय! **.. **' २०-४५ पदचगद्दायशञा. . ** गुशमस्त्र्याख्या डेंल *** ६०-२२ , पासटिट्विसस्कारश/. "** भ्राणायामारीक्षा 2644 *»* २२-२३ भातद थागादि पमेहदयन्‌** यशपात्राइतयः ४४ ध्ध २३ पससिध्तण्षणनि सरध्याग्गिद्ोधोगरेश।. ०... २३-२४. एृएयरमी। बबब दोगफतगिर्शेयः शक २४. एप्टिवपएटानि.. डपगयनसमीक्षा ७. “४ २४-२५ मूर्सलह्छानि.. «२ प्रधा््योपरेश+ न... २६-३० , विश्यिशलरस ++

जद्ापर्यदलावर्णनमू.. ३०-३१ , पुर्नावदाहनिस्फीया पष्चधापरीष्याध्गपयम "११-३६ | गृहामसोझपर..

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सम्न्नासः

चानप्रस्थविधिः 2283 संन्यासाश्रमविधिः

सम्ृन्नासः

शानपमविपयः समापन्रयकयनम्‌ यनतश्याति दृएटव्याउ्या राजकर्चव्यमू अपष्टादशव्यसननिपेष। **' मन्त्रदृतादिगजपुरुषलक्षणानि सेल्थ्यादिपु कार्यनियोग। ** इर्गनिमोणब्याण्या युद्धकरपप्रकार! साजप्रजारणणादिविधिः *** प्रामपिपदादिवर्णनम्‌ *** बरप्रदणप्रयारः मस्त्रच्रयप्रझरः अामनारिपाइगुटयव्यास्या गरशामिशेदासीनरादुषु बर्तसमू- शहुमियु दकएप्रगाय्य ! ध्यणगरदिषु सरतभागकुयनम्‌

ब-+5 १5 अन्ब घर्मे - “म्परपरणाय्‌ यू हंटटिकदैकपपरेशाः झाइप्टरे द्टवियिए * रोप्एु दष्घरिम्पल्प

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घत्पार्षप्रकाशध्य सूचीपत्रम्‌

पृष्ठद+- एम

७६-७७ +** छज-प्ाए दश-१०७ दर द्र्श्न्प्द ददन-द< दाह-€० €०

कक रे €१

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€२-€ €३-६४ €४-€५ +*" €५-€६ €६ €६-६७

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+** १०१-१०२ ४7 १०२-१०३ +7* १०३-१०४ ४२९ १७०४-२०७

पिपयाः पृष्ठव+-एष्ठम्‌

यय्नद्बात) इंश्वरविषयः है. #** १०८-११२७ इश्वरविषये प्रभौत्तरणि *** १०८४-१११ इंश्वरस्तुविष्रार्यग्रेणसना। *** १११-११४५ झश्वरक्षानप्रकारः.. *.. *** ११५ इंश्वरस्पास्तित्वमू. *. "!ह ११६ ईश्वययत्तारनिपेघश. "४ ११६-११७ जीवस्थ स्वातन्त्यमू **.. *** ११७-१ १८ ,जीवेश्स्वोर्भितन॒लयर्शनम्‌.._ */* ११८-१२३ ईश्वरस्थ सगुणनिर्मुशकयतम्‌_ *** १२३-१२४ वेदविषयविधार:/.. **'.. *** १२४-१२७

समुज्ात)

सृध्टूयुलत्त्यादिषिषय/ "** ईश्वराभिज्ञाया: प्रकृतरुपा- दानकारणलम,. ** सृष्टी भास्तिकमतनिराकरणम्‌

*+**" १२८-१४४

**' १२८-१३९२ ४" १३२-१३६

मनुष्याणामादिसृट्टेः स्पानादिनिर्णयः १४० आ्यम्लेच्छादिव्याज्या ** १४०-१४२ इच्धरस्थ जगदाघारत्वपू *+** १४२-१४४ & परहशातः ॥। विषाधविद्याविषया.. + १४४-१४७: धन्धमेक्षविषया ** १४८-१६० १० समुझ्गातत आवचाण5नाचाणदिषय/ * “४ १६१-१६७ | अदयाभद्यविषया.. *** *** १६७-१७५

इति पूर्वाद।

शस्यायैप्रकाशस्प घुवीपदम्‌

पिपया। शतः-शष्ट प्‌ जैनवौद्धयोजियम्‌.. "/!.. / २६५-२६७* प्रास्तिकनाध्तिकसंवाद३ * २६७-२७० जगतोनादित्वसमीज्ञा **.. *** २७०-२७२ जैनमते भूमिपरिसाणम्‌ *** २७२-२७३

जौवादन्यस्य जड़त्वे पुदंगलानां- पापे प्रयोजनकत्वं थे ***.. *** २७३-२७४५

जैनधमैप्रशंसादिसमीक्षा +" २७५-रे८६ जैनमतमुक्तिसमीज्षा *** . *** रेदज्-रदथ पतेनलाघुरूक्षणसगीर्ा “+ शबब-२६२ जेनतीयंड्वर (२४) व्याब्या. ** २६२-२६४ * लैनमते जम्बूद्पादेवि०.. २६४-२६७ १३ समुन्नात३ ्ँः अनुभूमिका आज श्च्द शकृख्घीममतसमीकज्षा.. "| **" २६६-३१३

दायव्यवस्थापुस्तकमू, *** “” ३१३-३१४

पिषया। दृष्ठा-्य गणनपुस्तऊय्‌ रन * ३१४-३१ समुएल्ास्यस्य द्वितीय॑ पुस्तझ्म्‌ *** ३३१: ण्ञां पुस्तम्म हंगड 82 ३१ कालवृत्तस्य पुम्तकम *+ ३२१४-३१ ऐयूवरास्यस्प पुस्तकम्‌ >३ ३१! उपदेशस्य पुस्तकमू "९ *** श्! मत्तीरचितं इश्लीलाए्यसू **० ३१६-३२/ माऊणवितं इब्जीलाएयम्‌ जद ३२

लूऊथचित इब्जोलाल्यम्‌ योदनरचितमसुसमाचारः योदनप्रकाशितवाक्यप्र

** ३२६-३२: *** ३२७-३४: + ३२८०-३३

१४ सपुक्कास)

अजुभूमिका +०भ न्न्न ३३६ यबनमतपुरानास्यसमीक्षा.. *** ३३७-१८! स्वमन्तब्यामन्तव्यविषय/. *** |

इत्यूचराई।

झा

जि समय मैंने धद्द प्रस्ध “/सरवार्यप्रकाश" बनाया था रस समय और उससे पूर्ठ संस्हत मादण करने, पठनपाठन मैं संम्शत द्वी बोलने झोर जम्ममृति बरी सादा सुश्राती होरे के दारण पे मुझको इस माण का विशेष परिह्ाग मे था, इससे भाषा भशुद धन गईं थी। झत मादा दोशने भौर लिखने का अभ्यास हो गया दे | इसलिये इस भ्रन्थ को भाषाध्यापरणादुसार छुद्ध करके दूसरी दार दण्पाया दै, षड्ठी शब्द, वाक्य, रखना का भेद हुथा टे सो करना डाॉंचत था, क्योंकि इसके भेद किये बिना भाषा की परिपाटी छुधरणी कठित थी, परस्तु अर्थ का भेद न्टी किया गया दे प्रस्युत विरेद्र तो लिया गया दै | दां शो ध्रधम दूपने में काटी भूल र्ट्टी थी थह् तिकाल शोधकर टीफ कार्दी गई टै पद प्रस्ष १४ ( धोदद ) समुज्ञास चर्चात्‌ धोदइ विभागों मे रथा गया है। इसमें (० (६5 ) समुशास पूर्वार्स थोर ( धार ) उत्तराद में पने हैं, परस्तु भ्रसुय के दो समुझास और पदात, प|सदास्त किसी कारण से प्रथम मदीं दवप सके थे भष थे भी छृपदा दिये हैं ( १) अपम सम्मप्वात में [धर फे भोकारादि नामों पी व्याख्या (३ ) द्वीय समुप्नास में सन्‍्तानों दी शिवा

) दृवीय समन्नाम्र में प्रद्नर्य, पठनपाठन व्यवस्था, सत्यासत्य पन्यों बे: मास भौर पे पढ़ने की रीति |

