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श्रीसमन्तभट्र स्वामिविरचित :

रत्नकरणडश्रावकाचारः

श्रीप्रभायन्द्रीयसंस्कृतटीकया सिद्धान्तशास्त्रि-पण्डितप्रवर-गौरीलालरचितै: पशन्चिकाटिप्पणीदिंदीमाषानुवादै हृदयंगमेनाइनुक़रमशिकया समलंकृतः झ-चाए प्यगि ००2

सच

श्रेष्ठिबयेगम्भीरमलपाण्ड्या कुचामननिवासिप्रदत्तसहायतया भारतीयनैनसिद्धान्तप्रकाशिनी संस्थाया मंत्रिणा व्याकर शशास्त्रि-पंडित-श्रीलालनन- का न्यतीर्थेण जैनसिद्वान्तप्रकाशक पविन्नमुद्॒णालये मुद्राप्य १४८ बाराणसीघोषष्ट्रीट कलिकात्तात: प्रकाशितः।

श्रीवीराब्दृः विक्रमाब्दुड

श्रीसंमन्तभद्गभारतीस्तेवतस -

सस्मेरीमि तोष्टवीमि नेनमीमि भारतीम्‌

तंतनीमि यंयेमीमि बंमणीमि ते 5मिताम्‌ देवराजनागराजमर्त्मराजपूजिताम

भीसपन्तभद्रवाद मासुरा त्ममेघराबू मात्मानमेयसिद्धिवस्तुगोचरॉस्तुवे

सप्तमंगसपनीतिगम्पत गोचरास्‌ |

मोधमार्गतद्धिपक्षभूरिपमगो चरा-

पात्मतचग्रोचरां समन्तभद्रभारतीम॥ २॥ परिसक्तिबन्दितामुपेयवल्भापिणी

चारुकीतिभासुरापुपायतत्वसाधनीम्‌ ।॥ पूंपक्षखण्डनप्रचण्डवाग्विलासिनीम्‌

संस्तुवे जगद्धितां सम्रन्तभद्रभारतीय रे ॥| पात्रकेसरिप्रभावसिद्धकारिणीं स्तुवे

माष्यकारपोषितामलंकृतां प्लुनीश्वरेः यृद्वपिच्ठमाषितअरृष्ट मेगलाथिकास्‌ |

सिद्धसोरूयसाधिनीसू समन्तभद्रभारतीस

स्म-दृत्यस्य पड़योरुपम्‌, पुनः पुनः भूशं ख्यरामि इत्यथ।

यम-परिषेषयामि ( पुनः पुनः भूशं परिवेष्टे :हमित्थथ।

( छा)

इन्द्रभूतिमाषितप्रमेयजालगो चरां

वद्धमानदेवबोधबुद्धिचिद्विलासिनीय योगसौगतादिगर्वपर्वताशनि स्तुवे

क्षीरवाधिसन्रिमाँ समम्तभद्रमारतीम्‌ माननीतिवाक्यसिद्धवस्तुधमंभो चराम्‌

पानितप्रभावसिद्धिसिद्धिसिद्धिसाधिनीम्‌ धो(भूरिदृ:खबाधितारणक्षमा मिमा

चारुचेतसा स्तुवे समन्तभद्रभारतीम्‌ सान्तनाइनावनन्तमध्ययुक्तमष्यमां |

शन्यभावसब वेद्तित्वसिद्धिसा धिनीस हेल्वद्देतुवाद सिद्धवाक्यजाल भासुरां

मोक्षसिद्धये स्तुवे समन्‍्तभद्रमारतीम ७॥| व्यापकद्याप्तमागेतलयुग्मगोचराम्‌

पापहारिवाग्विलासिशूषजा झुका स्तुवे श्रीकरीं धीकरीं सर्वस्तोझ्यदायिनीम

नागराजपूजितां समन्तभद्रभारतीम

2

तपोनिधि श्री १०८ आचाय चंद्रलागरजों महाराज

श्री १०८ श्रोवन्द्रसागरजी महाराजका जीवनचरित्र

आप श्री १०८ श्री आचायंवर्ण भ्रोशांतिसागर स्वामोके प्रधान शिष्य हैं। मुनिवृन्दर्म ऑपकी सानोका दूसरा विद्वान नहीं गृहरूथ में भी बड़े बड़े पंडित कहलानेवाले आपकी बुद्धि को प्रणाम करते थे | आप चारों अनुयोगोंके प्रकाण्ड पणिउत ओर उप्र तपख्वों हैं। संख्कृत प्रास्त मराठी गुज़रातो भाषाये' भो खूब ज्ञानते हैं। अपहो उपदेश शेली बड़ी उत्तम प्रभावक है। आप मोक्षकी प्रधान सोधनभूत सउ्जातीयता, वर्णव्यवस्थाके रक्षक पोषक और निर्वादक हैं. इसलिये प्रायः मोक्षमागंविरोधी लोग आपसे अप्रसन्न हो ज्ञाते हैं. परन्तु आप जिनागमको आह्ाके आगे किसीके रोष तोषका ब्याल नही करते।

आपने शुभ प्रिती पौष बदी १३ वि० सं० १६४० को शुभ नक्षत्र्में लण्डेलवाल ज्ञांति और श्रेष्ठ पद्दाल्या गोतमें नांदगांव प्राममें अन्म घोरण किया है। आपके पिताका नाम श्रोनथ- मलजी भोर माताका नाम सीता है। आपकी ग्रृहस्थावख्या- का नाम छुशालचन्द्रज़ी पहाड़ था। आपने वि० सं० १६७८ में पलक पन्‍नालालअऔके समीप वारद व्रत धारण किये थे। इसफे बाद कोन्‍नूर नगसमें पृष्य श्रो १०८ श्रीशांतिसागरज़ो मद्ाराज़के

( )

पथित्र उपदेश्से प्रतिमाके ब्रत धारण क्थयि। बादमें थि० रां० १६८० फाद्युण शुक्ला के दिन क्षल्ककके ध्त धारण किये और आपका नाम बदलकर श्रोचर्सागरजों हो गया। वि० सां० १६८६ अगदन खुदी १५ के दिन भोषने पवित्र सोनागिरि सिद्ध- श्षेत्रपर मद्दाव्रत धारण किये। आपकी तपश्चर्यां बहुत हो उच्च- कोटिकी है। एस वर्ण (वि०सं० १६६४ में) आपने जयपुरमे' ससंघ खातुर्मास किया है। आप जेनसमाजके गौरव बढ़ानेवाले आदर्श हैं।

निरुक्ति और अनुवादकारक

जातिभूषण सिद्धांत शाख्री पंडितप्रवर गोरीलालजो पद्माकर |

स्वस्ति श्रीप्रतिश्रुतादिकुल्करेम्य; निरुक्तिकार अनुवादकका परिचय

मथरा प्रास्तमें बेरनो नामक निगम श्रोपाश्वनाथ जिन- चैत्यालयसे शोमित है, जद्वांपर करीब ३०० वर्ष पहले एक भ्रीमक्सी नामक सदुगृहरुथ निवास करते थे। जो कि पप्माबती- पुरवाल ज्ञात्युदुभव पद्माकर गोत्रको अलंकृत करनेवाले थे। उनको संतति प्रतिसंततिमें श्रीशवलालज्ञीनामक प्रतिष्ठित खदा- चारी सज्जन हुए, जिनके रामलालजी भौर उद्यराजजी नामक दो पुत्ररक्ष हुए ज्ञो कि शास्रस्वाध्याय, जिनपूतन और चर्चा-वार्ता करनेमें उत्सुक रहते थे। जिनमें से ज्येष्ठ श्राताके तनुज्ञ मनो- रामज्ो और गौरीलालजो हुए, तथा दूसरे भाईके प्यारेलालभो, सोनपालज्ी, बंशीधरजी, खूबचन्दज़ो ओर नेमोचन्दज्ञी पांख पुत्र-रक्ष हुए ज्ञिनको पिता और पितामहने द्विन्दी गणित और मद्राजनी पढ़कर संस्कृत प्राकृत भाषाका भी परिक्ञान कराया। उनमेंसे पं० गौरोलालजीने सदाचारपृ्थक विद्याध्ययन कर औओओो अपने कत्तव्यका पालन किया है बह अन्य प्रातृवर्गोंकों भी अनुकरणीय है जिनका परिचय इस प्रकार है।

