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(<~: |) % क, 10) 1 _ ------- छथ वदादिविविधद्चच्छघचप्रपाणघ्वमनितः < भीमसपरसदंसपरित्राजकाचाय्यध्रीम- ( ने [9१ (र 0 &&& 1 >) द्यानन्दसरस्वतीस्वाभिविरषितः £ 3 ‰& [9 > + (८९ सवधा राजनिथमे निशशेजितः | (4 `> आप्यैवत्सर १६७२६४६०२७ < | 4 (< (२ ठं & अजसेरनग्े ५६ ˆ वैदिक-चन्त्रालये सुद्ितः (6 (4 दयानन्दजन्माच्द ९.०३ (६ प्रे 61806160 पवना" 86८६००5 18 & 19 (4 प्रो 4५६ इए 1867, 4 . यं एकोसर्यी वार ि (६ २०००० सयत्‌ १६८४ {चर 12 शूरध =) | (९ < ______ ` 4६८ (= 17 कर 25

१८ ८.८ ८१.

1

घ्रोरेपर्‌ अथ सत्याथंप्रकारदास्य सुचीपनम्‌

१. ` भा )

विषयाः पृष्टतः-पृष्ठम्‌ विषयाः पृष्ठतः पृष्टम्‌ स्मिका ,., ६१-४ | श्रल्पवयसि विवादनिपेधः ... ०५१ गुणखकर्मायसारे वणंव्यवर्वा,. ... ५१-५७ सषरुल्सासः \ | विवादलकतणानि ... दृभ्वरनामव्वाख्था ^" १-१३ | सखरीपुरुपग्यवहयारः = ५१ मङलाचरणसमीत्ता 9०० ७०० (4 २- श्रै पथ्चम हिचद्न ००४ [डद (4 धः 2 1 पालरिडितिरस्कारः ६५-६५ सदुर्शासः प्रातसव्थानादि धर्मरूत्यम्‌... ०. ९५ दद धालशिक्ताविषयः = ?*“ १५१६ | पाखरिडलत्तणाति ... ६द-६७ भ्ुतप्रेताद्धिनिषेधः ““ १६१७ | गृहस्यधर्माः शद ,.. ६७-६८ जन्मपजसूर्यादिप्रदलमीत्ता ˆ" “““ १७-२० पणि्डितलक्तणानि ... ६८-६६ सुस्लास; मूखलद्तणानि ६६ वं विद्याधिृत्यवणेनम्‌ ... ... ६६-७० # | पुनर्विवाहनियोगविपषयः ... ,.. ७०-७७ 4 {2 ७७३ ७७१ (२ ७७ < गदटाध्रमश्नेष्टयम्‌ ... ७७-७ ाणायामशित्ता ४.3 ००, २३-२७ | ° “. सद्वप्रात्रारृतयः ०९७ २९ सथरुस्ख [सः छन्ध्याग्निदो्नोपवेश्वः = ,,, ... २४-२५ | , हामफलनिणेयः २५ | चानप्रस्थविधिः ०० ७६-८० , उपनयनसमीक्ता ,, >२५-२६ सन्यासाश्रमविधिः ७०६ ००७ ८०~->७ घ्रह्चरय पदेशः ... २६३१ प्रह्मचयंङूत्यवरणेनम्‌ ,,, `... ३१३२ सश्स्लतस; | पञखधापरीद्य्यः पनम्‌ .. ... ३२-४० | राजघर्मचिषयः . ८८१११ --खसचटनः विञ्लेषविधिः ,... ०... ४०-४३ | सभ्नात्रयकथनम्‌ 9 ठम | प्रन्यप्रामारयाप्रमाए्यवि० ... ... ४३-४५ | राजलद्षणानि (1९१ ०० ठ८-६१ दरीषशद्राध्ययनविधिः ... ०. ४५-४७ | द्रुडव्याख्या ६१-६र सप्रुन्त्‌सः राजक्तव्यम्‌ ६१ ६२ निचय श्रष्टदशव्यसननिषेध ... ०० &२-६३ स्वमावत्तनविषयः ०५ ४८ | मन्धदुूतादिराजपुरुपलषएानि „.. ६२-६४ दूरदेशे विवाहकरणम्‌ ,.* ४८४६ | मनज््यादिषु कायेनियोगः ... ६४ `

` विचादे खरीपुरुषपसीत्ता ,,. ., ४६-० | दु ग॑निर्माणव्याख्या ६४

~ ~ ~ ~

सत्यार्थप्रकाशस्य सूललीपत्रम्‌ विषयाः पृष्टुत-पृषठम्‌ विषयाः युद्धकरणग्रकारः ८५ ~ &५-&दे | दथ्वरावतारनिषेधः = “““ राजप्रजारच्तणादिविधि; ५, =... ६६६७ | जीवस्य स्वातन््यम्‌ भरामाधिपद्यादिवखंनस्‌ ... „^ ६७-ई८ | जीवेश्वस्योर्भिन्नत्ववखंनम्‌ करम्महयधकारः ... ~ ६८६६ | श्श्वरस्य सगुखनिगु कथनम्‌ मन्धरकरणप्फासः ६६ | वेद्विषयविचारः शासनादिषाड्गुख्यव्यास्या ६६-१०१ = ! रजामिच्रोदाखोनशश्रषु वतनम्‌- खष्टयुः वद्न्लाघः त्पत्यादिविषयः शचभियु दकरणपरकारश्च ,.. “., १०१-१०४ वया व्यापारादिषु सखज्भागक्थनस्‌ “~. १०४ वि 1 अाद्शविवादमाग॑दु घमंण- | द्मागष्ु खौ नार्तिकमतनिराकरणम्‌ पम्‌ “` | मनुष्याणमादिखष्े;स्थानादिनिरयः सात्तिक तव्योपदेशः ०, १०६-१०७ श्ावम्ेचछादिव्याख्या ति लेरडादिः साद्यते दण्डविधिः .. १०७-१०८ 1 चौर्यादिषु दर्डादिव्याख्ण .. „= १०८१९११ , सषुल्लासः सद्न्क्ासः चिद्ाऽविदयाविषयः हश्वरविषय “११२११ | वन्धमोक्षविषयः डेश्वरविध्ये प्रश्नोचरणि ˆ“ ˆ“ ११२ ११५. ईश्वरस्तुतिधरार्यनोपास्नःः “““ "““ ११५-११६ ९० सष्ठल्सासः ईष्यरन्ञानपकारः ११६ | आ्राचायऽन्चारविषयः “° हैश्वरस्यादितत्वस््‌ १२० भदयाभद्दयविषयः इति पूीद्धैः

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1

पश्चायतनपूजास° % गयाश्राद्धसमीत्ता ९० अगन्नाथतीर्थसमीच्चा

:~ रामेश्वरसमीत्ता

` कृललियाकन्तसोमनाथादिसमीा इारिकाज्वालामुखीसमीत्ता श्रद्यार चद्रीनारयखादिसमीख्खा गङ्गाल्लानसमीत्ता नामस्मरणतीर्थशब्दयोर्ग्यास्यः

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¦ श्िवपुराणसमीत्ता

विषया

१२१ सपुर्छ्ासः

श्रतुभूमिका श्रार्यावत्त देशीयसतमतान्तर- खणए्डनमरडनविषयः मश्रादिसिद्धिनिरयाकर्णम्‌ “““ वाममागनिराकरणम्‌ ˆ“ श्रदधेतवादसमी चा भस्मसद्राप्ततिलकादिस्त०- देप्यवमतसखमीच्ता = मूततिपूजासमीक्ता

गुखमादार्स्यसमीक्षा = ^“ छण्टाद्शपुराणुसमीष्ा “° ागवतसमोकच्ता 8 षूर्यादिग्रदपूजासमीच्ता ... अीष्वेदेहिकदानादिसमीच्छा

पकाद्पयादिनतदानादिसिमीष्ा

भारणएमोटनोचखाटनवाममा्मखमीष्ध

५, अवमतसमीत्ता श्कवेष्यवमतसमीक्चा =...