४) घतुप सप्त्राप्त में विवाह भौर एशथम फा प्यव्टार

४) पत्चम सम्ृद्वास में वानप्रस्ष भौर संस्यात्ताथम थी विधि

) छठे समुध्नास में रागपमे

) सप्तम ससुद्नास में पेदेशर रिएप

) भष्टम सदद्वास में जयत्‌ पी उत्पत्ति, स्थिति भर प्रलय

& ) नाम सामप्तास में पिया, भविया, पन्‍्थ भौर मोत्त ढी ध्याए्पा।

५०) दशरें सहप्ताय में आचार, भनापार भौर भदयामक्प रिएए |

२१) एकादश सद्नद्नास में झआायादर्सीय मतमतास्तर को सयणडन मएटन शिय '३) द्वादश सदत्तास में चरारोइ, बोद्ध भोर जैनमत का रिप्य

३) धरयोदश सदुष्तास में [साईंमत बाय दिष्य

३) पौदाएं स्न्ताम में हमलमानों $े मत इग पिपप और चौरा सहड्टारों डे, अन्ह हें आप दे; सनादन वेददित्ति मत ही रिशेष्व। ब्याऊण लिखी है, शिग्रऐ # शछे पयारद्‌ मानता हूं

4

सूमिका

2 5 3 52232: नस्ल सलमल 5२०55 नननआ २३०३६: भेरा इस प्रन्थ के बनाने का मुख्य प्रयोजन सत्य अर्थ का प्रकाश करना दे अर्थात्‌ जो है इसको सत्य भौर ज्ञो मिथ्या दे उसको मिथ्या दी भतिपादन करना सत्य अर्थ का प्रकाश सममा दै घट्ट सत्य नहीं कद्दाता ज्ञो सत्य के स्थान में असत्य ओर असनन्‍्य के स्थान में सत्य का प्रकाश क्िः ज्ञाय किम्तु जो पदार्थ जैसा दे, उसको वैसा दी कहना लिखना और मानना सत्य फहाता दे।' मनुष्य पद्पाती द्वोता दि, यद्द अ्रपने असत्य को भी सत्य और दूसरे विरोधी मत थाचे के सत्य को झप्तत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त द्ोता दे, इसलिये थद्द सत्य मत को प्राप्त नहीं द्वो सकता। इसीपए़ि विदाद आ्तों का एट्टी मुझ्य काम दे कि उपदेश था लेख द्वारा सइ मनुष्यों के सामने सत्यासत्य $ स्वरूप समर्पित करदें पश्चात्‌ वे स्थयं अबना दितादित समझ कर सम्यार्थ का प्रदरा ओर मिच्यार्थ परिस्याग करके सदा आनन्द गे रहें | मनुष्य का आत्मा सत्यासत्य का जाननेवाला दे। तथापि अर प्रपोधन की सिद्धि, इट, दुराप्रह और अवियादि दोषों से सत्य को छोड़ असत्य में मुक जाता है पए इस प्रस्थ में पेसी बात नहीं रकली दे ओर किसी का मन दुखाता वा किसी की हानि पर तात्पय किस्तु हिससे मनुष्र झ्ञाति की उन्नति झोर उयकार हो, सत्यासत्य को मनुष्य लोग ज्ञानकर सत्य ग्र८ण भौर भसस्प का परित्याग करें, क्‍योंकि सत्योपदेश के बिना अन्य कोई भी मलुप्प-ञाति की उप का फाए्य मद है | इस प्रग्प में शो कद्दीं भूल घृक से अधया शोधने तथा छापने में भूल चूफ रद्द ज्ञाप उस* झामने शनाने पर भैधा यह सरप द्वागा पैसा दी कर दिया ज्ञायगा | झोर ज्ञो कोई पतक्तपात से अत्य' शहा था छग्डन मगइन करशा, उस पर ध्यान दिया ज्ञायया। हां जो यद्द मनुष्यत्ात्र का इं'बर बुच शनारता उसको समय समय समझने पर उसका मत संणृह्द'त द्वोगा। यद्यपि आजकरख णहु। दिद्वान्‌ प्रस्वेछ मतों में दें थे पततपात छोड़ सर्वेठस्त्र सिद्धान्त अर्धात जो यातें सप के अमुफूल रे मैं स्य हैं, इतर प्रदय भौर जो एक दूसरे से विद बातें हैं, उनका त्याग कर पररुपर प्रीति से दक्तावें ती हृग्‌ का पूर्ण दित दोवे। क्‍योंकि विद्वानों के विरोध से झविदवानों में विरोध बढ़ कर भरे विध दुःख की वृद्धि ओर सुख की हानि होती दे | इस द्वानि ने, ज्षो कि स्वार्थी मनुध्यों को प्रिय दै। # म्रतुष्शें छो दु छसायए में डुडा दिया द|े। इनमें से जो कोई सार्यज्ञनिक द्वित हदय में धर प्रदत्त ड्ो है, इसमे स्वार्दी छोग पिराध करने में तत्पर दोकर अनेक प्रकार विप्त फरते हैं। परर्तु "स्थाई झूपते लानत सरवेग कथा दिततो देवपातः” अर्थात्‌ सर्वदा सत्य का विजय और असरय का परा* अरोर सत्द ईी से विद्वानों का मार्ग विम्दृत होता दे, इस रृढ़ निश्वय के आलस्वत से आए छोग परोप+! करने से उदासी होशर कमी सतवार्थ प्रकाश करने से नहीं दटते धद्द बढ़ा हक़ निश्यप दे कि “यत्तः एदिपनित रिशाये मृत परम” यह गीता का बचत दे इसका अभिथाय यह दे कि शो विदा ञो उर्देशाति ले कम हैं दे मधम काने में दिव ले मुस्य और पथ्यात्‌ अस्त के सइश इोते दें। ऐसी वा को दिक्ष से धर « हैंड इस प्रम्ध को रचा दे धोता पाठऋगण मी प्रथम प्रेम से देश के इस प्र का सत्द सान्पये झागइर थवेद करें। इसमें बइ अप्रिव्राप रक़्या गया है कि जो झो सब मतों सत्र बड़े हैं बे सद में अदिदद होते से इनका स्वीकार करके जो मतमतास्तरों में प्रिध्या 4 है, इब छा कप इन डिदा टै इसवें यह मी असिवाय रकया टै कि शत्र मतमतास्तरों की गा अडट हरी बातों का प्रइशश ऋर दिद्वान्‌ अविद्रान्‌ सत्र साधारद प्रनुष्यों के सामने शक्‍या है, जि सदसे सह कर! दिविनर इ'डर परस्पर धेमी ले पु सत्य मतस्थ होवें।! यथपि मैं आरयादर्स कल्बओ हुआ शोर इसरा हैं तयएय देते इस देश छे प्रतमतास्तों वी भूटी बातों का पक्तपात मे दत्दाजपद दशप्श छरता देखे ई? दूसरे देशस्थ दा मतो श्रतिवाणों के साथ प्री बर्चता है। शैसा -