अनुवादकका परिचय

पंडित गौरोलालजीने अपने जन्मभूमिस्‍ख्य राजकाय स्कूटॉमें पांचवीं कक्षा तक हिन्दों भाषाका अध्ययन किया। अनश्तर

( )

अलीगढ़ दि० जैन पाठशालामें व्याकरण काव्य सादित्वका अध्य यमन कर वनारसमें उच्च कोटिके “मनोरमा शेषर फक्षिकां- प्रकाश”, न्याय, बेशेषिक, सांख्य, साहित्यद्पण आदि शाखोंका अध्ययन कर देहलीमें छात्रोंको अध्यापन कराते हुए कपड़ेका व्यदसाय कर आजीविका करते रहे।

कुछ दिन बाद्‌ पिताका वियोग द्वोनेपर जवांहरातका भी काम किया फिर स्वदेशी आन्दोलनके समय स्वदेशी कपड़ेका पुनः व्यवसाय शुरू कर दिया |

अनन्तर जलेसरमें स्वदेशो कपड़ोंकों तेयार कश्वा कर आगरा, मांछया भादि प्रान्तों में खपत कराते रहे जिससे देशमें स्बदेशी ध्यापारमें उन्नतिछाभ कर अर्थलाभ बढ़ाया |

विद्याप्रदान

आपकी प्रोति जैन आष-काव्य न्याय व्याकरण शाखमें अधिक बढ़ती रद्दी जिससे अनेक सज्जनोंकों प्रथप्राजुयोग, करणाजुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग सम्बन्धी शांख्रॉको पढ़ाया, जनताकों खुनाया भौर विविध पाठ्शालाओंमें पढ़वाने- का प्रयज्ञ कराया। तथा भसारतवर्षोय दिगम्वर जैन परीक्षालयका मन्त्रित्वपद स्वीकार कर १५-१७ वषतक परोक्षण निरीक्षण बर विद्याथियोंकों उत्तोर्णपत्र, पारितोषिक प्रदान कर जैन- व्याकरणादि शाख्रोंका प्रोत्लाहइन बढाया तथा भा० ब० दि० जैन महाविद्यालयका मन्त्रित्व पद्‌ स्वीकार कर उसका संचालन किया दि० जैन गुरुकुल तथा भारतवर्षोष दि० जैन पद्म अं ती-

( )

परिषदुके मंत्री भौर उसको पाठशालाके प्रवन्धकर्तता होकर जलेसरमें समीचोन विद्याका प्रखार किया, तथा उसके कई बार सभापति होकर न्याय, नोतिके अचुसार शिष्टानुप्रह और अशिष्टतासे सुरक्षित कर ज्ञाति और कुल-रक्षा की, रक्षाके साधनोंको दृढ़ किया ओर कराया तथा संवत्‌ १६७२ में जाविकी मदु मशुमारी कर उसके स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध, विवाहित, भवि- बाहित, पढे, ,बेपढे, ओर विधवा सघवाभोंकी संस्याओंकों तथा अैनमन्दिरोंकी गणनाकों बतानेवाली पुस्तकको प्रकाशित किया। जिससे जातीय जनतामें विशेष लाभ हुआ और ज्ञातोय ज़नताने आपको कृतशता-सूचक “जञाति-भूषण” पद्वोसे अलंकृत किया तथा पद्मावतोपुरचाल जातिके विवाहादि संरूकारों में जो प्राचीन कालसे जैन-विवाह-पद्धति अनुसार पॉडेलोग विवाहसंल्कार कराते हैं उनके पठन पाठनमें जो अशुद्ध पाठ भौर अशुद्ध मन्त्रो- चज्यारण थे उनको बहुत अंशोमें ठोक कराया, तथा बहुतसे आदमी अपने गोछ्रोंके नामसे अज्ञात थे उनको ज्ञात करानेका प्रथल किया भोर प्रचारमें लानेका, बोलनेका ओर समभने सम- भानेका, बोलने बुलवानेका प्रचार बढाया |

आपने सूलबद्रीमें श्रीधवल, जयधवल सिद्धान्तप्रन्थोंका स्वाध्याय कर अपने श्र तशानकों बढाया तथा अर्थोंकों छुनाया जिससे श्रीचारुकीतिप ण्डिताचायं आदिने आपको सिद्धान्त-

शास्त्री पद्चीसे विभूषित किया भाप बतमानमें धोऋषभ ब्रह्मचर्याश्रम चौरासो मथराके अधिष्ठाठ॒त्वपदका कार्य सम्पादन कर रहे हैं।

( जज ) आचार

यद्यपि आपके सदाचार, जात्याचार और धर्माचार साधां- रणतया उत्तम प्रशंसनीय हैं तो भी पारलौकिक धमकी सिद्धि- केलिये आचाये श्रीशांतिसागरख्वामीके निकट संबत २४०८ में सप्तम प्रतिमाके व्रत अड्रीकार किये जिससे कि जनतामें शान- खारिशत्रको एकताको एकाधांर कर प्रदर्शित किया

आपने जैनसिद्धान्त-सम्बन्धी गूढ रद्ृस्योंकी, तथा ज्ञाति- व्यवस्थी सम्बन्धी नीति (7०7॥॥ ]»७ ) को स्पष्ट इ"ग्लिश राज्यशासनमें जजमेन्टका काम देवे इसके लिये पं० नन्‍नूमछज़ो मंत्री जैन छा विभागकों भारतवर्षोगजैन ला बनानेमें सहायता दीनो भौर उसके संरभमें प्रयक्ष किया। तथा ज्ञाति पांति तोड़नेवाले तथा करेवा, धरेज्ञा, पाट आदिको जिवाह बताने थाले असदाचारियोंके फनन्‍्देसे बचानेके लिये समाचारपत्रों ( स्याद्वादक्ेशरो, जैनगज़ट, खण्डेलबाल जैन द्वितेच्छु आादिमें तथा अपने सम्पादकत्वसे चलनेवाडे जैनसिद्धान्तमें ) लेख दे कर जैन-जनताको बचाया |

आपने श्री १०८ दंदनीय तपोतिधि चन्द्रसागर प्रभ्ूति विद्वानोंके दृदयोंमें जेनेन्द्र व्याकरणको स्थापन ( अध्यापन ) ज्ञागृत कर अपनी कठिनतासे प्राप्त की हुई विद्याको बहुत कालके लिये ज्ञाज्वल्यमान किया। ज्ञिसके प्रभावसे त्यागो शतियोंमें

जैन आये संस्कृत प्राकृत मागधी भाषामय आचार शारुत्रोंका तथा समन्तभद्रीय भ्रावकाचारोंका प्रकाश फैलाया भाजकछ 'भ्रीवोरसंवत्‌” लिखनेकी ज्ञो पद्धति है, वह

( छा.)