उत्तराद्‌

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पृष्ठतः- पृष्‌

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१," १,७६-२५६

- *"* १,७६-१८१

““" १८१- १८५ °*“ १८५८१६२ ००“ १६२१६५४ *** १६५- १६८ *** १६८०२ *“* २०२३२०५ 111 ०४५ *°* २०५-२०७ २०७ -" २०७-रण्यं ““" २०८८-० *“* २०६-२११ २१९१ ,..२११-२९२ २१२ *"१२--२१४ " २९४-२१९ “““ २१५-२१६ “° २२९६२२१ २२१-२२४ “** २२८-२२.७ ०... २२७-रग८ ०. २२८२२२६ ०-" २२६- २३२

विषमाः

कवीरपन्थक्षमीत्ता नानकपन्थसमीत्ता दादू रमस्नेद्यादिपन्थसमी्ता गोङलिगोस्वामिमतसमी सा स्वामिनारयायणमतसमीरी .., म्वलिङ्काङद्धितव्राह्यप्रा्थः नासमाजादिसमीत्ता प्रायंसमाजविषयः (४ तन्जादिदिपयकय्रश्नेचसययि ब्रह्चारिरसंन्यासिसमीच्चा ... श्मार्यावर्तीयराजवंशावल्ञी ,.,

१२ सएर्ल्ार

भूमिका नार्तिकूमतसमीत्ता चारवाकमतसमीक्ता... चारवाकादिनार्तिकभेदः ... बीखस्तीगतमतसमीस्षा ,,* सपतभक्लेस्याद्वादी षं जैनवीडयोरेक्यम्‌ ॥; श्रास्तिकनास्तिक संवादः ..* जगतोनादित्वसमीत्ता ..„ जेनमते भूमिपरिमाणम्‌

जीवादन्यस्य जडत्वं युदुगलानां-

पापे प्रयोजनकत्वं ४, जेनघर्मभशंखादिसमीत्ता ... जेनमतमुक्तिसमीत्ता

जेनसाधुलक्तणसमोक्ता जेनतीथंकर (२४) व्याख्या ,.. जेनमते अम्बूद्धीपादिवि० „..

0

पठतः षष्ठ

०, २२२२२२३ ०. २२२-२२४ ००. २२८२२०७ ००. २२७-०र ... २६२२८५८

०» >२४५८-२४६ ०० २४६ ००, ७५६- २५ ०० ९५५२-५ ००» >८६-२८६

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.> २६० ..* २६१२८ ..„ २६२-गद् ,० >६८-२६४ ०." २द५-द्‌६ ०० २६ ९--२७० ,-, २,७०-२.७द्‌ ,., २७३-२.७४ .., 2२,७८-२.७.७ .., 2,5.७- २५७५८

-.-» २८०-२९

[18 ण्‌ [3 २- ,

००" २९६--२६य = २९८२६९६ *# २९६३०

~, सस्या्थप्रकाशस्य सु चीपत्रम्‌

विषया, पृष्ठतः -प्ष्टप्‌ निषयाः पृष्ठतः १२ स्न्लासः मत्तीरचिनं द्ज्ञीलाख्यम्‌ ... „.. २३२३-३ माकरचितं दर्जीलाख्यम्‌ ,.. छयभूमिका ०० „^ | लुकरचितं इन्जीलाख्यम्‌ ,,. छश्ची नमतखमीप्ता ,., २०५-३१६ | योहनरवितसुसमाचारः ,,. ... २२९४-२ सयतव्यवस्थापुस्तकम्‌ ,, ,.. २१६३२१९ | योहनप्रकाशिववाक्यम्‌ ,,., ... २२३८-२ लणनपुस्तम्‌ ०. २२१-३२२ लमुपलाख्यस्य द्वितीयं चुरुतकम्‌ ,. ३२२ १४ घखपुन्लाएः राज्ञां पुस्तकम्‌ "~ ३२२ कालदृत्तव्य पुस्तकम्‌ ,.. ... २९२-३२२ | भजभरूमिका -देयुवास्यस्य पुस्तकम्‌ „.„ ३२३ | यवनमचङ्रानाल्यससीक्ता““ ०" ३५५३०

&पदेशस्य पुस्तकम्‌ =, ^ ३२३ | स्वसन्तव्यामन्तन्यधिषयः ˆ“ “** ३६०

इत्यु सरा;

1

४. 0 ६2६ ओरम्‌ सिदानन्दश्वराय नमा नमः 4

96१6696१ १6२६

सूतिका

निष समय सने यह ग्रन्थ “सत्यार्थघरकाश" वनाया धा उस समय श्रौर उसत्त पूर्वं संस्कृत भाषण करने, पठनपाटन मे संस्कृत ही दोलने श्रोर जन्मभूमि की भाप्रा गुजयाती दने के कारणं

मभक इस पापां का चशष पारनागन धा, इसस भागा रदयुद्ध चन गद धी) श्रव भाप्रा व्रलर्न श्र

तिखन का अभ्यास गयादह। इसलिये दस श्रन्थ का भापाव्याकस्णाचुसार द्ध कर्क दसरा वार

छुपवाया है का शब्द्‌, वाक्य, रचना कामद द्रा सो करना उचित था क्योकि इसक्र भद्‌ किये

विना भापा की परिपारी खुधस्नी कठिन श्वी; परन्तु श्रै का भेद्‌ नदीं प्किया गया दै प्रस्युत विशव तो

लिखा गया है दं जे प्रथम दुपनेमे कदी भूल रदी थी चद्‌ निकाल शोचकर यक कर्दी गहै यह ग्रन्थ ( चोद्‌ ) समुल्लास चर्थात्‌ चोदह विभागो मे सचा गया है मे १० ( दश्च)

समुल्लास पूवाद शरीर ( चार ) उत्तराद्धै मं वने है, परन्तु श्रन्त्य के दो ससुल्ञाख शरीर पथात्‌

खसिद्धान्त किसी कारण प्रथम नदी चप सक्त थश्चववेभी दपवादियदहं॥

) प्रथम्‌ सल्ला ईश्वर के ्रोकारादि नामे की व्याख्या ` ` =

( २) दहितीय सयल्नास म॑ सन्ताना की शिक्ता। कः [

८२ ) तृतीय सथृ्लास मे बमचर््य, पठनपाटन व्यवस्य, सत्यासत्य ग्रन्थों के नाम शरोर पदृने- पटाने की रीति

( ) चतुर्थं सयुल्लास् मे विवाह ओओौर गृहाश्रम का व्यवहार

( ) पञ्चम सथ्युल्नास मृ वानप्रस्थ ओर सन्यासाश्रम की विधि।

( ) छठे सग्रास रानधमं

( ) स्म सथल मं बेदेश्वर विषय

( ) अष्टम सल्नास मे जगत्‌ की उपात्त, स्थिति ओर प्रलय

( & ) नवम्‌ समुल्लास विद्या, अविया) वन्ध श्रौर मोक की व्याख्या

( {० ) दशवे स्ुन्नास आचार, अनाचार शरोर भ््याभच्त्य विषय

( ११) एकादश्‌ सथृल्लास मे आ््यावत्तींय मतमतान्तर का खण्डन मण्डन पिषय

( १२) दश सयुज्नास मे चार्वाक, बौद्ध ओर नेनमत का पषय

( १२; त्रयोदश समुल्लास ऽसाईेमत का विषय

( १४, चोदह्वं समुल्लास मे भुसलमानों के मत का धिषय मरौर चौदह सथललासा के चरन्ते श्राया के सनातन वेदविहित मत की विशेषतः व्यास्था क्लिखी है, निसको यै भी यथावत्‌ मानता हं

&) 8

४; भूमिका॥

- _ मेर इस श्रन्थ के वनानि का मुख्य प्रयोजन सत्य श्रथ का काश करना है श्रथात्‌ सलु है उसको सव्य श्चौर जो मिथ्या हे उसको मिथ्या ही प्रतिपादन करना सत्य रथै का यकाशच सममा चह सत्य नहीं कहाता जो सत्य के स्थान में ्रसत्य ओ्ओर असत्य के स्थानम स्य कां प्रकरा किया जाय छन्तु जो पदाथ जेसा है उसको वैखा दी कहना लिखना शौर मानना स्त्य कात है! जो मयुष्य पक्षपाती होता है चह अपने असत्य को भी सत्य चौर दुसरे विये प्रत वल्ेके सत्यकोभी असत्य सिद्ध करने पच्त्त होता दै इसलिये वट सत्य मत को घ्रात नदी हो चकता 1 इखीलिये विद्धान्‌ या का यदी मव्य कामदे करि उपदेश वा तेखद्धाण सव मनुष्यो के सामने सत्याक्तत्य का सरूप समवित करदे, पश्चात्‌ वे खयं अपना हिताहित समकर सत्याथं का ग्रहण ओर पिध्याथं का परित्याग करके सदा श्रानन्द्‌ में रै! मनुष्य का आरत्या सत्यासत्यं का जाननेवाला है! तथापि अपने प्रयोजन की सिद्धि, ट, दुराग्रह श्रेर श्विदि दोपो खत्य को छोड ्रखत्य मे छक्र जाता है परन्तु इख प्रन्थ में देसी वाव नदी र्वी दै श्योर किश्ष कामन दुखाना वा क्रिसी की दानि पर ततत्पयं है! किन्तु जिससे मयप्यजात्ति की उन्नति रौर उपकार हो, खल्यासस्य को मसुप्य लोग जानकर सत्य का ग्रहण श्नौर शअ्रसत्य का परित्याग कर क्योकि सत्योपदेश के विना अन्य कोई भी मयुष्यजाति की उन्नति का कारण न्दी