| षालों के साथ मनुष्योश्नति के विषय में थर्चता हूँ पैसा विदेशियों के साथ मी; तथा सइ सद्धनों को ; भी यर्सता योग्य है क्‍योंकि मैं भी को किसी एक फा पक्षपाती दोता तो जैसे आजकल के स्थमत की | स्तुलि, मएडन और धचार करते और दूसरे मत की निन्‍्दा, हानि और पम्द करने में तन्पर होते हैं येसे ; मैं भी दोता, परस्तु ऐसी बातें मनुष्यपन से बाइर दैं, फ्योंदिः जैसे पश्च बलवान होकर निर्ईलों को दुःख देते ओर मार भी डालते हैं। जब मनुप्य शरीर पाणे वैधा दी कर्म करते हैं तो थे मनुष्यस्थमावयुक्त भर्दी किन्तु पश्चयव्‌ दें। झोर शो दश्वान्‌ धोकर नियेत्रों की शद्दा करता दे थद्दी मनुष्य कष्टाता दे, भर जो स्वार्थथश दोकर परदानिमात्र करता रहता टै, यद ज्ञानों पश्चभों का भी दढ़ा मा दे। झअद झारयो- धर्ियों के विषय में विशेष कर ११ स्थारइवें समुल्ञास तक लिखा है। एन समुल्लासों मे शो कि सरपमत्र प्रकाशित किया दै, वह बेरोक्त दोने से मुझको सर्देथा मस्तम्प द|े। भर जो मग्रीन पुरादा शग्बादि प्रग्थोक्त दातों का छणडन किया दे वे स्यकब्प दैं | जो १२ धारइपें समुल्लास में दर्शाया छात्रा बा मत पद्धति इस समप क्षीणास्तसा है भर यद धार्याक बोर मैन से बहुत सम्द्ध अनीश्डरबादादि में रखता दे यद् च्रार्धाप्य सइ से बढ़ा सास्तिक है। उसकी घेष्टा का रोकता अयश्य है कपोंकि हो मिच्या बात रोशी ज्ञाप तो संसार में बहुत से भनर्थ प्रदूत्त हो शाये। धार्वाद का हो मत टै घद् तथा दोद भौर मैन का ज्ञो मत है, दद्द भी १२ थें सपुझास में संछेप से लिखा गया है। और बोदों हया जैनियों का भी यार्षाक के मत के साथ मेल है भोर कुछ थोड़ा विरोध भी टै। भर शेग भी बहुत से अंशों में थार्पा रु भोर बोदों के साथ मेल रखता दे चोर थोड़ीसी दातों मैं भेद दि। इसलिये शेणों छी प्रिप्त शाणा गिनी ज्ञाती है। यह भेद १२ बारइपें समुशास में लिख दिया टि परधापाष्य बडा धममझ तेहा | शो इसका भेद द॑े सो बारहवें समुन्ास में दिछाया दि। ौद और ऊँग मत का दिष भी लिखा है। इनमें से पीद्धों के दीपधंशादि प्राखीय प्रस्थों में पोशमतससंप्रद् सपेदर्श गरोप्राद्द मे दिशकाया है, हारे से पद लिणा टै। और जैनियों के मिप्नलिलित सिद्धास्तों के पुस्तक हैं, इसमे पे घार सूच् पत्र, जैसे-- झावश्पकरूत्र, विशेष भ्रावश्यरुसुइ, दशयेधालिकरुत्र भोर पादिदगपज # ११ ( स्पताह ) धा, जैत--१ आयाशंगयत्र, सुप्टांगपूत्र, धादांगघुइ, समपरायोगदत्च, भगवर्ष'णदबे, हावाधमे- काथापत्र, दपास शदशासूत्र, शस्तगइदशापत्र, अगु त्तरोबदा पु, १० विरास पृत्र, ११ ्श्नण्या- करतपुत्र १२ ( दारद ) उतींग, जसे--१ उप्धागुत, रे रायररोगीदृत्र, थे शीवानिंगमग्‌ व, पथ धरा: एश्न, £ जंए्द्ीपपप्मतीए्‌र, घब्द्पत्रतीपुच्ष, प्फ्थतीपुत्र, गिरियाद«सृत्र, कप्ययाद४, कपबवदी सपाएत्र, १६ पृष्सिषायत्र और १४ पुष्यय लिया » बसशपरु, जसे--१ इक राध्यपशरूइ, निशीयपूत, $ पर्पपत्र, स्यवद्स्यूत्तञ भोर जीवर्एप्पत् ४६ छेद, शसे - मशागिश'ध हर इच्छ- भारत, २मद्दानिशीयणपुषायरापृत्र, मध्यमवाघताएच, ७विदनिशत सत्र, 2 ऋरो्एन्ह ले दृज, एप्प बरशाएुत्र १०( दशा ) पफ्यासत्र, जेसे-१ अनुश्पर्णपुद, पध्यस्शत्पूर, हे तदुत्तवेपा लिक श्‌, के भक्तितरिशानयुत, मद्टाप्श्वात्यातपत्र, भ्रन्दाविश्पदृत्न, गणापिहपराुइ, पसरत्समारणिय्र, देदर स्तमग्यूत्र झोर १० संसारपत्र शपा मस्दीधूष् पाग'दवा ुत्र भी शा्माद्कू साबत्रे है एशफ, झमे--१ पूर् सद प्रग्पों बसे टीका, निशक्ति, $ घरणी, भाष्य, से छार इःदपद छोपर सवा पूछ विल्लफे प[शञाह कषाते हैं, इसमे हू टिएा अवपदों को बहटों मासते। झरोर इनसे मिप्र भी रेक घम्द हैं दि जिमको सेगी खोत मारने टें। इन मंत्र पर दिशेष दिययार १६(दारइ्े ) ,शास मे हर शॉाडफिएं झनिपों के प्रण्चों मैं लाएं चुनटरः दोष हैं, और इधर) यह भी स्वमाद दे कि के कएदा ध्द दूसरे मत बले के दाए में हो था दएा दो तो छोई इस प्रस्य को ऋषण्राज कट्टर हैं, दद दाह दशक समिध्पा है, बयोकि फिपको कोई माने कोई नए रघसे बद भस्य सेग मत से दाइर करों हो सदरा। हा ! शिफ्तको -

हा

रे सूमिका

कोई माने और कमी किसी जैनी ने माता हो शप तो अप्राद्य हो सकता दे; परसतु देसा हो प्रन्थ भईों है कि जिसको कोई मी भैती नहीं मानता ही, इसलिये शो जिस प्रस्थ को मानता थोगा इसे प्रम्थस्थ विषयक साएडन सएडन सी दसी के लिये समझा ज्ञाता दे | परसतु कितने दी ऐसे मी दैँ हि उस प्रन्थ को मानते जानते ह्वों वो भी समा था संवाद मैं बदल जाते दें इसी हेतु ले शत क्ोग ्रपो प्रन्थों को छिपा रखते हैं। ओर दूसरे मतस्प को मदेते में घुताते और सम पढ़ाते, इसलिये कि रस देखी भसम्भव बातें भरी हैं झिनका फोई मी उत्तर जैतियों में से गदों दे सकता भूठ बात को पते देगा दी उत्तर दि

१३ थें समुन्नास में इंसाइयों का मत लिया है। ये लोग यायबिल फी अपना धर्मपुम्तऋ मां

हैं। इनका विशेष समाचार उसी १३ थें समुल्नास में देश्षेये। थ्रोर १४ चोदद्दयें समुन्नास में मुर्त मानों के मत विषय में लिखा दे, ये खोग कुट्ान को अपने मत का सूलपुम्तक मानते दें इनका मै घिशेष व्यवद्दार १४ यें समुल्लास में देखिये | ओर इसके झागे यैदिक मत के विषय में लिखा दे, जो को इसे भ्रन्थकर्त्ता के तात्पय से विरुद्ध मनसा से देखेगा ठसको कुछ भी अभिष्राय विदित ने होगा। करोंडि बाक््पाथेयोध में चाए कारण होते हँ--आकादत्ता, योग्यता, आसत्ति ओर तात्पर्य! झव इन चाररों दातों पर ध्यान देकर जो पुरुष प्रन्थ फो देखता है, तव उसको प्रन्ध का अमिप्रय यथायोग्य विदित होता है “आ्राकाडत्ता” किसी विषय पर घक्ता की ओर वाक़्यस्थपदों की झाकांका परस्पर होती है। "योग्पर्ता यद्द कट्टाती दे कि जिससे जो हो सके- जैसे जल से सोंचना। “आसत्ति” जिस पद के साथ जिसश साथन्ध दो उसी फे समीप उस पद का थोलना या लिखना | “तात्पर्य” मिल्रके लिये बकरा मे शददीः रुघारण या लेख किया दो उसी के साथ उस वचन था लेख को युक्त फरना।यहुत से हृढी दुरापरी मलुष्य दोते दें कि जो दका के अभिप्राय से विरुद्ध कल्पता फिथा करते, विशेषकर मत याले लोग क्योंकि मत के झाभ्रद्द से उनकी चुदि अन्धकार में फंस के नष्ट हो जाती दे! इसलिये जैसा मैं पुराण, ज्ैनियों के प्रत्थ, धायविख ओर क्वरान को प्रथम दी धुरी द॒ष्टि से देखकर उनमें से शुर्णों का प्रइ५ ओर दोषों का त्याय तथा अन्य मलुष्यज्षाति की उन्नति के लिये प्रयक्ष करता हूं, येसा सथ फो करना