आपके प्रयलसे हो चालू हुईं। श्रोऋषभ ब्रह्मचर्याश्रम हर्तनाग- पुरकी नीव डालनेमें आपका प्रयत्न प्रधोन था |

करोव आजसे ४००-२५० वर्ष पूर्व आंषविद्याके पढने पढ़ाने की, यशोपवीतादि संस्कारोंको तथा मुनि आंयिका श्रावक श्राविकाओंके आचार-विचारको प्रवृ/त्त अक्वान अन्धकारसे ढक गई थी भौर जैन धार्मिक जातियां डगमगा रही थीं उनको हस्तावलूम्बन देनेके लिये ( तथा जात्पयांचार, कुलाचार, धर्मा- चार दर्शानेके लिये ) श्रीशान्तिसागर जैसे आचांयों' का हिन्दु- स्थांनमे' विहार करनेका सुअवसर प्राप्त हुआ। तथा उनके संघखुथ मुनिराज्ञोंका इधर उधर व्याप्तरूप ध्याख्यानोंके होनेका यशोपवोतादि संस्कार, प्रतिमारूप चारित्रोंका प्रहण ओर मह्दा- व्रतोंके घारण करनेका विधान होनेसे जैनचर्ममे प्रभावनां बढी तथा जनताको श्रावर् सम्बन्धी आचार-विचारोंकों जैन आषं- आस्नायाजुसार प्रगट जॉननेकी उत्कण्ठा हुई इसलिये इस रलकरण्ड-प्रावकाचारकी श्री १०८ प्रभाचन्द्राचाय रचित संख्कृत टीका सहित तथा वतेमान देशभाषामें' करण और उन कारिकाओं के ग्रूढ गमकमयी वाफ्परोंको प्रगट निरुक्ति द्वारा प८दार्थोको बतानेवाले अन्वयाथके साथ निरुक्त लिखा। यह समस्त भव्य संततिको लाभकारी होवे इसलिये इसको पुख्तकाकार तयार कर प्रकाशित किया गया है। जिससे जैन जनता ( विद्यार्थों और प्रसाथियों ) के अक्लानांघकार दूर होकर शुद्ध अनादिनिधन बद्ध मान उपोसकाध्ययन समनन्‍्तभद्रोष पासकाध्ययन श्र।वका- चारले विभूषित दोकर इहलोर और परलोकमे' अभ्युदयको बढ़ाती हु; निश्र यस मार्गमे संलूग्न रहें।. विनीतः--

भोलोल जैन काथ्यतीर्थ

3४:७2%॥९:#:7७९४:४०:७॥220७2:927%2%2 आभार प्रदर्शन

इस प्राचीन आप समन्तभद्रीय श्र बकाचा रका प्रसार जनताके हृदयोंमें पहुंच सके इसके लिये श्रीमान्‌ ग्ुनिभक्तपरायग पर्मवत्सल श्रष्ठिवय सेठ गम्भीरमलजी पांड्या कुचामननिवासीने अपने नगर और घरको चरणों द्वारा प्रवित्र करनेवाले श्री १०८ तपोनिधि चन्द्रसामरज़ी घुनिराजके आहार और वषा- योग होनेके उपलक्षमें इस ज्ञ नोपकरणको प्रसिद्ध करनेमें अपने न्‍्यायोपाजित द्रव्यको लगा कर अपने गृह्थधमंकी सफल बनानेका साभाग्य प्राप्त किया है

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पाठकों से अनुरोध 23.

१- यह यन्त्रित भ्रावकाचार प्रन्थ आपके समक्ष विराजमान है। इसमें दृष्टिदोष, लंशोघनकी भूल, प्रेसकी असावधानी एवं अह्ञामता आदि फारणोंसे अशुद्धि रह आना सम्भव है अतएव विज्ञ पाठक शुद्ध कर पढ़ पढ़।वे' ओर छुनावे

२- प्रभाचन्द्रोय संख्कृत टोक', निदक्ति और टिप्पणोके पदों षर्णो को शुद्धता--भशुद्धता परस्पर ( एकको दूसरेसे ) आन कर शुद्धताकों श्रदण कर वाक्यार्थ करें

३-ओ पद, वाफ्य तथा इनका अथ अपने जाने हुए अथसे बिलक्षण जले उतको संस्कृत ध्रोप्रभाचस्द्रीय टोकासे शांत करना | फिर भो सम्तोष नहीं धोवे तो अन्य भाष संस्कत-प्राकृत प्रन्थोंसे मिलाकर अविरोधों बननेका प्रयत्ञ करे

आशा है श्रतार्थीं, शिक्षक और विद्यार्थोगण दोषप्राहदो बने गे किन्तु हंसके समान दोषश् विवेकों गुणप्राहक बनंगे

यदि धार्मिक बन्चुवर्गोंने इस भ्रन्थले लोभ उठाया तो अपना प्रयास सफल सम्रके गे

--प्रकाशक

श्लोकोंकी अकारादि क्रमसे सूची

#तिवाहनातिसंप्रह- प्रध दिचा रजनी वा प्नोत्सार्थ बिना गगेः अनुमतिरासरम्में वा भन्‍्तःक्रियाधिकरणं अन्‍्ने पान॑ साथ अन्यविवाधाकरण- अन्यूनमनतिरिक्त अभ्यन्तरं दिगवधे- अमराधुरनरपतिधि- अहपफलवहुविधाता- वर्धेबहिरणु ॥पं अशरणमशुसमन्त्य॑ भ्ष्टग णपुश्तुष्टा भहेष्घरण सपर्या- अक्षार्था्ना परिसं-- अक्ानतिमिरव्याप्ति- आपगासांगरस्तान- आप नोट्सन्तवोषेन आंत्तीपश्मनुलक घ्य- आरम्भसंगर्साहस- आलोच्य सवमेन! भआसमयपुक्तिमुक्त' आहारोपधयोर- आंद्वारं परिद्याप्य!

१०६ १५२ १8 २३८ २१०५ २३८ १०३४ (८ १३३ ७२ १४८ १२६ १७८ ६६ २०५ १४४ रह ४८ श्ष १३६ २१२ श्द््छ १६६ र्श्५

इदमेवेट्रशर्मे

उच्च गोंत्र' प्रणते उपस्तः दुमिक्षि ऊर्ध्वाधस्तात्तियेग पएकान्ते सामथिकं ओज्ञस्तेजो विद्यो- कन्दप कौतुच्य कमपरवशे सान्‍्ते , कापथे पथि दुःखारां काले कठ्पशतेषपि च॑ क्षितिगतम्विवटवीज्ञप्‌

क्षितिसलिऊलदृहनपव १-

क्षुत्पिपांसा जरातंक-

खरपानहापनाम्रपि गृहकमणामपि निश्चितं गृहण विसर्माख्तरणा- गृहतों मुनिक्ममित्वा गृहमेध्यनगराणां गृहस्थों मोक्षमागंस्थों गृहहारिप्राम्राणां