, इख प्रन्थमे जो करीं भूल चूक से श्रथवा शोधने तथा दापने मे भूल चूक रह जाय उसको ज्ञानने जनानि पर जैसा वह सत्य दोगा वैसा दी कर दिया जायगा ओर जो कोई पत्तपात अन्यथा शका च! खणडन मणएडन करेगा उस पर ध्यान दिया जायगा हा जो वह मडप्यमात्न का हितैषी हो- कर कु जनावेगए उसको खत्य सत्य समने पर उसका मत संगृीत दोगा ययपि अजकल वहुतसे विद्धान्‌ प्रत्येक मतो में हैँ बे पक्तपात छोड़ सर्वतन्त्र सिद्धान्त अर्थात्‌ जो बातें सव के अ्रयुकूल सव खस्य है उनका ग्रहण श्चोर जो एक दुखरे से विरुदध बातें दैः उनका त्याग कर परस्पर भीति से वत्त व्तीवें ते जगत्‌ का पूरी हित होवे क्योकि विद्धानों के वियेथ से अविद्वान मे विरो वड्‌ कर अनेक- विध दुःख कीचद्धि श्र खख की हानि दोनी है इस हानि ने, जोकि स्वाथौ मयुष्यो को प्रिय दै, सव मद्यो को दुःखसागर में इवा दिया है इनमे से जो कोई सावैजनिक दित लद्य मे धर धचतत द्योता हे उससे स्वाथ लोग विरोध करने में तत्पर होकर ्रनेक प्रकार विध्न करते हैः परन्तु “सत्यमेव जयते नातं सत्येन पन्था विततो देवयानः अथात्‌ सवदा सत्य का विजय च्रौर असत्य का पराजय क्नोर सत्य टी से विद्वानों क) मार्ग विस्त होता है, इस दढ निश्चय के श्रालस्बन से आप्त लोग परोपकार करने उदासीन होकर कभी सत्यारथपरकाश करने से नही हरते 1 यद वड़ा हद्‌ निश्चय दै कि “यत्तदग्रे

विषमिव परिणामेऽग्रतोपमम्‌” यह. गीता का चचन दै इसका अभिमाय यह है कि. जो विद्या श्रौर धमाल के कम॑ ते प्रथम करने में विष के तुल्यं श्रोर पश्चात्‌ श्रमृत के सदश होते है एसी वातो दतो चित्तम धर केने इस भ्रन्थ को रचा है 1 श्रोता वा पाठकगण मी प्रथम प्रेम से देख के इस प्न्य का सत्य ताल्पयै जानकर यथेष्ट करर इसमे यह अभिप्राय रक्खा गया है किं जो जो सथ मर्तोमे सत्य वाति हवे २सव में ्रविरुद्ध होने से उनका स्वीकार करके जो सतमतान्तसें मेमि्या चाते है उन का खण्डन किया है इसमे यद भी श्रभिध्राय रक्ला दे कि जव मतमतान्तयो की णुत च्‌ भकट बुरी बातों का प्रकाश कर विद्यान्‌ अविद्वान सव साध्रारण मस्या सामन, रक्ला द? (जस सव सर सव का विचार होकर परस्पर प्रमी दह के एक सत्य मतस्थ हव यद्यपि आअआयवित्त दशम्‌ उत्पन्न हुश्ा शौर वसता हं तथापि जैसे इख देश के मतमतान्तरों कौ शठीं वार्त का पक्तपात कः याथातथ्य प्रकाश करता हं वैसे दी दुसरे देशस्थ वा मतोन्नतिवालो के साथ भी वत्तेता हं जसा सदे

~

अूपिका धच

-शषालं के खाथ मजप्योन्नति के विषय मे वर्तता वैखा विदेशेयो के साथ भी तथा सव सज्जनीं कोा भी वतना योग्य हे! क्योकि भी जो किसी एक का पक्तपाती टोता.तो जेस आजकल के स्वमत की स्तुति, मरडन श्नोर प्रचार करते श्रौर दूसरे मत की निन्दा, दानि आर चन्द्‌ करले मेँ तत्पर होने हे वैसे मरै भी होता, परन्तु देसी वाते भुप्यपन वाहर दै याकि जैसे पशु वलवाय्‌ दोकरः निर्यैल को दुःख देते श्रोर मार भी डालते है 1 जव मदप्य शरीर पाके वैसा ही कमै कर्ते टे तो वे मदप्यस्वमावयुक्त गदी किन्तु पञवत्‌ है शरोर जो बलवान्‌ होकर निर्बलं की र्ता.करता है वदी मण्य काता है च्मौर जो स्वाथवश होकर परदािमाच करता रहता है वह जाने पथुच्र का भी चदा भाद है श्रव श्रयैवः सिये के विषय मे विशेषकर ११ ग्यारदये ससुञ्ञास तक किख है एन . ससुद्धासों मे जो कि सत्यमत धकाशित किया है बह वेदोक्क दने से सुम कनो सर्वथा मन्तव्य श्यौर जो नवीन पुराण तन्त्रादरि ्रन्धोक्ठ वातो का खण्डन किया है वे त्यज्घव्य है! जे १२ वार्यं समुल्लास मे दशया चार्वाक का मत यद्यपि श्छ समय कसषीणास्तसा दैः चीर यह चावौक वौद्ध जेन से वडुत सम्वन्य श्नीश्वरवादादि में रखता है यह चार्वाक सव से वदा नास्तिक दै उसकी चेष्टा का योेकना श्रवश्य है! क्योकि जो मिथ्या बात रोकी जाय तो संसार मँ वहत से ्रनथै प्रदत्त दो जार्ये चार्वाक का जो मत दै वद तथा वौद्ध श्रोर जेन काजो मत है वद भी १२ खसुद्लास मे संक्षेप ते लिखा गया दै। शौर चौद्धं तथा जैनियों का भी घावौक के मत के साथ मेल हे श्नौर थोडासा विसेव भी है } श्रौर जेन भी वहुक्स शो मे चार्वाक श्मौर वद्धो के साथ मेल रखता श्र थोढीखी वातो .में भद्‌ है 1 इसलिये जनो की भिन्न शाखा गिनी जाती है यदह भेद १२ वारव ससुल्ञास मे लिख दिया है यथायोग्य वही समभा लेना जो शसका भद्‌ है सो वारदवे सु्ञाख मे दिखलाया दै बौद्ध रौर जेन मत का प्वेपय भी लिखा हे इनमें से वोद के दीप्वशादि प्राचीन भ्रन्थो मे वौद्धमतसंग्रह सरवद्नसंग्रह मे दिखलाय( है उसमे से यदा लिखा है श्रौर जेनियों के निम्नाक्षिखित सिद्धान्तो के पुस्तक हैः उन से चार मूल सतर, जेसे- अवश्यकखज, विशेष श्रावश्यकस्‌ज, दशवैकालिकस शौर पा्टेकसत्र ११ (ग्यारह) अज्ञ, ` जेसे-१ ्राचासंगसत्, खुगडांगसत्र, थाणःगसूत्न, समवार्यांगसत्र, भगवतीसूत्, क्ाताधम- कथासत्र, उपासकदशासू्र, छन्तगड्दशास्र, श्रव॒त्तरोववैस्‌च्, १० पिपाकसूत्र, ११ प्रश्चन्या- करणखूत्र १२ (वारह) उपग, जसे -१ उपवा्ईसत्र, रायपसेनीखत्र, जीवाभेगमसूत्, 2 पन्नचणा खूत्, जवुद्ीपपन्नतीसखू्र, चन्दपन्नतीसूत्र, सूरपन्नतीसूज्न, निषि्यावलीसू्र, & कषप्पियासूत्र, १० पवड़ीसयासून्न, ११ पष्पियासूत्र ओर १२ एप्यचूल्ियासूत्र कलपु, से-९ उन्तणध्ययनसूज्, निशीयसतः कल्पस्जर, व्यवहारस्‌ चीर जीतकल्पसत्र छः छेद, जैसे-१ मदानिशीथब्ह दाच नासत, > महानिशीयलघुवाचनासू, मध्यश्चाचनासूज्, पिंडनिसक्तिसू त्र, ओधनिसक्तिसूज, पर्यू पणसूत्र १० ( दश ) पयन्नासृच, ज्ेसे--१ चतुस्सरणसूज, पचचखाणसूज, तुलवैयालिकसूञ, भकिपरिद्ञानस्‌तः « महाधर्याख्यानदृज, चदाचिजयसूच, गरीविजयसूत्र, = मरणसमापरिसूर, दवन््रस्तमनस्‌ चौरः ९० ससारसूज तथा नन्दीसूत्र योगेष्धास्पू् भी प्रामाणिक मानते ठै ५पंञचाङघ खे--१ पूय सव ग्रन्थों कौ टीका, निसाक्षि, 2 चरणी, भाष्य, ये चार श्रवयव श्रोर सध मूल मिलकर पच।ग कदाते दै, इनमे दूढिया ऋचयने को नदी मानते श्रौर इनस भिन्न भी नेक घ्रन्थ हैः कि = ५. विशेष जिनको जनी लोग मानते है! इनकं मत पर विशेष विचार १२ ( वार्वे ) खमुल्ञास मे देख लीजिये जेनियो भरथो मे ला पुनरुक्त दोष दहै श्ओौर इनका यह भी स्वमाच है कि जो श्रपना भ्रन्थ दूखरे - -~ मत बलेके ह्यहो वाच्पादेतो को उस भ्न्थके अधरमार कते दै! यह्‌ वातत उनकी ^ दे क्योकि जिसको को(दैःमानरे कोई नही इससे वह श्रन्थ जेनमत बाहर नदी हौ सकता डां !