योग्य कप इन मतों के थोड़े द्वी दोष प्रकाशित किये हैँ, जिनको देख कर मनुष्य लोग सत्यासत्य मत

का निर्णय कर सकें और सत्य का प्रदरण ठथा असत्य का त्याग करने कराने में समर्थ होवें। क्योंकि

एक मलुष्यशञाति में बदका कर, विदद्ध धुद्धि कराके, एक दूसरे को शत्रु बना, लड़ा मारना विदानों के

स्वमाष से यद्विः दे पथपि इस प्रन्थ फो देख कर झविदान लोग श्रन्यथा द्वी बिचारेंगे तथापि बुद्धिमान

खोग यथावोग्प इसका अभिष्राप सममेंगे, इसलिये मैं अपने परिथम को सफल समभाता और अपना

अभिप्राय सप सझ्नों के खामने धरता हूं। इसको देख दिखल्ला के मेरे थम को सफल करें। और इसी

प्रकार पच्पात मे करके सत्या्थ का भ्रकाश करना भेरा वा सब मदाशपों का मुब्य कर्तव्य काम दे।

सर्वान्दर्योमी सच्चिदानन्द परमात्मा अपनी कृपा से इस भाशय को विस्दव ओर चिसस्थायी करे |

अ्रद्धमति विस्तरेय बुद्धिमद्वग्शिरोमणिषु इवि मसूमिका

हे

रे

स्थान महाराणाजी का इदयपुर, [। (्‌ स्वामी ) दयानन्दसरसती

आदपद शकफ़फ्ड सेपत्‌ १६३९

# झोश्मू #

जल लेन्ण लोक

सबिदानन्देशराय मगो नमः

/क>क-+-क->क

का

अथ सत्यार्थप्रकाशः

प्रीसरिए' *- ग्रधादय | बजा (।

प्रधमसमुझ्ासः

ओप शक्षों पिप्रः श॑ परुणः शर्मों मबतवप्पमा शन्न इत्रो प्रशम्प्िं: शप्तो पिष्एुकरुक्रम: ॥। नमो अप्य॑ण नमुस्ते दायो त्वमेयन प्रस्पर्च प्रशांति त्वाजुव प्रत्यर्ष पप्मे यदिष्यामि शुखवे पृदिष्यामि सुर्त् यदिष्यामि तस्मामंदतु सदुड्ारंमयतु अब॒तु पापवतु बफ़ारंप्‌ ओरेम शाम्तिश्शान्तिश्शाओविः १॥ अर्थ--( भोध्म्‌ ) यद झोंकार परमेश्यण का सर्वोशम शाम दि, क्योंकि इसमे जोश,

- * तीन अध्षार मिक्त कर एफ ( शोझ ) समुदाप हुए? दे! इस एक नाम से एरमेशपर के रटरुत

भाते हैं, जेसे--अक्ार से विशदू, अप्रि और पिश्यादि | उकार से द्विरएयगर्म, वायु और तैड्सादि।

से ईश्पए, आदित्प और प्रायादि भारों फा धाचक ओर प्राइक दे उसका पेसा ही पेदादि

२. राों मे बपए ध्यादयान किया टै कि प्रकरशप्मुकूल ये सब ज्ञाम पर्मेशर ही के हैं। ( पक्ष ) परमेश्वर “, मित्र अरथों के बाथक विराट आदि माम क्यों नहीं है प्रझाएड, एथिवी आदि भूत, एन्द्रादि देवता वैधकशार्प में शुएद्यावि झोषधियों के भी ये माम हैं था मई है [ उक्तर ) हैं, परम्तु परमार्मा के *हैं।( प्रश्ष ) रेवल देयों झा भ्रघण इस हामों से करते दो था भद्दों। ( उत्तर) आपके प्रदण करने क्‍यों प्रमाण है (प्रश्ष) देव सप प्रसिद् और दे उत्तम भी हैं, इससे मै उसका प्रडण करता हे। डक्तर ) क्यो परमेश्वर अप्रसिद भोर उससे कोर उत्तम भी दे दुलः ये नाम परमेश्यर के भी क्‍यों मानते है जब पर प्रेश्पर क्ृप्सिय झौर उससे सुरप भी कोई श्टी लो उससे शक्तम फोई फ्णेकर हो

+ इससे आपका पद पाइना सत्य गहों। क्योंकि: आपके इस कटने में बदुतसे कोप भी आते दें '* _.*वपस्थित परित्यज्यानुपस्थितं पाचत इति धामितत्याप/" किसी ने किसी के लिये भोजन का + इस थे; कष्ठा कि ऋप भोजन चरीडिये शोए थ्द ज्ञो उसको छोड़ के अपात मोजन के. लिये शहां

'घ आम्रण करें उसको दुद्धिमान्‌ जानता चािये, क्‍योंकि यद्द उपस्थित माम समीप भाप हुए पदार्थ «छोड के अनुपस्थित अर्थात्‌ अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति के छिये शम करता दे इसहिये ऊसा चद ,७० « नहों पैसा दो आपका कथन हुआ क्योंकि आप उन विशेद आदि भाममों के हो प्रसिय

//.. परभ्रेशर और अश्याएडादि उपस्थिठ अर्थों का परिस्षाग करके असम्भप और अनुपस्थित के पर में धम करते हैं। इसमें फोई भी प्रमाण था सुक्ति महाँ। शो आप पेपा कटह्ेंकि | + प्रफरण दे, वर्शा उसी का भ्रदए करना पोग्प दे, सैस किसी ने किसी से कट्टार

34

हल '

शा >

रे छत्यायेंप्रकाशः

त्प॑ सै्धधमानय” अर्थात्‌ सू सैन्थध को हे आ, तप उसको सप्रय अर्थात्‌ भ्रकर्ण का पिचार कप्श भपश्य दे क्‍योंकि सैन्धय नाम दो पदार्थों का है, एक घोड़े और दूसरे लवण का। जो स्वस्वामी गमनसमय हो तो घोड़े और भमोजनकाल्त हो तो लवण को ले आना उचित है | और ज्ञो गमनसमर गे लघय झौर भोजव-समय में घोड़े को ले आवे वो उसका स्थामी उस पर क्रद्ध डोकर कहेगा किए निर्दुद्धि पुरुष द|े। गमनलम्य में लयण भोर भोजनकाल में घोड़े के लाने का फ्या प्रयोजन थार प्रकग् एपित्‌ नहीं दे, नहों तो शिस समय में जिसको लाना चाहिये था. उसी फो हाता | जो तु डे प्रकरण का पिचार करना आयश्यक था यह सूने नहों किया, इससे तृ मूल है, मेरे पास से चता शा इससे क्या सिद दुआ कि हहदों किसका प्रइए करना डचित हो यहां उसी अर्थ का प्रण करना चाहिये! सो ऐसा दी इम और आप सद स्रोगों की प्तानना ओर करना भी चादिये झथ मन्चाथे

ओरेगू सम्पन्न १॥ यशुई अ० ४० | में> १७

देखिये थेदी में ऐसे प्रकरणों में 'ओम्‌' आदि परमेश्पर के नाम दें

आोमित्पेतद्शरथ्द्वीयमुपासीत रे छान्दोग्य उपनिषत्‌ [ मं० ]

आपस्पेतददगमिद सर्द तस्पोपस्या्यानम्‌ रे साणएडक्य [ सें० १] - जद ले, 4

सर"े देदा यन्‍्पइ्मामनन्ति हपारेैप्ति स्वोशि यद्वदन्ति यदिच्छम्तों ग्रद्मवर्मे चर्म हे पं संप्रोग प्रवीस्पोमित्येतत्‌ कठोपानिपदि [ वन्नी मं० १४ ]

प्रशामितारं सईपामशी्यासम्णोरपि रुपभा्म स्वप्नधीगस्प विद्या्ति पुरुष परम |!