गृहि०| ते था तिष्ठत्य-

चतुरा +त्तजितय- चतुराद् रविसजेन-

१७२

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खौरप्रयोगचौरा्था- १७०६१ छेदनवन्धनपोड़न- ६६ अन्मजराभयमरण: २२० जभीवितमरणाशंसे २९७ जीवाजी वसुतन्वे प्छ हान॑ पृजां कुल' ज्ञातिं ७५५ ततो जिनेन्द्रभक्तो सयो ३० तावदशनचोरो 5 रे तिय्येकफलेशवणिस्या-_ १३५ श्रसहतिपरिहरणा १४७ वृशनाच्चरणाह्वापि २६ दशेन शानचारितात्‌ ६१ दान वेयावृत्त्यं १८७ दिग्वलयं परिगणितं १२७ दिग्वतमनथ दण्ड- १२३ वेधाधिदेवचर २०३ देवेन्द्रचक्रम दिमानममेयमानम्‌ ७६ देशयामि समीचोन॑ 8 देशांवकाशिकं वा १५७ वैशावकाशिक स्यात १५८ घनधान्या दिप्रन्थ॑ १०५ धनश्रीसत्यधोषो ११३ घर्मांस्त सतृष्ण १८३ तु परदारान्‌ गच्छति १०२ नमः भीवधसानाय_

नानिधितत्तद्यरत्ता-.. ७३

तवपुण्यः प्रतिपक्तिः

सम्यफ्त्वसमं किखित्‌ नाडुद्दीनं मल

नियमों यमश्च विद्वितो निरतिक्रमणमणुवृत- निःश्रे यस थिपन्‍ना- निःश्रे यसमस्युदय

_ निहित वा पतित॑ था

परमेष्ठी पर ज्योति परशुकृपाणखनित्र- परिवादरद्दोम्यांख्या- पच्ण्यष्टम्यां पचदिनेषु चतुष्व॑पि पपोपदेशहिं सा- पापमरातिधर्मों पृज्ञार्था श्वये- पंचाणुब॒तनिधयो पंचानां पापानां पंयाना पापाना- प्रत्याख्धानतनुत्वा- प्रथ शनुयोगमर्था- प्राणतिपातवितथ- प्रेषणशब्दानयनं

वधवन्धच्छे रोदे-

भयाशास्नेहलोभाज्च| भुक्त्ता परिदातध्यो

१५० २६३१ २२७ २१८

६६

११७५

६८ १८१ श्३५ १३७ २७७ २२६ १०७ १३० १८३९ ११२७

८०

६२ र६रे

१३८ ६0 १४५

भोजनवाहनशयन- मकराकरसरिदर वी ' म्रधमांसमघुत्यार महबोज मलयोतिं मावड़ घनदेवश्य बूछूफलशाकशांखा- मूर्धरुहमुध्टिवास्ते मोदतिमिरापहरणे

बद्निष्टं तबु प्रतगेदु यदि पापनिरोधो <न्य- पैन स्वयं बीतकऊंकवियां रागढे पनिवृ्ते - लोकालो फविभक - घरोपलिप्सयाशावान्‌ वाक्कायमानसानां बाह्य पु दशस चस्तुष॒ विद्यादशनशक्ति- विद्यादृत्तस्यसं भूति- विषयविषतो 5नुपेक्षा- विषयाशावशातो तो ध्यांपरिव्यपनों द्‌- व्यापांरव प्रनस्यादु शित्रमजरमसजमक्षय- शीतोष्णदंशमशक- शोक॑ भयमवसादं॑

(ढ )

१५२ श्ष्५ १२१ १३६ १७८ २३३ १६६ <६ ६७ ५५ २७६ ८७ ८२ ४६ १७६ २४२ २२१ द्दर १५४ १८ १८६ १७० ७8 १७५ २१४

भ्रद्धानं परमार्थानों आ्रावकपदू/नि देव:

श्रोष णव्‌ पभसेने

ध्वापि देवोइपि देवः श्वा

सकल विकल' चरणं सप्रन्धारम्भहिंसानां सदुदृष्टिश्ानवृश्ानि सम्पर्द्शनशुद्धां- सम्पग्द्शनशुद्धः सम्यग्द्शंनसम्परत- सामायिके सारम्भः सामा यिक॑ प्रतिदिवसं सोमान्‍्तानां परता छुलयुत खुखभूमिः सेवाकूृषिवा णिज्ष्य- संकल्पात्कृत्कारित- संवत्सरमृतुमयन स्थूलम्रलीक' वदति स्नेह वरं सड़ू

स्मयेन योउन्यानत्येति स्वभावतो5शुच्रो काये स्वयध्यान्धति सवुभाव- स्वयंशुदस्य मार ख्य हरितपिध।ननि्राने हिंसानतथोयेम्यो

चदक्रकइम्न्यडन,

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द्द २२६ ५९ १७३ १७२ श्ध्र २५१ २४१ ६४ १६० ६७ २१४ है बश्‌ २३ २५

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. स्वस्ति श्रीप्मन्तभद्र॒स्वामिभ्यः | रत्नकरण्डश्रावकाचार: श्रीप्रभाचन्द्राचार्थ निर्मित टीकयाउलंकृतः अन्वयार्थेन निरुक्तेन पशञ्ञिकया विभूषितः

समन्तभद्रं निखिलात्मबोधन, जिन॑ प्रणम्याखिलकर्म शो पनम्‌ निबन्धन रत्नकरण्डके परं, करोमि भव्यप्रतिबोधनाकरम्‌ १॥ श्रीसमन्तभद्रवामी रनानां रक्षणोणयमभूतरतकरणडक्ग्रस्यं

सम्यम्दशनादिरत्नानां पालनोपायभूत रत्नकरण्डकासयं शाज्न॑ करते कामो निर्विष्नतः शात्रपरिसमाष्यादिक॑ फलममिलपन्निष्टदेवताविशेष

नमस्कुपैनाह; नमः श्रीवद्धमानाय, निभूतकलिलालने सालोकानां त्रिलोकानां,यद्धिया द५णायते ॥१॥

्‌ रखकरण्बश्षावकायार:

“नमो” नमस्कारोउस्तु | कस्मै ? “्ीबधमानाय' अन्विमती- थैज्डराय तीयैकरसमुदयाय वा | कर्थ ? अव--समन्तादद्ध परमातिशय- प्राप्त माने केवलब्बानं यस्यासी वर्धभान:। *“अवाप्पोरछोप:” इत्यब- शब्दाकारलोप: श्रिया बहिरज्जयाउन्तरज््या समक्शरखानन्तच- तुश्यलक्षणयोपलक्षितो वर्ष मान; श्रीवधमान इति व्युस्पत्ते, तस्‍्मे कथंभूताय ? 'निधृतकलिलात्मने! निधूतत स्फोटित कलिलं ज्ञानावर- णादिरूप पापमात्मन आत्मनां वा भव्यजीवानां वेना: से. निधृतकलि- लात्मा तस्मै | यस्य विद्या केवलज्ञानलक्षणा कि करोति ? 'दर्पणा- यते! दपैण इवास्मानमाचरति केपां ? “त्रिलोकानां! त्रिमुवनानाम | करथभूतानां ! 'सालोकानां! अलोकाकाशसहितानाम | अयमर्थ:--यथा दर्पषणो निजेनर्द्रियागोचरस्य मुखादे: प्रकाशकस्तथा सालोकत्रिलोकानां तयाविषानां तद्विया प्रकाशिकेति | अत्र पू्वार्द्नन मगबतः सवेज्ञ- तोपाय॥, उत्तराधिन सर्वज्ञतोक्ता ?