1

4

भूमिषा॥

कोरे मनिश्रौरन कभी किसीजेनीने मानाद्टो तवतो श्चग्रा्यष्ो सकता है) परन्तु पेखा कोर ्रन्थ नदीं है कि जिसको कोई भी जेनी मानता टौ इसलिये जो जिस श्रन्थ को मानता होगा इस भ्रन्थस्थ विषयक खणएडन मण्डन भी उसी के लिये समभा जाता दहै परन्तु कितनेदीपेसे भीदहैकि उख प्रन्थ को मानते जानते होंतोभीस्भावा सवाद्‌ मे यदल जात है श्सी हेतु सर जेन लोग पने पन्थं को दिपा र्खते हैः 1 श्रौर दुसरे मतस्थ को नदतेन खुनाते रौर पट़ाते श्सलिये कि उन्म ेखी श्रसम्भव वाते भरी है जिनका कोर भी उच्तर ज्ैनियों मे सत नदी दे ्षकता भट वातकेो ष्टोढ देना दी उसर हे

१२ वें समुल्लास मे ई्ताद्यों का मत लिखा है ये लोग वायविल को श्रपना ध्मपुस्तक मानते & इनका विशेष समाचार उसी १२३ तेरद्वं समूललाख में देखिये श्चौर १४ चौदद्वें ्षमुल्नास में सुसल- भानो के मत विषयमे लिखा है ये लोग कुरान को श्रपने मत का मूलपुस्तक मानते हे इन काभी विशेष व्यवहार १४ वे समुह्ञास में देखिये श्रौर इसके श्रागे वैदिक मत के विषयमे लिखाद्े।खोकोरं दते श्रन्थक त्ती के तात्प से विरुद्ध मनसा से देखेगा उसको कु भी चभिप्राय विदित होगा क्योकि धाक्याश्चबो् मे चार कारण होते टै, श्राकाङ्न्ता, योग्यता, श्रासत्ति श्चौर तात्पयं 1 जव श्न चारो या धर ध्यान देकर जो पुरूष ग्रन्थ को देखता है तव उखको ग्रन्थ का श्रभिप्राय यथायोग्य विदित होता टै छ्राकाङ्न्ता किसी विषय पर वक्ता की श्रौर वाक्यस्थपदो की श्राकंत्ता परस्पर होती है “योग्यता धह काती है कि जिखसि जो होसके जैस जल से सीचना “्रासात्ते” जिस पद के साथ जिव सम्बन्ध उसी के समीप उस पद्‌ का वोलना वा लिखना “तात्पयै" जिखके लिये वक्ता ने शब्दं चारण वा लेख क्रिया हो उसी के साथ उस वचन वा लेख को युक्त करना 1. बड्तस्रे दटी दुराग्रह मय॒ष्य होति है कि जो वक्ता के श्रभिप्राय स्त विरुद्ध कल्पना किया करते दे, विशेषकर मत बालत जोग द्योक्ि मत के श्राह उनकी बुद्धि श्नन्धकारमे फंसके न्दो जाती हे इसालिये ज्ेसाें पुरार जेनियो के स्न्थ, वायविल श्रौर कुरान को प्रथम दीलुरीच्णिस्र देखकर उनमे सि शुणो का ग्रह दहर दपा काए त्याग तथा च्रन्य मवुष्वजाति कौ उन्नति के लिये प्रयल करता ह, वैसा सव को करर योग्य है इन मतो के थोड़े दी दोष प्रकाशित किय हैँ जिनको देखकर सयुष्य लोग सत्यासत्य मः छा निरीय कर सके श्रौर सत्य का श्रहण तथा असत्य का त्याग करने कराने मेँ समथ हेच क्यो? एक मनुप्यजाति मे वहका कर, विरुद्ध बुद्धे कराके, एक दृखरे को शतु वना, लड़ा मारना विद्धा : स्वभाव वहिः है यद्यपि इस प्रन्थ को द्खकर श्रविद्धान्‌ लोग श्न्यथा ही विचाररेगे तथापि बुद्धिमा लोग यथायोग्य इसका श्रभिप्राय समभेगे इसलिये म॑ अपने परिश्रम को सफल समता श्रोर श्यपन श्मभिप्राय सव सञ्जनो सामने धरता है इसको देख दिखला के मेरे श्रम को सफल करे शौर इस्त श्रफार पक्षपात करके सत्याथै का प्रकाश करना मेरा वा सव महाशयो का सुख्य कर्तव्य काम है छवौरमा सवौन्तर्यामी सचिदानन्द्‌ परमात्मा च्रपनी कूपा सर इस श्रा्तय को विस्दत शौर चिरस्था्या करे

- च्रलमति विस्तरेण बुद्धिमद्धरशिरोमणिपु इति भूमिक!

9 "नदर

णा का उदयपुर, हयान भदाराणा्जी का उद्यपु } ( खामी ) दयानन्दसरस्वती, ,

्राद्भपद्‌ श्चङ्कपप्त सवत्‌ १६२३६

# च्रोरम्‌ # >०९०९०२०2५2०९9५9492929९9

ययु | सचिदानन्देयराय नमो नमः | (७ =त55555त555त55555तत

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सत्यार्थप्रकाशः

परथ ्तसयुद्धसः

श्रोम्‌ शन्नो मित्रः शे वरणः श्नं मवत्वय॑सा श्च इन्द्रो वृहस्पतिः शमो विष्ण ररक्रमः नमो अदस नमस्ते बायो सरव प्रयत्नं त्रापि त्वामेव प्रत्यर्च तरह पदिष्यामि छतं बेदिष्यामि खलं वदिष्यामि तन्पाम॑वतु तदक्ारपयतु अवतु मामवतु च॑रम्‌ रोपू शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः १,॥

` छअथ--( श्नोरेम्‌ ) यह अओंक्तार शब्द्‌ परमेश्वर का सवौत्तम नाम है प्योकि दस्मे जो श्च,