एमोये ददस्तयक्रे मनुमस्ये प्रनापतिं इन्द्रमेक परे प्राय पपरे प्रद्य शास्रनम्र ॥|

मतु० भ० १२ [ छो० १९२ १२३]

छृष्ा से रिप्णुः से रुदरस गिदस्मोप्चरस्स परण। स्थ॒राद। हू इस्द्रस्स फालागिए घन्द्रएाए 4 वैवर्प उपनितत इस्द् मित्र य॑णमप्िमांदुस्थों। दिव्यस्स संपर्णो गुरुमव | शई १६४ बहुपा दंद मप्र ये प्रतिर्सिनिमाहुए॥ ८॥ मं० सू० १६४ मं० १६)

भ्रम मूसिस्ण्य्िकिसि खुबघाप। पुअ॑स्य झुबनस्प घर्तरी पृथषितती येच्छ पृथ्वी रा दिए झा हिंणडीए & ॥। यह्ः भर १३ में? १८ हि

दो सट्टा रोइभी पश्वच्डव इन्द्र: हूरपेमरोचपत्‌ इसदरेए दिया झुपतानि बेमिर ऐऐ झारार इन्द्र: २१० ॥। साझोद द्रपा५ विरू ८। में०

५... टिपाप उहो बाप सर 24 बर्म दो मूतः सर्वेष्येशों यत्मिस्सई प्ररिप्टिवम्‌ रै! झाप्पार इपरड ११। मूस में है ।।

करे बाहर दब अनकों दे किये ये हात्वपे वईं! दि दि जो देसे प्रयाणों में झोंटापदि गे के ,प्ररेक्षाफा बा ऋडए हटा है, दइ लिश् राय सया दर मश्वर का कोई मी नाम इस्थक नहीं जे कक इसेड्ा आदि रे कल्प का्पि कान इसे हैं। इससे बह लिए हुआरि कई गोदिश, डा

अष्क्रेक ऋार शडो स्शावाफिस अऋूपो पाकर हैं। “झोसमू इएंदु दाम सार्थक हैं सेरो (झा वं*

प्रष्मतपृहारः $ृ

॥डचरीलटोशू, ब्याष ए्ामिय ध्यापशश्यान रूप. रण प्पो इषाच'टट एवम इक्ता करने हे चचझोग मं, आकाशवाद दा व' होगे हे) (कप छोर गाब रे बहू) इते के (ह। ईयर चग काम है ७१७ ओवि्य०) | झो३भ ) जलता शाम है कौर के भी लए भहों दंप्ता, शपरी थी पदाधना अप हे! धोप्प है. ऋणा की महा ॥७२॥ (कताप्राद१०) भा चैधादि शार्मों यै पर घैत्तर था प्रधान और हि शाप (छो रेपू। हा टै, ६हव शाप ऋषि, कण हैं ६६ धर रहाक ) कपोदि: पद देगु रव धमोतुष्टाण्द्रप सपशधरणा शिपदा रु धन और इक पे चतले छोर किएदते एम बी एद6ा बह प्रह्मघपो ऋध करत सवा काय "भाध्म" दै॥ ( प्रह्ठाहिदा ' ) हो पर कते शिक्षा देंगे दशा शष्म से पृर्ध पदप्दाशावछूप, सपाजिष्य बुद्धि हो हाशरे धोष्य है, इक परमपुपद काशशा बटिये १8 ओर बदधदाश होने से "आदि", विदान- ६द६प हम के आग, प१ए बा पाशन बाते सर "प्राायति', छोर पा रिक्व दै दान होने से! (7२०, रब का शदतमुण् होगे से प्राण", कोर गिशालर प्यापएड होगे से परमेध्यर था भाप "प्राव" है ६॥( शा प्रह्मा हुए दिच्तु $ ) शार शपयाए्‌ के बाने दो * प्राय, इस्दच ध्यायडः होडे ले 'पदच्तु”, दृपों को दए४ 3ेके शलाने से पद ' प्कष्टमप झोर पर का भरयाटाकर्ता होरे से "टच, “व: स्वेमश्गु| मे शदाति ते पिरयति हद्क्ष्म/) ६१॥ “दः इदचर्ष शांशते ध्दण१त0॥२॥ “पाउप्रिप्ए बताए. बालदिता प्रशपकर््तास बालाहिटीएइदए 0 ६४॥ ( ऋत्तर। जो गर्ंइ प्यार हदिनाएँ, (<शराद। सयप प्रराशध्दरय भोर छाल! दि ) प्रह्मप है बरद अ। बगल ओए का छा भी दब दि, श्यहियदे परमेशर का माप काआपि, €५७॥ (६४ पिच ) झो एइ भट्टिदीद गररप प्राप्र दरदु दे, झरी दे; एप्द्रादि रद शाम दें। अधुचु ए्ेदु पदार्पेचु भदो दिव्य" 'शोधरानि कदोदि पालमामि पूर्णाति बर्मादि वा पम्प सः” "यो यु्शास्मा हर गशशमार" “थो सातरिश्दा घायुत्वि बत्रवान शा मादरित्य" | दिप्य ) हे प्रकृ्पादि दिग्य पदार्थों में ब्यार, ( शुपर्य) श्सिदैः उत्तम पालन ओर पूर्ण कर्म टैं, ( गणग्मान ) शिएका भाग्य अर्थात्‌ स्परूप अ्रद्दाद है, [ प्रादरिश्या ) शो दायु के समान अलम्त इसपान्‌ है; इसलिये परमात्मा फे दिप्य, शुपर्ण, शाधरशन्‌ और स्‍्ातरिक्षा थे नाम हैं। शेष हामों रा भर्घ झागे बिरेंग ॥८० ( मूमिप्सि० ) *प्रपन्ति धूतानि पस्दां सा भूमि” शिलमे रद भूत धाएी होते हें इसालव रेशएर का गाम 'मृत्रि" है। शेष गाशों का अरे झारे किखेंग॥ ६३ ( एप्रो मद्दा० ) श्स मर्द में इस्द्र एश्मेश्यर दी का माम है, शसहिये बढ मशरण लिशा द|ि १०॥ ग्राणाए ) असे प्राय दश सर शरीर और इम्द्रिएं द्ोती है वैसे परप्रेः्णर दे; यश में सदर शव रइता दि॥ ११ इस्पादि धमाणों के टीए टीफ अचों के शातने से इत भामो बरके परमेशर ही वा प्रइए होता टै। क्योंकि ओध्म ओर अग्य्यादि लामों के मुख्य अर्थ से परमेधयर दचा प्रदए होता टे। जैसा दि: व्याकरण, नियत, प्राह्मण, दशदि ऋषि मुनिषों स्पाण्यानों से परफ्रेशर - दा भ्रण देखने दे. छाता दे दैसा प्रएण करना सबको योग्य दे परन्तु “बोशम० पद तो बदल परमात्मा टी बा शाम दे भोर अप्ति आदि हामों से पप्मेखर के प्रहण में पका और विशेषण निपमझार्क है। इससे क्‍या सिद्ध दुआ कि जहां स्तुति, प्राथगा, उपासना, सर्दए, व्यापक, राद, सनातत भोर शष्टिकर्ता आादिविशेषणलिण हैं, द्दी इन नामों से परमश्पर का प्रदण होता है और शा < ऐसे प्रर0 है कि:-- ह। व्राइमायत पिगलों अधिपुरु: | थोओट्रपृ्े प्राण धुसोदप्रेजापव सेन देवा भर्यजस्त ददाद्वमिमयों पुर। यजुर झ० ३१ रुष्पाडा एकस्पादात्मन भादाराः सम्घृता आकाशादापु।। यायाराि) | अग्रेप) ) अड्औप भृषिद्री शृधिष्या गोपधयः झोपधिमस्पो:अम्र ) भन्नाद्गेता रेतसः धु़प: | से वा दुप प्रसुज्मपः [ प्रद्ा० बच्ची ऋर० १३ है ५.