अन्वय;--श्रीवद्वमानाय नम: मवतु | कथम्मृताय श्रीवद्धमा-

नाय निवृतकलिलातमने यद्दि्या सालोकानां त्रिलोकानां दपणायते | निरुक्ति:-- वद्धते इति वद्वमानः श्रीसदितों वद्धमान: सः श्री वद्धमान: | तस्मे श्रीवरद्धमानाय | निवृतानि कलिज्ञानि धातिक॥णि

कलीजीणणभभा

१-इचुडः वृद्धी, इति धोः 'सल्छट: २३१३ इति शानः त्यः। व्धेमानः सन्मतितीर्थकरः, तथा त्रा सन्मतिर्महतिवोंरों, महावीरो5इन्त्यकाश्यप: नाथान्वयो वर्धामानों यत्तोथमिह सांप्रतमम | इतिं, घनश्चयनाममाला। २-उपपद्विभक्तथाः पष्ठ्याः स्थाने “शक्‍्तारथनमःस्वर्ति स्वाहा बषट स्वथाहिली” १8२६

इति जैनेन्द्रसल अप्‌ ( चतुर्थों विभक्तो)

टोकानिद्कपशिकामिरलझछतः |

नकल ले

लडकी जल जज +७ज+->5>> ०-४ ++ ५०5 5 >कर

आत्मन: असी निर्वृतकलिलात्मा तस्मे निदूधृतकलिलात्मने | अथवा निभूतानि कलिलानि पापकमोणि यस्य निर्धृतकलिल:-॥ सचा- सी आत्मा स्वरूपो यस्यासी तथा तस्मे | अलोकेन सहिता; सालोकीा तेषां सालोकानाम्‌ त्रयों लोका; त्रिलोका; तेषां त्रिलोकानाम। यस्य विद्या यद्विया दर्पण इब आचरति इति दर्पणायते ॥१॥

अथ--श्रीवद्ध मान स्वामीको नमस्कार होवो किस प्रकारके वरद्धमान तीथेकरको ! जिन्होंने चारधातिया कर्म नष्ट कर दाले हैं और जिनका ब्ान अलोकाकाश तथा तीनों लोकोंके से पदार्थोको दर्पणके प्रतिविम्धके समान प्रगट करानेवाला है ॥१॥

विशेष-दर्पण तीन प्रकारके होते हैं स्क्ष्मदर्शी १, प्रतिदददर्शी २, दुरदर्शी३े जिससे स्क्ष्म ( वारीक ) स्कन्ध ( जीणेज्वर वालेके रुघिरम बढ़े हुबे सक्षम अवयव ) तथा शरीरी जीबोंके अंग प्रत्यगोंकोी स्थृूलरूपसे देख सके उसे बह््मदर्शी ( )४४०००5००००-माईक्रोस्कोप खुदवीन ) कहते दे | दूसरा जिससे शरीरके मध्यवर्ती चमे रुधिर मांस आदिसे ढके हुवे (छिपे हुवे ) अस्थि ( हाड़ ) नशा जाल आदिका ग्रतिविम्प लेकर उससे उनकी विरृति स्वस्थता (स्थिरवा) आदिको देखसके वह प्रतिदृतदर्शी (2७ ४-८

१-बानोचः |४।३६(२४६ इति सहस्य आदेशः ए- 'क्यडः ज” २११२ इति फ्यडः क्थः "तदन्ताः घघाः” शशा४४ इति घ॒ संह्ा “डदितों दुः” १३६ इति दः।

झ्ले. रककरण्ड्श्ाावकायार।

ल्ल्च््ल्न्ल्च्श्प्व्च्क्ललजज लिन ख्ख्ल्ल डी जल * “जप 3० -ट+-ज+ 5 -+

एक्सरे ) दर्पण है तीसरा जिससे दूरबर्ती देशोंमें स्थित पर्वत वृक्ष जहाज मनुष्य पश्ु पक्षी आदिको देखसके -- प्रतिविम्ब लेसके बह द्रदर्शी दपण (['०]०४००१७ >टेलस्कोप) है . - छोकमें जो इन्द्रियोंके अगोचर पदार्थ हैं वह भी तीन प्रकारके हैं | स्रक्ष्म पदार्थ जैसे कामोणवर्गणा, वैक्रियिकवगेणा आदि स्कन्ध। प्रतिहत पदार्थ जैसे पर्वत भूमि मित्ती आदिके पश्चात भागमें स्थित अथवा वर्ष युग कल्प आदि कालसे पहिलेके पदार्थ जैसे रापचन्द्र सीता भरत वर्धभान आदि महापुरुष | दूरवर्ती पदाथ जैसे संख्यात असंख्यात कोशों दूर देशो स्थित सुमेरुपवंत, नन्‍्दीश्रर द्वीप, स्वयंभूरमण, सोधमस्त्रग, अह्मलोक इत्यादि तथा संख्यात असंख्यात वर्षिकि पहिले अतीत कालादिमें होते हुवे कुलकर तीर्थंकर राम रावणादि महापुरुष इन सब प्रकारकी वस्तुओंकों जो तीनों लोकोमें हैं थीं ओर होंगीं उनको वह श्रीवद्धमान स्वामीका कहा हुआ श्रतज्ञान हम छग्रस्थज्ञानियोंको दशाता है इसलिये इसकी उपयुक्त दपंगकी समान उपमा बताई है

अथ तम्नमस्कारकरणानन्तरं कि कते लग्नो भवानित्याह- घर्मोपदेश करनेकी प्रतिज्ञा

देशयामि समीचीन, धर्म कर्म निवहणस्‌

संसारदुःखतः संचानू, यो धरत्युत्तमे सुखे ॥२॥

टोकानिडक्रपजिकामिरलडछतः ]

आम बकाया अनशन रा सी बज हक मल जल साल शक

“ददेशयामि कथषयामि | कम ? 'धमे!। कथभूत ! 'समीचीने! अबाधित तदलुष्ठातृणामिह परलोके चोपकारकम्‌ | कथेते तथा निश्चितवन्तो भवन्त: इब्माह 'करमनिबद्वेण/ यतो धम: संसारदुःख- सम्पादककर्मणां निबहशों विनाशकस्ततो यथोक्तविशेषणविशिष्ट: | अमुमेवार्थ व्युव्पत्तिद्वारेणास्य समथयमान:ः संसररेत्याधाह। संसारे चतुगतिके दु।ःखानि शारीरमानसादीनि तेम्यः 'स्चान! प्राणिन उद्धृत्य 'यो घरति! स्थापयति |, £ “उत्तमे धुखे” खगीपवर्गादि- प्रझने सुस्त, धर्म इत्युच्यते || २॥

अन्धयः--अहं समी्चीन धम देशयामि। कथंभू्त धमे ? कमे- निवह णम्‌। यः सत्तान्‌ संसारदुःखतः उज्त्तमे घुखे धरति।

निरुक्तिः--कभाणि नित्र्हयति इति कर्मनिवह थः तम्‌ कमेनि- वहणम्‌ | तत्युरुप: | संसारस्य दुःखानि इति संसारदुःखानि तेम्यः संसारदु:खतः॥

अर्थ- मैं समंतभद्राचाय समीचीन धर्मको कहता हूं कैसा है वह घम ? मोहनीय आदि कर्मोका नाश करनेवाला है तथा प्राणियोंको जन्ममरणरूपी दृःखोंसे छुटाकर उत्तम अविनखर शाश्रत सुखमें रखनेवाला है २॥ -

अयेवंविधधमस्व॒रूपतां कानि प्रतिपच्चन्त इत्याइ-

धर्मका लक्षण '

संदरृश्त्षानवृत्तानि, धर्म धर्मश्रा विदुः। ..