श्मौर म्‌ तीन श्रक्तर मिलकर एक ( ओम्‌ ) सुदाय ह्या है इस पक नाम से परमेश्वर के वहुत माम श्राति है, जेसे-अकार से विराट्‌, चअश्चि स्नौर धरिश्वादि | उकार से हिरए्यग्भ, वायु रौर तैजसादि मकार सर ईश्वर, श्रादित्य यर प्रज्ञादि नामं क! वघ्वक सौरः ग्राहक दै उसका! एेखा दी वेदादि सद्य शाखो मे स्प व्याख्यानं किया दै कि प्रकरणानशरूल सव नाम परमेश्वर दी के है} ( प्रञ्च) परमेश्वर से भिन्न र्थौ के वाचक विराट्‌ शादि नाम श्त्यो नदी ? चद्याएड, एुथिवी चादि भूतः इन्द्रादि देवता श्रो वेद्यकशाख मँ थरव्यादि ्रोपधियो के भी ये नाम है वा नदी ( उत्तर) है, परन्तु परमात्मा के भीहैः। (प्रन ) केवल देवो का त्रहण इन नासो से कस्तेहो दा नदी ?८ उत्तर) श्रापके ग्रहण करने मे क्या प्रमाण है ? ( प्रन ) देव सव प्रसिद्ध श्रौर वे उन्तम भी हैं इससे मँ उनका भ्रदण करता हं ( उत्तर ) क्या परमेश्वर अप्रसिद्ध रर उससे को उत्तम भी है ? पुनः ये नाम परमेश्वर के भी क्यों

नदी मानते जव परमेश्वर ्रभरसिद्ध ओर उसके तस्य भी कोई वदी तो उससे उत्तम कोई क्योकर हो सकेगा, इससे आपका यह कना सस्य नदी क्योकि च्मापके दस कहने भँ वह्ुतसे दोप भी शाते है

जञेसे- “उपस्थिते परिल्यल्यायुपस्थितं याचत इति वाधितन्यायः' किखी ने किसी के लिये भोजन का

पदाय रख के कदा कि अएप भोजन कीजिये श्रौर चह जे उसको छोड़ के श्यप्राप्त भोजन के क्लिये जरां

तहा रमण क८1 उसको बुद्धिमान्‌ जानना चाद्ये क्योकि बह उपस्थित नाम समीप प्रात हए पदार्थ

कग छोड़ के श्ुपस्थित अथोत्‌ अप्रातत पद्‌ाथै कौ प्राप्ति के लिये श्रम द्रःरता है! इसलिये जैसा षद

पुरुष शुद्धिमान्‌ नीं वैसा श्रापकः! कथनं हुमा क्योकि राप उन विराद्‌ श्चादि नामों के परसिद्ध भमाणलिद्ध परमेश्वर भोर ्र्ारडादि उपरिथत श्र्थौ का परित्याग करके सम्भव रौर अनुपस्थित

सत्यार्थप्रकाशः

१०१११ १,१,१. ११.१.१३... 7११११९१ ~ ~ ^~ ~~ ~^ ~ ~^ ~~~ -~^~-~~^^ ~~~ ~~ ~~~

देवादि के ग्रहणम भ्रम कसते है इसमें कोर भी प्रमाण वा युक्ति नटीं जो श्राप रेखा करट कि जहां जिसका प्रकरण वां उसी का म्रद करना योग्य है, जैसे किखी ने किलीसे कटा कि “हे भ्रत्य! तवे ज्न्वरवमानय श्यत्‌ त्‌ सैन््रव काले श्रा, तव उखको समय श्रर्यात्‌ प्रकर्स का विचार करना परवश हे क्योकि सेन्थव नाम दो पदार्थौ का है एकर घोड़े श्रौर दुखरे लवण का जो स्वस्वामी का गमनसमय दा ता घोड़्‌ श्रार भोजनकाल हो तो लवण को ले प्राना उचित दहे) श्रर जो गमनसमय मे लवर ओर भोजनसमय मे घोककोले रावे तो उसका स्वामी उस पर छ्ृद्ध होकर कटेगा कि तू निषचद्धि पुरुष है गमनखमय मे लवण ओर भोजनकाल में घोड़े के लाने का क्या प्रयोजन था? तू प्रकरणवित्‌ नदीं है नदी तो जिख समय मे जिश्तको लाना चादिये था उसी को लाता।जो तुभ को प्रकरण का विचार करना श्रावश्यक था वह तूने नदी किया, इससे त्‌ भूख हे, मेरे पास्सेचलाजा। सस्ते क्या सिद्ध दुखा क्ति जां लजिक्षका ग्रहण करना उचित हो वदां उखी अथ का ग्रहण करना चाहिये त्तो रेखा ही हम श्र शाप सव्र लोगो को मानना ओर करना भी चाद्ये नट भ्-----> अथ सन्ताः प्रोरेम्‌ खम्ब्रह्म यञः अ० ४० म० १७ , देखिये वेदो मे रेते प्रकरण मेँ 'ओम्‌' रादि परमेश्वर के नाम है प्रोमिलयेतदक्षरपुद्गीथदुपासीत छान्दोग्य उपनिषत्‌ [ म॑° १1 श्रोमित्येतदक््रमिद सर्वं तस्योपव्याख्यानम्‌ माण्डव्य [ म॑० १] स्वे बेदा यत्पदमामनन्ति तपाथ॑सि सर्वाणि यद्वदन्ति यदि च्छन्तो बह्मचस्यं॑ चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण घरवीम्थोमित्येतत्‌ कटोपनिषदि [ वल्ली २। म॑ १५ ]

प्रशा्षितारं सवेषासणणीयांसमण्णोरपि रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम्‌

एतमगिनि वदन्त्येके मदुमन्ये प्रजापतिम्‌ इन्द्रमेके परे प्राणमपरे बह्म शाश्वतम्‌

मनु° श्र° १२[ श्ो° १२२। १२३]

जरह्मा विष्णुः शुद्रस्स शिवस्सोऽक््रस्स परमः खराट्‌ इन्द्रस कालाग्निस्य चन्द्रमाः केवल्य उपनिपत्‌ इन्द्र भिवरं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यस्स शपो गरुत्मान्‌ एकं सिप्रा वहुधा बदन्त्यग्नि यम मतिर्श्वानमाडः ऋ० स० १। १६४।१०४६॥

भूरसि भूभिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य सर्दनस्य धत्रीं पृथिवीं यच्च पृथिवीं दथ पृथिवी मा हिथसीः & यजुः श्र १२। १८॥

इन्द्रो महा रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः घय्यमरोचयत्‌ इन्द्रेह विश्वा भुवनानि येमिर इनदर श्वानास इन्दवः १० सामवेद प्रपा० त्रैक २॥

भाणाय नमो यस्य सरयैमिदं वरौ थो भूतः सर्ैस्येश्वरो यस्मिन्स भतिंठितम्‌ ॥. ११ श्रथयैवेदे काण्ड ११। ४।० १॥ ,