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) सत्पापध्रशाशः

था टैसिरीपेपनिपड का ददत है। देसे प्रमायों में बिशद्‌, पुयद, देव, भाकाश, यायु. भपि, हड, भूमि ऋपदि माय लोोकिऊ पदार्थों के होते हैं। क्‍योंकि जुदा उत्पत्ति; श्विति, प्रशप, झश्पणश, शेड, द४प आदि दिफ्रेषय भी शिएे हो बह परमेशरर का प्रइण गद्य होता। यह उत्पत्ति आदि ब्वपद्दारों पे चृषछ दे। झर ब्रेड मन्त्रों में झापत्ति आरि स्पवइार हैं इसी हो यशां बिशद आदि मामों शे पए- पाया छा ध्र्ाए रू दोहे सॉसएरी दराधों का प्रदया होता दे। फिस्तु श्डा सर्यशादि विशेषश हों वह्श रे पमामा कौर हुये + इशया डेप, प्ररव, छुश, दुएशा चोर ऋल्पणारि विशेषय दो यहां जीय का प्रइण हल दै। देशा शरद समझता धादिरे। करोंकि पर्मेश्यर का जम्य मरण कमी गद़ी दोता। इससे [धरम ऋधहि आाद बौर हत्या हि विफेदापं से जगत के लए भोर जीपारि पदाथों का प्रदष्ठ करता डचित है, दर बैपटर आए #ई। ऋरइ किय क्रशपर वित्ार आरि भामों से दर मेरवर का गइण दोता दे, थइ मकाए गीये [कर ध्रहनो कर ओंपुजप्३रे:॥ (वि) शसर्भबूषेक ( राज दीशे ) इस घातु से किप प्रशणण्करनते हे (व हू कद वि होता है। "चो किरिपं माम चरापचर जगद्ाज्ाति प्रकाशवतिहा विशद ।४/५६३ दाद को दई बचत के क१प्‌ को प्रकाशित करे इससे "विधर/ भाग हे परगरपर का प्रश्ण दोगा हैं| इन कॉलूक्क्‍ए ) (झा, ऋति, इव शायरक्त ) चाए हैं. एको "“शहि" शण गिए दोता दे रकाऋूछा हक कह बाप दि कि, चुदाई राम शाक्तार:” "गोप्शति अध्यते३गायहायरति था सोडप- हा" के इफतापइाइह कारक होकर, हत होते अर पूजा करने योरत दे, इसरो उस परमेरवर का भासे कक है, (कक हनी ३) हक घाहु से विक्व/ शाद विद दोता है। "विशरित प्रषिष्याति शाथोँ: कयाक फहतटक आफ रक बस्‍्थक १९ ह१३ शर्वनु गृतितु प्रिष्ठ हर विश्व ईश्यर७। जिस खा रह १९० है कछ &॥ ३१7१ अर ३६३ हैं ऋषाणा कर पखतै धयता ६) प्रतिष हो रहा है इरालिय बगल प्योएवर आाहस पढ़ है. दस हकारों 94% छकारमाच है दप्ता दे। 'वयोतिति दिए हि्ो ये दिशा मैक & अर ७३ के गे" “पा दिल्कतालर हवा दमा सैज़सां गाय इपलितिसिचधधिकर्णंस दिप्पा कह” टिक्ततं (६ #फरूओ ऋाइ प्रटकक हा विशके झापाह ॥से हैं अथवा जो दर्योदि सैजर्पदप का थे ४७४ कर काएक कोह सलकापतपाख है इस इत परमिक्यर का भाग "दििवगर्त" है। इसने 2 ३४६ # #हक फभआ है

हे पक है रकपूर $. #+ ४७ ८७३ कम श्रत: 57

अगीनू मे दधार परी पाएुतेमी $४मं है पइरद रैए ! 5३ ४» १३१ |

बेल्व ने कंप्यों है “दिए क्ादादी। के फ्म्ेड्दा ही का आहला इासा है; | का सतिराम्यशर्यों: )

कक झाह के “यु इच्च #िएा इंचय हैं; वधम्कन दिस. था बादि चर; चर व्रत इरति बिता डचाए # अत के आटा, डह फल कर प्राण, डइत छा प्रवात करता झोर खत अजगानारों कुसूथ है इकाई कझे देफदत का कार काय है, लि जिदार | इग चानु हि "जड़ हो इससे इक अप & की शाप शरद हाट डट आशाच बटयप्इाश आर मुधाविलेल्ावी क्राफ हा इकरद %८ १३ छक्का हैं उमड़ ४५ रैपडग छा बस्य हक है; दव्याडड आम्र्थ इदारशत मे धरक दल हु. पद, इफ शा4 ऋू हिडजओ द्राड निद हाल हि। बईए हरें।वर्तकत पर्षत ले हा फेइकाक २६ खाइज्साओ शत कोर अजनद पडचफ है इस इसे परड्ाका का बाय दैेउवह है. मं ऋषभात्यव सब बड़े हक कि तल हज हकरे कद्रव अऱडे के ऋितिएुा कृत सिक इस है. बयान िियएा प्रकथ को स्ाायोल के दल पे कर्च वन्‍्क,7 सदर हा दिमाज ऋमी मे हो छपा शफया का किए अंडा है कु ऋषणोकर | प्र पूपेक कस यसु से “्रड़ा भाह इसमे

प्रथमसमुन्नासः

तदित करने से “प्राइ/ शब्द सिद्ध द्ोता दे। “यः प्रकएतया चग5ध्चर्स्य ज्ञगतो ध्ययद्धारं ज्ञानाति प्रश;+प्रश एव भाश/” जे निर्धान्त शानयुक्त सव चश$चर जगत्‌ के ध्ययद्वार को यथावत्‌ ज्ञानता दे इससे इंश्र का नाम '“प्राउ” दै। इत्पादि नामार्थ मकार से शुद्दीत दोते हैं| जैसे एक माधा से तीन अर्थ यहां व्याष्यात किये हैं बसे दी अन्य मामार्थ भी झोफार से ज्ञाने ज्ञाते हैं। ज्षो ( शन्नो मित्र; शे थु० ) इस मन्ध्र में मित्रादि माम दे वे भी परमेशर फे दें, फ्योंदि स्तुति, प्रार्थना, उपासना थरेष्ठ ही की की ज्ञाती दे। धष्ठ उनको कइते हें जो गुण, फर्म, स्यध्षाप और सत्य सत्य ध्यवद्वारों में सर से अधिक दो। डब सप थ्ेष्ठों में मी घो अत्यन्त थ्ेष्ठ इसको परमेश्वर कहते हैं। मिसके तुस्य फोई हुआ, दै और दोगा। ज्व मुल्य नही तो उससे थ्िक फ्योंकर द्वो सकता दे! जैसे परमे)बर के सत्य, स्याय, दया, सैसामध्ये और सर्वे्ष्यादि अनन्त गुण हैं येसे अन्य फिसी जड़ पदार्थ था ज्ञीव के भट्दों ह। जो पदार्थ सत्प दे उसके पुण, कर्मे. स्वभाव भी सत्य होते हैं। इसलिये मनुष्यों को योग्प दै कि परमेश्वर दी की स्तुति, प्रार्य ना और उपासना करें, उससे प्रिप्ष की कमी करें, फ्योंकि प्रह्मा, पिष्णु, मद्दादेष नामक पूयेज मह्यय विद्वान, देत्य दामयादि निरूुए मलुप्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर शी में विश्यास फरके 3सी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करी, उससे मिश्न की नहीं की पैसे दम सब फो करना याग्य दे इसका विशेष बियार मुक्ति और उपासना पिपय में क्रिया ज्ञायगा | ( प्रश्न ) मित्रादि नामों से सच्ा और इन्द्रादि देयों के प्रसिद/ घ्यपष्टार देखने से उन्हीं का प्र:ण करना घादिये | (उत्तर ) यद्वां उनका प्रदण करना योग्य महीं, क्‍योंकि लो म्रभुप्प किसी का मित्र दैषदी अन्प का शत्रु भौर किसे से उदासीन भी देखने में ध्राता दे इससे भुझ्यर्थ में सप्य ऋादि का प्रदण नहीं दो सकता। किश्तु सेसा परमेभ्वर सब ज्गत्‌ का निश्चित मित्र, किसी का शत्रु और फिस्री से उददासीन दे, इससे भिश्न फोई भी ज्ञीय इस प्रकार का कमी भहों हो सकता। इसड्रिय परमान्मा दी का प्रदण यहां द्वोता दि। हां | मौण अथे में मित्रादि शप्द से सट्ददादि मरुष्यों ला पाण होता दै। ( भिमिदा स्नेहने ) इस धातु से ओणादिक "क्तू” प्रत्यय करने से “मिश्र” शख मिद इंटः है। “मेथति स्रिद्यति सिधते था समिश्रः” ज्ञो सब से स्नेट्ट करके और सद फो प्रीति इरैने पद है इससे उस पस्मेश्यर फा भाम “मित्र” दे ( घृ्ठ परणे धर ईप्सापाम्‌। इस धातुधों से रपाद टेस्ट प्रत्यय दोने से “वरुण” शघ्द सिद्ध द्ोता दे। “यः खर्बान शिए्ान म॒ुमुझूम धर्मात्मनों पृन्कयध ब८ शिफ्रमुमुचुमिर्धमास्मभिर्ियते धस्पेते था चणणः परमेश्यर/” जो आत्मपोगी, विश्वार्‌, मुन्धि रए दऋए- करने याते मुझ ओर धर्मात्माश्रों का स्थीकार करता, अथपा शो शिष्ट, मुमुझठ मुद झट डनफतओर से प्रदण किया जाता दे पद एंग्वर “यरण" संशक दे। अथषा "थरुणों मान दग मं: प्रसन्कर परमेश्यर सब से थे्ठ दै, इसीलिये उसका नाम “ययण ! दे ( गविध्रापणेट) हक इफ & न्ख्ना प्रस्यय करने से “अरपे" शप्द सिद्ध दोता दे ओर ' अस्ये" पृरददः ( माह हारे ) 8 श> हे *%>०- प्रत्यप दोने से “अयेमा" शब्द सिद्ध दोता द॑े। योड्यान स्वामिमों सफर 5: के रोति सोडयेमा" जो साप ग्याप % करनेधार मनुष्यों का मान्य झोर पार हु हद इस्फेडपछन ओर पुणएए के फलों का यधावत्‌ साथ निप+कर्सा टे इसी से रख एक: 2 (।दि करमेश्ण्ये इस धातु से टन प्रस्यय करने रे “इन्द्र” शद शरवेवान्‌ सदृति इम्दः परपेखर:” जञ' आलिल देश्पयेयुर दे इसी के बए ८८० द्न्ल्क्प्र *गृहह्‌" शपूरषक (पा सतले इस धातु से “शति” प्रत्पप दृष्द डपज इ> बीए डे को. दोन स्‌ "युहम्पति" शप्द सिद दाता दै। “यो पृषतामाधयाीश ३७ बसे २००... >- शो बड़ों से भरी बढ़ा भोर डे आाकाशादि प्रमाण बा बरू ह:स० हा कक हु जे पक लक