ह।

१-“तलेः” ४।१।११७ इति तस्‌

रखकरण्डअश्ावफाचार:

७9 ५००७०८६८०--३०+न नर 2 4 266 ,#ू+भ भरने नस + <७ 3 +फरननटेनब ह३+० कद हम कक

यदीयप्रत्यनीकानि, भवन्ति मवपद्धतिः ॥३॥

इृष्टिश्व तत्तवार्थश्रद्धानं, ज्ञानं तत्त्वायग्रतिपत्तिः, इसे चारित्रे पापक्रियांनिवृत्तिलक्षण सन्ति समीचीनानि तानि इृष्टि- ज्ञानइत्तानि च) “पमे! उत्तखरुप 'विदु:” विदन्ति प्रतिपबन्ते | के ते ? “घर्मश्ररा!! रन्नत्रयल्नक्षण धर्मस्य ईश्वरा अनुष्ठातृत्वेन प्रतिपा- दकश्वेन खांमिनो जिननाथा: कुतस्तान्येत्र धर्मों पुनर्मिथ्या- दर्शनादीन्यपील्याह-यदीयेत्यादि येषां सद्दृष्ट्यादीनां सम्बन्धीनि यदीयानि तानि तानि ग्रत्यनीकानि प्रतिकूलानि मिध्यादश- नादीनि “भवन्ति! सम्पच्चन्ते। का! “भवपद्धतिः संसारमार्ग:। झयमथे:-यतः सम्यग्दर्शनादिग्रतिपक्षभूतानि मिथ्यादरशनादीनि संसारमार्गभूतानि | श्रतः सम्यग्दशनादीनि म्वगो१वर्ग्ुखसाधकत्वा- द्र्मरूपाणि सिद्धवन्सीति

अन्वयः---धर्मश्वरा: सदश्ज्ञानवृत्तानि घमम बिदु। यदीयप्रत्य- नीकानि भवपद्धतिः भक्नन्ति

निरुक्तिः--धर्मस्य ईश्वरा धर्मेश्रत: दृश्िच ज्ञान बृत्ते' दृष्टिज्ञानजत्तानि। सन्ति (समीचीनानि) यानि हृष्टिज्ञानचू- लानि इति सद्दृश्ज्ञानवृत्तानि| येबाम्‌ इमानि यदीयानि, यदी- यानि च॒ प्रत्यनीकानि इति यदीयग्रत्यनीकानि |. भवस्थ पद्धति: भवपंद्धति: ॥३॥

१-धर्मख्य उपक्ातारः. अहन्त: २-दशनशानचारित्राणां

विरोधोनि भिध्यादर्शनमिथ्याक्ानमिध्याचारित्राणि | ३-संसारमार्ग:

टोकानिरक्तपञ्षिकामिरलडछतः अथ-जिनेन्द्रदेव सम्यग्दर्शन सम्यग्ब्ान ओर सम्यक्चारित्रको धर्म कइते हैं इनके जो उलठे हैं ( विरोधी-दुश्मन हैं ) वे संसारके मार्ग हैं रे तत्र सम्यरद्शन स्वरूप ठयाख्यातुमाह- सम्प्द्शनका लक्षण अद्भानं परमाथाना-माप्तागमतपोभृत,स्‌ त्िमृटापोटमशंगं, सम्यग्दशनमस्मयम्‌॥ 9 ऐ॑ सम्यरदशन मत्रति | कि: “्रद्धानं! रुचि: | केषाय्‌ ! आा- पागमतपोभ्तां! वच्यमाणास्वरूपाणाम्‌ | चेवे षड्द्व्यसप्ततक्तनव- पदार्थानां. श्रद्धानमसंगृहीतमित्याशडुनीयम्‌ आप्तानमश्रद्धानादेव सच्छद्वानसंग्रहप्रसिद्धे! | गबाधितायेप्रतिपादकमाप्तवचन ह्यागमः तच्छद्वाने तेषां श्रद्धानं सिद्धमेव | कि विशिष्टानां तेषाम ? 'परमार्थानाम परमार्थभूतानां पुनर्बीद्धादिमत इब कल्पितानाम्‌ कर्यभूत भ्रद्धाने ? अस्मयम? विद्यते वक्ष्यमाणो ज्ञानदर्पा यश्प्रकार: स्मयो गर्बो यस्य तत्‌। पुनरपि कि विशिष्ट £ “ल्रिमृढापोढं! त्रिमिमूढेवेक्य- मार्णलक्षणैरपोर्द रहित यत्‌। “अशांगं” अष्टो वक्ष्यमाणानि निःशे- कितल्वादीन्यद्भानि स्वरूपाशि यस्य अन्वयः-आप्तागमतपोझतां श्रद्धानं सम्यग्दशन मबति करथषे- भूतानाम्‌ आप्तागमतपोभश्ताम्‌ परनाथोनामु कथयंभूत॑ श्रद्धान श्रिमढ़ापोढ़ं पुनः अस्मयम्‌ | कर्थभूतं सम्यग्दशनम्‌ अश्टाज्म्‌ निरुक्तिः-भापतच आगमश्च तपोशच् इति आप्तायमतपोमत३, सेषाम्‌ आ्प्तागमतपोभ्ताम परमः अर्थों येषां ते परमार्थीः तेषाम्‌ पर-

मील बज आल रह भी भरा अप अली अीज मी मी की चीज लीड भेज कीट बा अलवर की

मार्थानां | त्रयो मृढ़ा: इति त्रिमूढा: | त्रिमुढेम्यः अपोद़: सः त्रिमू- ढापोढ: तम्‌ त्रिमूहपोढम | अष्टो अंगानि यत्य तत्‌ भ्रषटज्ञम | ने सन्ति स्मया यरिमनु वा यस्य तदू अस्मयम्‌ ॥9॥ अर्थ-अरहंतदेव जिनागम औए निग्रेन्य ग्ुरुका श्रद्धान करना सो सम्यर्दशन है केसे है वे तीनों, चारों अर्थभेमिंसे मोक्ष ही है अर्थ जिनोंका | केसा है वह श्रद्धान तीन मूढ़ताओंसे रहित हे तथा आठ मदोंसे रहित है कैसा है सम्यग्दशन * जिसके आठ अंग हैं। तत्र सदर्शनविषयतयोक्तस्याप्तस्य स्वरूप व्याचिख्यासुराद- आप्तका लक्षण आपेनोत्सद्भदोषेण, सबज्ञेनागमेशिना भवितव्य नियोगेन, नान्‍्यथा ह्याप्तता भवेत्‌ ॥५॥ “आप्तेन! भवितव्यं, 'नियोगेन! निश्चयेन नियमेन वा | कि विशिष्टेन ? “उत्सन्दोषेण” नष्टदोषेण | तथा 'सर्वश्ञेन! सर्वत्र वि घये 5शेषविशेषत: परिस्फुटपरिज्ञानवता नियोगेन भवितव्यम्र | तथा “आगमेशिना” भव्यजनानां हेयोपादेयतस्तरप्रतिपत्तिहेतुमूतागमप्रति- पादकेन नियमेन भवितव्यम॥। कुत एतदित्याइ-'नान्यथा झाप्तता भवेत्‌” “दि! यस्‍्मात्‌ अन्यथा उक्तबिपरीतप्रकारेण, आप्तता भवेत

कल नन++- लता कप 3८ नर ल्‍ल पर अत + 4 70:25 १-कास्यादिमिः १३॥३३ इति काषसः पश्चमी तत्पुरुषः तु तृतीया तत्पुरुषः।