भ्रथमस्सुल्ासः ऋअथ-यदां दन प्रमारो के लिखने मे वात्पय यदीदेकिजोरेसे २प्रमारणो मे प्रोकासदि नामो सर परमात्मा का रदश होता है यद लिख व्याये \ तथा परमेश्वर काको भी नाम परनरथक नदी | जैसे लोक मे दरिद्र आदि के धनपति श्रादि नास होते टै इससे यद्‌ सिद्ध इश्रा कि 4 गौणिकः, कठी कार्मिक शरोर कटी खाभाविक र्थौ के वाचक है “त्रो चादि नाम साथैक जेसे (श्रो ०) '्रवतीत्योम्‌ , याकाशमिव व्यापकत्वात्‌ खम्‌, सर्वेभ्यो छृदत्यादू व्रह्म” सत्ता करने ५4 ोरेम्‌ ) दकाः शवत्‌ व्यापक होने सर ( खम्‌ ) योर सव सि वड़ा होने से (बह्म) ट्रका नामडे॥ १) ( चोभि- देत ) (श्रोरेम्‌ ) जिसक्ता नाम है नौर जो कभी नण नरह द्योता उसी की उपासना करनी योग्य दै न्य की नदी २॥ ( श्रोमिदयेत० ) सच वेद्रादि शास्र में प्ररेश्वर का पधान घोर निज नाम (श्रोरेम्‌ ) को कषा है श्रन्य सव गौखिक नाम] ३॥ ( सभ वेद7० ) क्योकि सव वेद सव धमी. वष्ठानरूप तपश्चरण जिसका कथन श्रौर मान्य करते श्रौर जिसकी पासि की च्छा करके घ्रह्मचयौभम करते हैः उसका नाम "खोरम्‌ ` है ४॥ ( भ्शास्तिता० ) जो सव को शिक्ता देनेदारा, सूचम से सन्म, खप्रकाशसखरूप, समाधिस्थ वुद्धि जानने योग्य है, उसको परमपुरुष जानना चादिे ५॥ श्रोर खप्रकाश देने से “श्रण्नि'" विक्लान- खरूप होने “मनु सव का पालन करने ^प्रजापति'' शरोर परमैश्व्व्यवान्‌ होने से “इन्द्रः सव का जीवनमूल होने “श्रा श्रोर निरन्तर व्यापक होने से परमेश्वर का नाम "रह्म" है ( व्रह्म विष्णएुः° ) सव जगत्‌ के वनने से "व्रह्मा" सर्यत्र व्यापक ददे पिष्णु'" दु को दरड देके सलाने से “रुदर मङ्गलमय श्नौर सच का कटयाणएकन्ती दोन से “शिव "वः स्वेमश्युते स्तरति विनश्यति तदक्षरम्‌” १॥ “यः स्यं राजते खरार” २॥ " योऽग्निर्वि कालः कलिता पलयकत्त फालान्निरीग्वरः” २॥ ( च्क्षर ) जो सर्वच व्याप्त विनाशी ( खसराद्‌ ) खयं प्रका्ाखरूप ध्रीर ( कालास्नि० भ्रलय मेँ सव का काल त्रोर काल का भी काल है इसलिये परमेश्वर का नाय काला दै ७॥ (इन्द्रं मब ) जो पक आ्दितीय सत्यरज वस्तु है उसी इन्द्रादि लव ` नाम है “दुषु शेषु पदाथैषु भवो दिन्यः “शोभनानि परनि पालनानि पृणानि कमणि बा यस्य सः” भ्यो गुर्वात्मा गरत्मान्‌” “यो मादरिभ्वा वायुरिव वलवान्‌ मातार्वाः' ( दिव्य ) जो परृत्यादि दिव्य पदार्थौ मँ व्यात ( उपरे ) जिसके उत्तम पालन ओर पर कमै दैः ( गरुत्मान्‌ ) ` जिसका आया अर्थात्‌ खरूप महान्‌ दै (मातरिश्वा ) जो वायु के समन अनन्त वलवान्‌ दै इसलिये परमात्मा कर दिव्य, सुपस, गरतमान्‌ श्र मातरिश्वा ये नाम है शेप नामो का चरथ जागे लिखने ॥८॥ ( भूमिरसि ) “भवन्ति भूतानि यस्यां खा भूमिः" जिसमे सव भूत प्राणी होते इसलिये इयर का नाम भूमि" दै शेष नामों का श्रथेश्रागे लिखेगे ( इन्द्रे सह्‌ नए० ) इख मन्म इन्द्र परमेश्वर हयी का नाम दसल्तिये यह प्रमाण लिखा है १०॥ ( भाय ) जसे रार्‌ के षश सव शरीर ओर दन्द्यं होती है चेसे परमेश्वरः के वश मरे सय जगत्‌ रहता दै ११ इत्यादि प्रासो के सीत र्थो के जनने से इनं नामो करके परमेश्वर ही का श्रहृण होता क्योकि ओदम्‌ श्रौर अन्यादि सामों के सुल्य श्रथ सि परमेश्वर दका ग्रहण दोता है 1 कि व्याकरण, निरुक्त, व्राह्मण, सूजादि ऋपि सुनियो के व्याख्यानो से = कग ग्‌ रने मे चतः हे वेस ग्रहण कसना सव का योज्य परन्वु “ओरम्‌"' यह्‌ तो केवल परमात्मा ही का नाम दे ओरं अभि रादि नामो सि परमेश्वर सत शरहण मे मकर ओर विशेपण॒ (नियम कारक इससे कवा सिदध हा निः जद स्तुति, प्ाथैना, उपासना, सवेन, व्यापक, थद, सनातन चरः श्रा प्वश्पर्‌ प्ख दं घरी चद्यी इन नामो परमेश्वर का ग्रह॒ दयेता हे नौर सीद प्स प्रकरण हे किः- \

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बपमसगुद्ाक्लः 4

4 ठदित करते ते "वैल"! शम्दं सिख हता है! जो भाप स्यय्रकण सोर र्यादि नेजस्वी सो का

प्रवास फमनेयाता दै शते उस द्र का माम (तनण" है इत्यादि नामायं उकारमाम प्रह सेवे द। (स्वरे) इव धानु "वर" शद्‌ तद प्तादे चय दृद एवभ्वययान्‌ वनेत द्यरः" (लका सस्य पियारस्तीन माम स्वार नन्त वथ दस उद परत्रा्मा का नाम दूरः " द। (दो अयन्यृदने) इय घातु" पदिन ^ सद दसय सिन फन "द्रादित्व' अन्त भिय सोता पिन विने यस्य सादया + वदिस श्राय हका परिशु कमी नदरा उसी इयर फी" प्याय " तडा द| (सा द्ववयाधन) चत पूव पानु "प्र योर द्तष तद्धित खले से प्राड्‌ » श्ष्य्‌ पिदध हता चयः व्द्ष्नया वराञ्वरसय समना च्ययद्रार्‌ कानाकि प्रद्र पय व्राः जा लान्ति उाननुह सथ सरन्यय गन्‌ स्य ्रदार फो पवान्‌, जानना दै दसत दयवर का नाम्र श्राव 1 ह्यदि नामत मन्दसतति गुदात दन दं 1 जेय प्क मावा सतन श्रय यदु व्याय्यात पियदप्सरा अन्य मासन यपस्य जतरदुषजा (यक्ना मिकः च०} इत मन्ध मं मिधरादि नम्य मी पसमद स्पा स्नु, प्रायना, उपासना महषी सी जाव्री दै! चेष्ट रस्ता दन ट्त शन, प्म, सपमा प्राय नात्य पत्य न्यदा पव ्रयिक्‌ हो} उन खव थे्टठा्मी जा पन्यनन यष्ट उयते पमद्यर फन | भिमक तुय कदन ष्का, हे रन रोमा! जव नुन्य नदी चो उलन श्वि व्याकर दा सफला द? सन्त परमेश्वर कष्छत्य न्याय, दय, पयसामव्य श्र सदस्या मनन्त गग पस "न्यु (ध्मा हु पनरष्य या जव नर्हा 1 जा पद्य सत्यद् उस रुगु प्ठमी सवनाय भासस्य दनि दसानिय मनुष्या को पोम्प टै परमेश्वर दी की स्तृति, प्रादरना श्रार उपासना दर, उसस्‌ पिन्न की फमी त्द्‌ प्याकि प्रह्मा, विष्सु, मदादेव नामत पूरन मदाशय प्विद्धान,. दन्य दानवारि सिद्ध मनुष्य श्वार न्य साधारण मनुष्यान भी परमप्वस्द्ीम विश्वास पायया उगी स्नृमि, त्रा वरना शरोर उपासना फर्म, उमस भिद की नदी की। प्ते दम घव रा रना योग्य प्र दना लत पिन्यार मक्ता आर उपासना तिपय फिया जायगा)

(ग्रक्च) पित्रादि नामोत सगा श्र इन्द्रादि दवो व्रतत व्यवदराय देसल स्त उही प्रद्‌ करना चद्विव ( उत्तर ) यथां उनम प्रदम उग्यवा यम्पनरी प्त्यादिजो मनुष्य क्सि कामिक हे वदी न्यकागच्श्चौर फिसी उदासीन नी दन्न म्र याता द्र शसते सुप्य मे घला आदि का श्रद्‌ नदीं दो सकता फि्तु लसा परभभ्यर्‌ सव जगत्‌ का रि्वितमिप्र,न किप्ीका शाश श्र किसी सरे उद्रासीन द, इतस भिन्न काद भी जीव इम प्रकार का फभी नर्द पक्ता } दसद परमात्मा दी का ग्रदग यदा दता दां ! गा श्र मे मित्रादि शष्द सुदादि मलुप्यो का प्र दोता दै ( जिमिदा स्नेदने ) इख घातु यंकौदिर ^" प्रत्यय दने से "मित्र" एष्द्‌ सि दोसा दै “मेद्यति स्निटति स्निखते वा मित्रः" जे सव से सद करके मौर सव कते श्रीति कर्ने सौम्य दै इससे उस परमेश्वर का नाम मिन ( चन्‌ चरु, वर्‌ {लयम्‌ ) इन धातु उणादि उनन्‌” भत्यय दने स" वच्णु ' शब्द सिदध छता “यः सर्वान्‌. शिठान्‌ स॒म्ून्धर्मात्मनो बखोत्यथया यः फ्ियमुमिवमत्मभित्रियत व्यते वा वणः परमेश्वरः" जो श्ात्मयोगी, विद्वान्‌, सुल्ति की इचा कने वाले छक्त श्रौर मत्मां का स्वीकार करता, श्रधवाजो स्विष्ट, सुमु, सक्त शरीर धर्मात्मा ग्ण किया जाता वह ईश्वर “दगु” सपक दै श्यवए “वरूणो नाम वरः धेष्ठः” जिखलिये परग्रश्वर सव द, इसीलिय 6 नाम "वसणु' (क गतिप्रापणयोः ) प्स धातुं ५५ यत्‌” भत्यय करन मस्य शब्द्‌ स्तिद्ध दोना दे श्रौर “्रय्य'' पृतरक ( माङ्‌ मनि ) इस धातु से “कनिन्‌ यमा" शब्द्‌ सिद्ध दोता दै "योऽ्योन्‌ स्वामिने न्यायाधीशान्‌ मिमीते मान्यानु