नन्हे

सद्यार्पप्रकाछः

«इृदस्पति” दि ( दिप्द सगमी ) इस घातु से “तु” प्रत्पप दोकर "दिष्ए” शब्द सिद्ध हुआ है। बवचपेडि सपामोति ाराधवरे डगव्‌ विप्युण घर और अऋचररूप हुगत्‌ मे स्पापफ इोने से परमात्मा का शाम 'दिपय दे। 'डर्स्मशार कमः पराकमो पस्प उस्क्रम:” अनन्त पराक्रम युक्त द्वोने से परमात्मा बय माय “डस्कस दे। डो परमात्मा ! इदकमः ) मइापराकरमयुक ( मित्र: ) सए का झुद़त्‌ शशिरोधी £ दए (शत) सुचभारक, बइ ( बरुयः ) सर्षोत्तम, यश (शम्‌) सुद्स्परूप, यह ( अर्यमा) स्थापाया, बइ (शम्‌) सुख्यचारक्र, बइ (इन्द्रः) जो सकल पेश्वगेयान,, यह (शम्‌) सरल इसेकशपैशापऋ, बट ( इशम्पति: ) सद का ऋशिष्ठाता ( शम ) पिधापद भोर ( विप्णः ) शो सप में स्यापर चरफेश्ााः है, दुष्ट राग ) इमारा कस्रायक्रारक मषतु ) शो

[ दपों से मघये ग्सो5स्तु ) ( दृइ दृष्टि घूदो ) इन धातुओों से "प्रह्म” शब्द सिद्ध द्वोता है। शो साई डे हद विशम्यपर, सगाई से बड़ा, अनम्त*कयुक्त परमात्मा है उस प्रढा को इम समस्कार अप हैं। है पा देवर ! ( खेर दत्पधे प्रफासि ) आप दी अस्तर्पामिकष से पर्पदा प्रहम दो ( त्वामेर झा कम चाॉंदिच्यानि) हैं ऋाए हो को ए"पश् प्रञा कट्ंपा, क्योंकि आप सब जगद में व्याप्त दोके हर को मिलद ही दाद हैं ( शत बचत) आप को येदर्थ यधार्थ भाजा दे उसी का मैं सप के लिये कपटरेश! आफ झअकाश मी ऋश्गा ( शाप वीीच्यामि)शा्प बोलूं, शाप मानू भोर सप्य ही कदंणा ( ऋत्तवादलु ) | छा देरी रक्षा औडिये( तदकारमबत)सलो आप शुझ भाप सारपत्कां फी रणां शहद बि किकसे ऋत्र हो ऋाइ मै मैरी बुडि छिर दोकर विदश कसी मं हो। क्योंकि शो भाग अर कपड़ा है हएए अप ऊपर को इधर विदय बडी अ्रभधर्म है। ( अपतु मासयतु पक्तारम ) पद हृशरी आत शत क्र हुई के धिई है। औये “करित्‌ कशित्‌ प्रति बदति हव॑ प्राम॑ गंष्घ गरुण” इहाये दी पार ३० दे हक अाक को | है हो इणय छो शा देशा लिद होता दे देते दी यह कि आप मैरी अपरप कर्ण अप! करण करके आओ रहिडि्क ऋण अचमें मे पुला सदा कह! पेसी कृपा मुझ पर कीजिये, का ०६ के कक्छन अर्थ #ारेच+। (७ ४म शात्य: शारिस! शान्ति: ) बह मैं लीत थार शारितपाठ की पई कप कक हैं हि सिएेइलाता कद हल रोधार मै सीख प्रकार के धुल हैं बक "झआाष्यारिमक जो झाएमां कमीक है ७“ एव्टो इक इंच आर छह उपर पीडाति होते दें। दूसरा “प्राधिभौतिक्त" जो शत, ध्याप और काएाईं के इगफ डशत है कमल “कार विक अर्धाय अतियूद्धि; झतिशीत, झति इस्णला, गत कोई इफदाएं को ४३ तक के इज है। ह4 वीह प्रदार दे क्‍्येशों से आप इम करों को दूर करके के स्यण्फक हक $गे हे कहा अगुच शकिय कक्‍रयोंडरि आप ही फत्यायल्वकंप, सब दांतार के के करण्एाक बट छोड ऋविइ मर कुकर ६+ कप्पापत के दाता दैं। इसलिए आप श्यर्य ऋपती के देश्या हो दा कफ & हपद 2३ टन हुए फि फिलसे कब बय परम का आाचरख झट झथर्म को छोड़ के अष्ध कब का इपक दो कोर इक से एकक बहू अूर्य आता अगतस्तम्पपशा' दस यदु्वेद के बपसे का करन धक इज कर छोर अमर आयात ओंबयत किले हैं तावुप: काशी अति रूपा: अब छत पडिओं कवि हैँ इक ऋज के कांप इजे लयह अवश्ाशनंप सब है प्रकाश करने क्‌ बदफे आए का क्र प्टिपए हैं; करे ऋशयारत्ते काल आग मे चअत्या शाप सिक इोला है “दोहन अयाश्थीपड के इटय्ा डी कट बडे आरल बी जिरब्टर छापक हु हा है। वरक्मप्स'च्धा डा के कक नए अजिजश ऋुलडिल्‍य अर: ट्िकृदल, मा परिमाम्यी को हब ड्रीच आवि से डल्ट्रड और कक आअपू से डा्था हाफ के मी ऋजिटटधद कह वहा हीयों हा झालतपापी अल्या डी दुसरे इंशर का डक फियाओा है फमां कक छा काल इनक है। “य ईआरेच अमवेंदू पर अपा सर विश्व: कई ऋषाओ सफ़र कमके फरिल्क शम्द बडे हीजही उसका शाप परदेलण है।

प्थमसमुन्लासः.