टोकानिसक्तपजिकामिरलडकूतः &

“५ अनजिन्‍जिजतण की मत कक 2 से. आम कला अमबह ीक जीर 3म मत नी रत पड अत कट नी

अन्वय-नियोगेन उत्सेन्नदोषेण आन भेवितव्य, नियोगेन सर्वज्ञेन झप्तेन मवितव्यम् नियोगेन आगमेशिना आप्तेन मवितब्यप्र हि अन्यथा आंप्तता भवेत्‌॥

निरुक्ति:-उत्सन्ना:उन्छिन्ना: विदीर्णा; दोष: येन सः उत्स- नदोषः तेन उत्सन्दोषेण। सबीन्‌ द्वव्यगुशपर्यीयान्‌ जानाति स॥ सवेज्ञ: तेन सर्वज्ञेन | श्रागमम्‌ ईष्टे कथयति इति झागमेशी तेन आगमेशिना |५॥

अथ---नियमसे दोषोंसे रहितही आप्त होता है तथा निश्चयस सर ज्ञ ही आप होता है ओर नियमस आममका जाननेवाला उपदेश करनेवाला ही आप होता है, इन तीनों गुणोंके बिना आप नहीं होता।

अथ के पुनस्ते दोषा ये तत्रोत्सल्ना हत्याशक्याह-

दोषोंके नाम

क्षुतृपिपासाजरातंकजन्मान्तकभयस्मयाः ।_ रागद्वेषमोहारच , यस्याप्तः प्रकीयते ॥९॥ चुच्च बुभुक्षा | पिपासा तृष्रा | जरा वृद्ध आतद्गुस्च

१-उच्छिन्नदेधिण' इत्यपि पाठः उत्पूर्गक षदलशातने छिद्रि द्व घीकरणे घोः क्तः “द्राततख्य ते नेाउमत्पृमूछाम" ५३॥८० अनेन तकारस्य नकारों दकारस्थ नत्थम्‌ उद्दशे विधेयें कर्तरि तृतोीया ६-भवितव्यमिति भू घो३ “तब्यानीयों” श१११०२ 'तयोव्यक्तलार्थ” २४.७८ इति भाषे तब्य:

32० रकरण्डभ्राचका यार

निनन >> कक ना+ >५ 25टज +“ > ८2 ७५ वजचिज+---+-->+ल ४० + 5 न्ल्‍जजििजिजाज-ज+ की जा जीी

व्याधि: | जन्म कृर्मबशाचतुगतिपृत्पत्ति:| अन्तकश्च मृत्यु: | भय चेह्वपरक्लोकात्राणागुप्तिमरग़वेदना एकस्मिकलक्षणम्‌ | स्मयश्च जा- 'तिकुलादिदर्प: | रागद्रेषमोडा प्रसिद्वा: | चशब्दाश्िन्तारतिनिद्रावि- 'स्मयमदविषादस्वेदखेद। गृह्यन्ते | एते एछादशदोषा यस्‍्य सन्ति आप्त: 'प्रकीत्यते” प्रतिपाबते | ननु चाप्तस्य भव्रेत्‌ छुत्‌, जुदभावे आह्यरादो प्रदृत्त्यमाबादेहस्थितिन स्यात्‌ अस्ति चासी, तस्मादाहारत्तिद्धि! | तथा हि भगवतो देहस्थितिराह्मरपूर्विका, देहस्थितित्वादस्मदादिदेहस्थितिवत्‌ जनेनोच्यते अत्र किमाहारमात्र साध्यते कवलाहारो वा ? प्रथमपक्षे सिद्धसावनता आसयोगकेवलित़ आद्वारिणो जीवा इत्यागमाम्युपगमात्‌ | द्वितीयपक्ते तु देवदेहस्थित्या ब्यमिचार: देखानां सबंदा कवलाहाराभावे इप्यस्था: सेभवचात्‌) भथ मानसाहारात्तेषां तत्र स्थितिस्तर्हि केवलिनां कर्मनोकर्माहारातू सास्तु अथ मनुष्यदेहस्थितित्वादस्मदादिवत्सा तत्पूिका इष्यते तहिं तद्वदेव तदेहे सतदा निःस्वेदत्ाइभाव: स्यात्‌ अस्मदादावनुपलब्धस्यापि 'तदतिशयस्य तत्र संभवत्रे मुक्त्यमावलक्षणो पप्पतिशयःकि स्यात्‌। कि अस्मदादी दृष्स्य घर्मस्य भगवंति सम्प्रसाधने तज्शानस्थेन्द्रि- यजनितत्वप्रसंग: स्थातृ-तथा हि-भगवतों ज्ञानमिन्द्रियज ज्ञानलात्‌ अस्मदांदेज्ञानवत्‌ श्रतों भगवत:केवठज्ञानलक्षणातीन्द्रियज्ञानास- भवात्‌ सर्वज्ञाय दत्तो जलांजलछि:। ज्ञानत्वाविशेषेष्षपि तज्ज्ञान- 'स्यातीन्द्रियले देहस्थितित्वा उत्रिशेषेजपि तदेहस्थितेरकषछाहारपूर्व कल के स्थात्‌ | वेदनीयसद्भावात्तस्य बुभुक्षोत्प्तेमीजनादी प्रदृत्तिरित्यु- प्तिरनुपपन्ना मोहनीयकमसद्दायस्थैब वेदनीयस्य बुभुक्षोत्पादने साम-

टीकानिख्कप छुकामिरलड इत श्श्‌

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थ्यात्‌। भोक्तुमिच्छा बुभुश्ना सा मोहनीयकर्मकार्यत्व,त्‌ कथ प्रक्षीण- मोहे मगवति स्यात्‌ ! अन्यथा रिरंसाया श्रपि तत्न प्रसंगात्‌ कम- नीयका भिन्‍्यादिसेवाप्रसक्तिरीश्रादेस्तस्याविशेषाद्ीतरागता स्थात्‌ तिपक्षमावन-वशाद्वागादीनां हान्यतिशयदर्शनात केचलिनि तत्पर- मप्रकर्षप्रसिद्धेतीतरागतासमत्रे मोजनाभावपरमप्रकर्षोडपि तत्र कि स्थात्‌ तद्भावनातो भोजनादाबपि हाम्यतिशयदशनाविशेषात्‌ तथा हि--एकश्मिन्‌ दिने योडनेकबारान्‌ भुक्ले, कढाचित्‌ बिप- क्षमावनावशात्‌ एव पुनरेकबारं भुक्ते | कश्चित्‌ पुनरेकदिना-

बन्तरितमोजन:, अन्य: पुनः पक्षमामसंवत्सराय न्तरितभोजन इति। फँ बुभुक्षापीडानिद्व त्तिमजनरसाखादनाउ्वत्रेत्‌ तदाखादन चास्य रसनेन्द्रियात केवलज्ञानादा : रसनेम्द्रियाश्नत्‌ मतिज्ञानप्रसंगात्‌ केवलज्ञानाभाव: स्यात्‌ ) केवलज्ञानाच्चेत्‌ कि भोजनेन ? दूरस्पस्यापि त्रैलोक्योदरवर्तिनो रसस्य परिस्फुर्ट तेनानुभवसंभवात्‌ कर्थ चास्म केवलज्ञानसंभवो भुजानस्य श्रणीतः पतितत्वेन प्रमत्तगुणस्थानवार्ति- ल्वात्‌ | अप्रमत्तो हि साधुराह्मरकथामप्रेणापि प्रमत्तो भबति नाह- न्मुश्लानो.-पपीति महत्चित्रम | अरतु तावज्ञ्ञानसंमत: तथः/्यसी केवल- ज्ञानेन पिशिताचशुद्धद॒ब्याणि पश्यन्‌ के भुजीत अन्तरायप्रसंगात्‌। गृहस्था अप्यल्पसत्त्वास्तानि पश्यन्तो उन्तगय कुबन्ति, कि पुनभगवा- ननन्तवीयंस्तन्न छुयात्‌ | तदकरणे था तस्य "तेभ्योदपि हीनस- सप्रसंगात्‌ छुत्पीडासंभवे चास्य कथमनन्तसौर्य॑ स्यात्‌ यतो इनन्त- चतुष्टयखामिता चस्य हि सान्तरायस्यानन्तता युक्ता ज्ञानवत्‌