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गणी

~ तदित कसमे से प्तैजप्य) शमन सिय प्रतार) प्राप स्ययप्रकाण मोर पूर्यीरि तेजस्वी खायो का

प्रदा फयनेराला पसे उम ्थ्यमर्‌ पाला ताम "व्ीतषत" है 1 इत्यादि नामा उकार्माध प्रकु तते & ) (श्य पस्य} दमन भ्रातु भन "द्भ्यरर " शद ववि दवाना 1 प्यं दृद पर्वन्वययान्‌ करते टश्यरः" (न्यदा पवत्य धिचागन्यील दान क्र दवमन्त सय्यद षस उश पर्मरान्मा पनाम ^ तजर + 1 (दा द्यययनदने) दस धानु "द्वद "र दृत ननि रन "शराटिन्य'' भ्य भिय सना 1 विने लिना चस्य सादययदिनि. + प्वद्िलिर्य श्वानः निषा विनाद्य कर्मा नदा सी थ्यर्‌ थव " श्ादिस्य " सव्य (हा श्ययत्यथत) ' वयक दप प्यनुष पन् शरीर इषपम तद्धिव पने "प्राप्त " प्य्‌ भिना यः प्रवरनया कयश््वरस्य मना व्यय जमात भ्ठ एय वापः" सा निरन्त प्वानयुतर सथ यणध्यर लय पः व्यदार पत थयायन्‌ साननादर गरसते ध्यर्‌ पा नाम गदरा" £ श्या नान्य स्यार पशत द्रति ६1 सम भायाप्तर्मनि श्रय चरां व्यान्यान स्तिपा न्य नामाथभी प्लस भसति सानि सो ( शन्न मित्रः घ) प्ख मन्यम मिद्ध नाय पमी पर्यथ्वर चह कयापि स्युनि, व्राथना, उपासना भहदौषी षी जादी रै अष्टउम्यन्दा छन्ना तेत, म्‌. सपमा श्यार पन्य तयरशन्य मयय मश्च धिकः ह| उनश्यध्रषठ भीता कछन्यन्ते दष्ट उष वम्मपरयरस पपन द| सिपक तुन्प काडर शुभा, श्गेरन दाया अय नुन्य नी ना दवस दाप्यः वरयष्त्द्वा स्दत्ना रैर सष पर्मदरयरः सन्य न्याय, दया, स्यसामश्य योर नवथन्याि शनन गना दत यन्य तल्पी ऊद्‌ पदाय घाकीयक नसी ्र। जा पदाथ सत्य द्ध उस्सक्ष गुन्‌ म्न स्वभाव मीमयद दम्तानिय मनुष्यो को याम्य टैक परमे्वर टी फी स्तनि, व्राधना शार उपासना "ठ, उन्नमन निघ्न कये कमा करर क्योकि वर्मा, विष्य, मटादप नामक पूर्वज मद्याशाय पदान्‌. दन्य दानवा निद मनुष्य शार शचन्य साधारग्‌ मन्यन भी परमश्वर दी मं विष्वा परमः उना फी न्नुनि, पादन चार उपासना कमे, उनतत भिशक्यी नही ष्ये पेसेद्मस्वका करना भरोयय | सदय प्रत्न पिनार मातः श्रीर्‌ उपासना विपये प्प आयगा। (प्रद्य) मित्रादिनामास लया प्यार दृन्द्रर्दि दर्ा पः श्रानिसः प्यपदार दुन उरनं का

श्रद्‌ फस्ना चर्पदय ( उत्तर ) यदं उन प्रद स्ना याम्य नरं प्साति जा मनप्य किसीकालित्र

वदी श्न्यफागरप्रु श्रार फिसीख उदासीन मी दगनमद्ाना दै दसस सुस्याथ्मं स्सा श्रादि

का प्रद नटीं छर सकन फ्रिन्तु जसा परमरवर प्तय जगत्‌ फो निशित मिध,न करिखी ष्व शङ्कश्रौरः क्रिसी से उदासीन ह, ससर भित कटभी जीवश धपतर् फा फमी नरी सक्ता पसि परमात्मा दी का त्रटण॒ यद्यं टोताद्ट। ष्टां! गाष्‌ द्यथ मं भित्रादि श्यष्ट्‌ से खुट्दादि मदुष्यां का प्रण होता टै ( जिमिदा सन्ने ) धातु चकद्र तुः" प्रत्यय के एने से "मिध" श्ष्द्‌ प्ति होता टे “परयति स्निद्यति स्निदाने चा मित्रः" जा सवस स्न कस्ये पौर श्लव फो श्रोति करने योग्य ष्ट इसस उस परमन्वर कानाम मिव दै ( वृन्‌ वर्ग्‌, चर दृन्सरायाम्‌ ) दन धातुश्यां उणादि उनन्‌ श्रत्यय दनं सर “वर्ण्‌ शब्द्‌ सिद्धदटाता श्य सत्राच्‌ श्रष्टन्‌ ययत्तन्थमात्मना श्रणत्यश्रयायः किमुखुचनिधमात्मभिवियत चर्यते चा वर्णः परमेश्वरः" जे श्या्मयोमी, विद्धान्‌, सुति फी श्छ कर्न चाल रुक्त श्र ध्वमत्मार्भ्रा का स्वीकार करता, श्रथवा जा शि, मुसुक्ल, यक्त रीर धर्मात्मा ्रदृण॒ करिया जाता वद श्वर '"वयणु” संप्रक दै श्रथवा “वरुणो नाम वरः यष्ठः जिषक्तिये परमश्वर सव से श्रष्ट दै, रखीलिय उतका नाम “वर्ण्‌ है ( गतिप्रापणयोः ) एस धात से यत्‌" प्रत्ययक्रनस "्ट्य्ये" णाष्ट सिद्ध राताद श्र "ष्ट्य पृय्यय ( मादः मनि ) इस धातु से “कनिन्‌”

प्रत्यय दोन यमा" शब्द सिद्ध दाता दै। “योऽयीन्‌ स्वामिना न्यायाधीशान्‌ मिमीते मान्यानु

कनके 2, . ~. =. --

अधमसमुद्रासः

कावा तद्धित करने "वैज" शम्द सिख एता) भाप स्ययप्रश्मण सोर पुम्यीदि तेजस्वी लोका का

ध्रकाष फरनेव्यक्षा शस उस दन्धर्‌ ताम ष्लैरप्त'" है इत्यादि नामाय उक्मरमात प्रष्करं हेते द्। (दख यन्य) एत धातु "दन्यर पथ्य सिन दत "य्‌ इर सथन्ययवान्‌ करत

द्श्वरः" जिन्त लत्य पियास्णरौाल त्न द्वग नन्त दन्य इतस्त उस पस्मराक्रा कनाम ५“ अअ ( दरा श्चवगन्‌डने) इन्त धातुक ^ व्दति ' नस्‌ नान्न षस "मादित्य" दन्य भिद दोता ड! पिते प्यनप्ा यस्य सायमलत्तः + सद्धितग्व त्रा त्यः" (प्ख दिनस्य फी नष उसी दन्यर फी“ त्राः साद (पा दवय) द्य" पूलकः दम तानु "रतरः पीर दृस्त तद्धित फस ^ प्रादु '' तृच्च सिद दाना | “यः प्रद्दूनया चराचरस्य जगना व्य्रह्मर्‌ ताना धः धथ्रप प्य श्मः जा लध्रन्ति उलयुद्क सव चवसान्यस सनत कव द््धार यच्रावत्‌ जानता दसस ददर पा नाम (थात इन्यादि नासि मक्त गृदीन दतक्ति द) नभत पकर माताप्तर्तीन) शरद यदं व्याय्यतत किन्पिद्र पम श्न्य नापावेमी प्राणस्स अत मातद्। जा (खप्ना नितः व०} इस मन्व मं निरा नाम हवे मी पम्मदयर क्या स्नुत, परायना, उपासना भहदहीकी की जाती येष्टरखफोः परत जागरम्‌, सम्म, स्यमाव वार्‌ सत्य सत्य त्यवदरारयो मं मय अविक