( घुज््‌ अभिषये, पूडः प्राणिगर्भविमोचने ) इन घातुभों से “सदिता” शब्द सिद्ध द्ोता है। “अमिषयः प्राणिगर्भविमोच्म॑ घोत्पादनम्‌ | पश्चराचर कगत्‌ सुनोति सूते योत्पादयति सविता परमेश्यरः” ज्ञो सब ज्यत्‌ की उत्पत्ति फरता दै इसलिये परमेश्वर फा नाम “सदिता" दे | (दिवु क्रीढ़ाविजिगीपाव्यवद्ार- चुतिस्तुतिभोदमद्स्वप्रकान्तिगतियु ) इस धातु से “देव” शब्द सिद्ध द्वोता दे। (कीड़ा) को शुद्ध जगत्‌ को क्रीड्टा कराने ( बिजियीषा ) धामिकों को जिताने की इच्चायुक्त (व्यवद्दार ) सब चेष्टा के साधनोपसाधनों का दाता (चघुति) ख्यंप्रकाशस्थरूप सब का प्रकाशक (स्तुति ) प्रशंसा के योग्य मोद ) आप झआानन्दस्वरूप और दूसरों को आनन्द देनेडाय ( मद ) मदोन्मत्तों का ताइने द्वारा ( स्वप्न ) सए के शपनार्थ रात्रि और प्रलय का करनेद्वारा ( कानिति ) कामना के योग्य और ( गति ) ज्ञानखरुप दे इसलिये डस परमेम्वर का माम "देव” दे। झथथा “यो दीव्यति क्रीड्ति देधः” ज्ञो अपने स्वरूप में आनन्द से आप दी धीड़ा करे अथया किसी के सद्दाप के बिना क्रीड़ायत्‌ सहज स्वभाय से सब जगत को बनाता या सय प्रीढ्ञओं फा आधार दै। "पिमिगीपते सदेवः” जो सब का औतनेड्ारा स्वयं अज्जेप अर्थात्‌ जिसको कोई भी नज्ञीत सके। “थ्ययद्टास्यति देवः” ज्ञो म्याय और झम्यायरूप ध्यवद्दारों का जानने दारा और उपदेश, “यश्वराचरं जगत्‌ च्योतयति” ज्ञो सद का प्रकाशक, “यः स्तूपते देवः” जो सव मलुष्यों फो प्रशंसा के योग्य और मिन्दा के योग्य हो, “यो मोदयति देयः” शो स्वयं आमन्दस्वकूप और दूसरों को आनन्द कराता, जिसको दुःख का लेश भी हो, "यो माथति देवः” जो सदा इर्षित, शोकरट्टित और दूसरों को दर्पित फरने ओर दुःखों से पृथक रखने थांत्ा, “यः स्पाएयति देवः” जो प्रखय समय अध्यक्त में सब ज्ञीषों को सुखाता, “यः कामयते फाम्यते था से “यः” जिसके सब सन्‍्य काम और जिसकी प्ापति की कामना सप शिप्ट करते हेँ तथा “यो गष्छति गम्पते थां देव:” जो सब में स्याप्त और ज्ञानने के योग्य दे इससे उस परमेश्यर का माम “देव” £ ॥( कुषि आध्छादने ) इस धातु से "कुपेर” शब्द सिद्ध द्ोता हि "यः सर्थ कुयति स्वष्याप्त्यायछादपति रू कुचेरों ज्गदीःवर!” झो झपनी व्याप्ति से सब का आच्दादन करे इससे उस परमेश्वर का माम “कुचेर” | ( प्रथ यिस्‍्तारे ) इस धातु से “एथिपी” शप्द सिद्ध द्ोता दे "यः ग्रथते सर्वजगद्विभ्युणाति एृथियी" ज्ञो सप विस्दृत श्गत्‌ का विस्तार करनेधाला दे इसलिये उस परमेश्वर का माम प्थिष्री दि। जल घावने ) इस धातु से "जल" शब्द सिद्ध द्ोता दि। “जलति घातयति दुष्टान्‌. संपावपति-अष्यकतएरमा- एयादीन्‌ तदु धह्म शलम” को दुष्टों का ताइन और अभ्यक्त शथा परमाएचों का अन्योडस्थ संपोग था दिपोग करता दे परमात्मा "हल" सं कद्दात! दे १( काश दीशे ) ईस धातु ले “दादा” शब्द सिद्ध दोवा दि, “पः सर्यतः से जयत्‌ प्रफाशयति झादाश:" शो सव झोर से जगत्‌ दा प्रशाशक दे इसलिये उस परमात्मा का माम “झाकाश" दै। ( ऋद भदयणे ) इस धातु से “अत” शप्द सिद्ध दीता थे

अपवेधति व्‌ भूगानि तस्मादर्स तदृच्यते ॥| आमस्रमहमभ्रमामसम्‌ | भदमघादोष्मपादोहमसाद३ २॥ तैचि० उपनि० [झजुबाब २। १०] अत्ताचरावरपएगात्‌ [ देदान्ददशने भ० १। पा" २। घ० ]

यह ध्यासमुनि शत शारीरिक खुद दे। को सब को भीतर रखने था सद को प्रत्ट रुपने

योग्य घराचर झगत्‌ का प्रशण करने धाहा टै, इससे ईश्वर के “इच्च' “हाई” छोर “ऋक्त। सम <। भोर को इनमें तीन बार पाठ टै सो आदर किये द|। जेसे गदर के फल में हमि इत्पशा हद

इसी में रइते चोर नए द्वो झाते दें देसे परमेश्वर ले बीच में सब रुयत्‌ की ऋषस्पा टै ( बस लिदास ) ...०

इस चातु से 'चसु" शप्द सिद्ध हुआ दि। “वसम्ति भुतानि दस्पिप्रथया या सर्चपु भूल्चु दसते झा नजर हि

कप हल

च् है सत्यार्थ प्रकाशः

धसुरीश्यर/” जिसमें सप आकाशादि भूत यसते हैं और हो सब में घास कर रहा दे इसलिये परमेश्वर का नाम “बसु” है। ( रुदिर अशु विमोचने ! इस धातु से "पिच" प्रत्यप दोने से “रद्र" सिद्ध द्ोता है। "यो रोदयत्यस्यायकारिणो जनान्‌ रुद्र:” ज्ञों दुए कर्म करनेद्वारों को रलाता दे डस परमेश्वर का नाम “रुद्र” दे था यन्मनसा ध्यायति उद्बाया बद॒ति यद्वाचा यद॒ति तत्‌ कर्मणा करोति यद्‌ कर्मेशा करे तदमिसम्पच्ते यह यजुर्वेद फे त्राक्षण फा धचन दे। ज्ञीय जिसका मन से ध्यान करता उसको बारी बोलता, जिसको घाणी से बोलता डउसफो कर्म से करता, स्सिको कर्म से करता उसी की प्राप्त ह। इससे क्‍या सिद्ध हुआ कि ज्ञो जीब औैसा फर्म करता दे वैसा डी फल पाता दे | जब दुष्ट 5 फरने बाले जीव ईश्वर की न्यायरूपी व्यवस्था से दुःखरूप फल पाते तब रोते दें और इसी पकार ईः उनको झलाता है इसलिये परमेश्वर का भाम “झरुद्” दे आपो नारा इति शओ्रोक़्ा आपो यै नरमूनवः ता यदस्यायन पूर्व तेन नारायुणः स्पृतः मनु? [ श्र० १। छो० १० ] * जल ओर जीवों का नाम नारा है, वे अयन अ्रर्थात्‌ निवासस्थान हें जिसका इसलिये ज्ञीयों में व्यापक परमात्मा का माम “तारायण” है ( चदि श्राह्यादे ) इस धातु से “चन्द्र” शब्द सि होता दि | “यश्वन्द्ति चन्दयति था चन्द्र” जो आनन्दखरूप और सब फो आनन्द देने वाला इसलिये इंश्वर का नाम “चन्द्र” दै। ( मगर गत्यर्थक ) धातु से “भन्नलेरलच्‌” इस सूच से “महत शब्द सिद्ध द्ोता दि “यो मह्ृति मह्नयति था मक्नलः” जो आप मद्ृज्तस्वरूप और सब ज्ीयों के मा