हा उन क्षय धष्टार्ममा जा पनयन्त यष्ट उस परमद्वर्‌ फः) भिसः तुस्पष्ादु दुभा, सरन दोगा) जवनस्य नत्त उलन ्यावक जयाकरद सम्ना टै? संपत परमेद्यर ष्ठत्य न्याय, दया, स्यसामच्य ध्य सनदस्प्रादि पनन्त गुप दु पम "सन्य सी उड प्रत्राणं वाजीपक नदी ट| जे पदाथ सत्य उसने गुण्‌ कम्म स्वभाव नी सःय दसि द्र गम्तफये मनुष्यो का योस्य टैफि परमेश्वर दी फी स्तुति, प्राद्रना शार उपानना कर, उस्म मित्न षी फमान पयाकि ब्रह्मा, विष्य, मदयदेष नामक पूर्वन मदाय छान्‌, दत्य नवषर निरुष्ट मनपय शरार सन्य साधारण मनुय ने भी परमर्वरर दा चिश्यास फरक उसी फा स्तत, प्रालना श्रार उपासना फर, उसस्‌ भिन्रका नद की) येत स्व का फरनेः यम्य ददा (मन परिचार मातत शार उपासना एिषयमं पिया जायगा ( श्र्च) मित्राद्‌ नामासि समया त्राम्‌ इन्द्र दरवा प्राक्त व्यव्रदास्दृग्नस् उरन्ीका

प्रदण करना चाद्य } ( उत्तर ) यद्यं उनका प्रदणु करना याम्य नर्द क्योकि मनुष्य किसी कामित्र

है वदी शन्यकांशतरश्रोर किसी उदालीन नी द्रःन ध्राता इसत मुख्यां खसा ्रादि

का ग्रदण्‌ नदी दा सकता किन्तु जसा परमेत्यरः सव गत्‌ फा नि्धित मिध, किसी का शृङकशओ्रीर किसी से उदासीन दै, इससे भिन्न कद मी जीव दस प्रकास्का कभी नरं शै सक्ता पसाजिये परमात्मा दी का ग्रदणु यदा देता द्ध) टां! माष यमं मित्रादि शब्द्‌ सत सुददादि मयुप्यां का श्रय होता है ( जिमिदा स्नेदने ) एस धानु ते ्यकौदिकः “कू” प्रत्यय फे दने से "मिध" शब्द्‌ खिद दताः है 1 “मेयति स्निदाति स्नियते वा मिन्नः” जा सवस सद्द करे मौर सय को धाति करने योग्य दसस उस परमरश्वर का नाम मित्र दद ( बुन्‌ वर्णु, वर दन्सायाम्‌ ) इन धातुर्न उणादि उनम्‌ः प्रत्यय दाने “चदस्‌'' शब्द्‌ सिद्ध दाता दै यः सवान्‌ णिन्‌ य॒मक्लन्धर्मामने चृणोत्यथया यः प्िथ्खिसुछमिर्धर्मात्ममिर्वियते चर्यते वा वरणः परमेश्वरः" जो श्ात्मयोमी विद्वान्‌, मुक्ति की इच्ा करन वाल सक्त रार ध्रमात्मा्रा का स्वीकार करता, श्रथवा जो शि, मुमु, सक्तं शरीर धर्मात्माश्रों ग्रहण किया जाता चद्‌ ईश्वर “वर्णु” संक दै श्रथवा “वसणेः नाम चरः यष्ठः” जिषा्तिये

परग्रश्वर खव श्रष्ट ६, दसील्िये उसका नम “वसण"' ( गत्तिधापणयोः ) शसं धातु यत्‌" प्रत्यय करने सर “य्य शब्द प्छदद्ध्‌ दाता दे श्रौर “रस्मै पवक ( माडः मनि ) इसर घातु से “कनिन्‌”

श्रत्यय शश्रयमा' शव्द सिद्ध दोतादे। “"योञयौन्‌ स्वमिने न्यायाधीशानू मिमीते मान्यानु

सत्याथप्रकाशः करोति सोऽयमा'" जो सत्य न्याय के करनहारे मनुष्यो का मान्य श्र पाप तथा पुरय करनेवाले कौ पाप

श्रोर पुण्य-क फला. का यथावत्‌ सत्य नियमकचा हं इस्रीस उस्र परमेश्वर का नाम शरथमा " हे | (इदि परमेश्व) इस धातु ¢ रन्‌" पत्यय करने से इन्द्र" शब्द्‌ सिद्ध होता टै “य इन्दति परमै. भ्वयवान्‌ भवति इन्द्रः परमेश्वरः” जो अखिल पेश्वययुक्त है इससे उस परमात्मा का नाभ “इन्द” है “बरहत्‌' शब्दपूवक ( पा रणे ),इस धातु “डति'” प्रत्यय चृत्‌ के तकार का लोप श्रौर खुडागम हाने “चरृहस्पति"” शब्द द्‌ सिद्ध हाता हं “यो बृहतामाकाशादीनां पतिः स्वामी पालयिता ब्रहस्पति" जोवडाख भी वडा श्चोर वङ्‌ आकाशादि ब्रह्माएडो का स्वामी दै इससे उस परमेश्वर का नाम ^“.बृहरस्पति."' हे ( विष्ठर व्याप्तो ) इस धातु ख॒“ जु प्रत्यय होकर विष्णु शब्द्‌ सिद्ध हा 1 “वेवेष्टि व्याप्नाति चय4्चरं जगत्‌ विष्णुः” चर आर श्रचररूप जगत्‌ मे व्यापकं होने परमात्मा का नाम “विष्णु" हे “उसुमैहान्‌ कमः पराक्रमो यस्य उस्क्रमः' नन्त पयक्मयुक्त दाने स्र पर- मात्मा का नाम “उस्म है जो प्ररमात्मा ( उरूकरमः ) मदापराक्रमयुक्त ( भिच्ः ) खव का सुत्‌ शविः रोगी. वह ( शम्‌ ) खुखकाएरक, वह (वरुणः ) सर्वोत्तम, बह ( शम्‌ ) सुखस्वरूप, वह ( अर्यमा ) न्याया व्रश, बह ( शम्‌ ) खुखप्रचारक, वह ( इन्द्रः ) जो सकल एेश्चयवान्‌, चह ( शम्‌ ) सकल पेष्वयै- दायक, वह्‌ ( बृहस्पतिः ) सव का अधिष्ठाता ( शम्‌) विद्यापद्‌ रौर ( विष्णः) जो सव मे व्यापक परमेश्वर है, वह ( नः ) हमारा कट्याण॒कारक ( भवतु ) दो

(.वायो ते ब्रह्मे नमाऽस्तु ) ( ब्रह वृहि बुद्ध ) इन धातुर्न से रह्म: शब्द्‌ सिद्ध रोता है। जो सव के ऊपर वियाजमान, सव सर वडा, श्रनन्तवलयुक्क परमात्मा है उस व्रह्म कोम नमस्कार करते हें हे परमेश्वर ! ( त्वभ्रच प्रत्यत्तस्व्रह्मक्षि ) श्राप दी अरन्तयामेरूप प्रत्यतच्त ब्रह्महा ( त्वामव प्रव्यक्त बह्य-वदिष्यामि ) मे श्याप दी को पत्यत्त ह्म कहगा क्योकि श्राप सव जगह मे व्यातत हाक सव को प्ित्प.ही ध्राप्त हे (ऋतं वदिप्यामि) जो याप की वदंस्थ यथाथ आज्ञादे उसलीकाम सवक लिये

श"चपरारः अचरण भी करूगा ( सत्यं वादेष्यामि ) सत्य बालू, सत्य मानु श्यार सत्य दही कङ्गा तन्मामवतु ) खो आप भरी सत्ता कीजिये ( तद्वक्घारमवत) सो श्राप सुभ आप्त सत्यवक्ता की रक्ता कीजिये कि जिसस आप क्मीश्ाज्ञाम मेरी वुद्धि स्थिर हाकर चिर्द्धकथी नदो) ्योकि जो श्राप कीःश्राज्ञा हं वही धमे श्रार जो उससर पिरुद्ध वही अधमं ( अवतु मामवतु वक्तारम्‌ ) यह दूसरी वार-पौट श्रधिकाथे लिय दे जक्ष "क्त्‌ कञ्चित्‌ प्राति वदाति त्व ग्राम गच्डु गच्छः इसमे दा