बुभुछ्ता पीडेव भवतीह्यभिषाक्तयम “'ज्षुधासमा नास्ति शरी-

१२ . इखकरण्डश्रावकाचजार

रवेदना” इत्यभिधानात्‌ तदलमतिप्रसंगेन प्रमेषकमलमातैणडे नया यकुधुदचन्द्र प्रपंचत: प्ररूपणंत्‌ ' अन्च य! ---यस्य ज्षुत्पिपासाजरातंकजन्मान्तकमयस्मया: राग- देषमोहा; सन्ति सः आप्तः प्रकीत्वते | निरुक्तिः - छुच पिपासा जरा आतड्डुश्व जन्म अन्त- केशव भयश्वच स्मयश्थ इति छु त्पपासाजरातड्डूजन्मान्तकभयत्मया रागश्व द्ेषश्व मोदश्च इति रागद्ेषमोहा: || ६॥ अथ-ज़िसमें क्षुधा, प्यास, बुदापा,रोग, जन्म, मरण, मय, मद तथा राम द्वेष मिथ्यात्व चिता, अरति, निद्रा, विस्मय, विप/द ( मद ) स्वेद, खेद ये अठारद्द दोष नहीं होते वद आप कहां गया है। अर्थात ये अठारह दोष संसारी दृःखित प्राणियोंकेही होते हैं किन्तु सेज्ष परमा- त्माके नहीं रदते _ अथोक्तदोषैविंवर्जितस्थाप्तस्स वाचिकां नाममालां प्ररूपयन्नाह-- उस आप्तके विशेषण विशिष्ट नाम

परमेष्ठी परज्योति-तिरागो विमलः कृती

स्वज्ञोनादिमध्यान्तः, सावेंः शास्तोपलास्यते परमे इन्द्रादीनां बन्चे पदे तिष्ठतीति “परमेष्ठी! १३ निरावरखों परमातिशयप्राप्त ज्योतिज्ञौन यस्थासे पर॑ज्योति; | “विगायो? बिगतो

१-क्षघ्र बुभुक्गञायाम्‌ इति घोः किवप्‌। क्षोंघन जेक्तुमिच्छेति क्षुत्‌।

टीकानिरुक्रपशिकाशिरटझकतः १३

की > अली नना+ल+ज ०-5 मना बज अल जज जीजा ना

रागो मावकम्म यस्य | 'विमलो' विनष्टो मलो द्रब्यरूपो मूलोत्तरकर्म प्रकृतिप्रपंचो यस्य। “कृती' निःशेषहेयोपादेयतत्ते विवेकसम्पन्न; | पर्तज्ञो! यथावनिखिलाथसाक्षात्कारी | 'अनादिमध्यान्तः उक्त- स्रूपाप्तप्रवाहपेक्षया आदिमध्यान्तशस्यः | 'सावे३ इहपरलोकोप- कारकमार्गप्रदश कत्वेन सर्वेभ्यो हित:। “शास्ता' पूवापरविरोधादि- दोषपरिहारेशाखिलाथोनां यथावत्स्वरूपोपदेशक:ः एते: शब्देरुक्त- र्रूप आप्त “उपलाह्यत! प्रतिपाथते ७॥

अन्वयः--परमेष्ठी, पर ज्योति: विराग: विमलः कृती सर्वज्ञ अनादिमध्यान्त) साव; शास्ता इति गणपरै; उपलाल्यते॥

निरुक्ति:--परमे आहंन्त्ये पदे तिष्टति इति पर॑मेष्ठी पर

ज्योति; यस्मिन्‌ यस्य वा स; परंज्योति; (केवलज्ञ नी) विगतो रागो यस्य स॥ विराग: विगतो मल: पार्प यस्य यस्माद्वा विमल३। झूते कृत्य येन कृती सववान्‌ दृब्यगुशपयोयान्‌ जानाति स; सर्वज्ञे३। अनादिश्च मध्यश्च अन्तश्च शति अनादिमध्यान्त: | संवभ्यः शितः इति साबे। | शास्ति जनान्‌ इत्येबं शील: असौ शास्ता

. १-परमे वाचि ष्टा गतिनिव॒ृत्ती थोः इन्‌ “ईपाएद्धलः/) छाश१५०१ इति सप्तम्या अनुप्‌ ( अछुक ) “सुपमादिषचु” ५।४७७ इति

मूर्णन्ययकारादेशः २-“इष्टादेः” ४।१३६ इति इन्‌ ३-आतः

के हावोमः २२३! अनेन सर्व इति कर्समकारकपूर्जणकात्‌ क्षा

अवबोधने इति धोः कः त्यः] ४-सर्वाण्णो' वा श०४१७ इति- द्वितेषर्थें णख्त्य। ५-शास्‌ अनुशिष्टी इति घोः “शोल्चर्मसाधौ”

तन २।२१२७ इति तृन्‌ त्यः ।-

१४ रलकर एड्श्राबकाचारः

अथ -परमपद जो अरहन्तपद उसमें तिष्ठ-विद्य मान रहै सो परमेष्ठी उत्कृष्ट हे केवल ज्ञानरूपज्योति जिसमें सो परमज्योतिः नष्ट हो गया है र/गद्वेषरूप विभाव जिस के सो पिराग ३। दूर हो गये हैं मोहनीयादि पाप कमे जिससे सो विमल। करलीने हैं समस्त करने योग्य काम जिसने सो कृती ५। समस्त गुणपयायोंको जाने सो सर्वज्ञ ६॥ जिसका आदि मध्य ओर अन्त नहीं सो अनादि मध्यान्त | जो सबको हितकारी हो सो साव जो जीवमात्रकों हितकारी शिक्षा देने सो शास्ता | इत्यादि नाम उस आपके कहे हैं | ७॥

सम्यग्दशन विषयभूताप्स्वरूपममित्रायेदानीं तद्विषयभूता- गमस्वरूप मभिषघातु माह; --

ऐसे ह्वी आप्तका कहा हुआ आगम सम्यग्दशनका विषयभूत है ऐसा बतते हैं [ चर री हे अनात्माथ विना रागेंः,शा सता शाघ्ति सतो हिंतम्‌ घ्वनन्‌ शिव्पिकरस्पश।,-न्मुरजः किमपेक्षते ॥८॥ शास्ता' आप: 'शास्ति! शिक्षयति कान्‌ ? “सत| अवबि-

पर्येस्तादिलिन समीचीनान्‌ भव्यान्‌। कि शास्ति ? “द्वितं! खर्गादि- तत्साधन॑ सम्यग्दशनादिकम्‌ | किसात्मन: किचित फ्षममिलष- जलखी शास्तीलाह-“अनात्माथा बियते आत्मनोठथ; प्रयोजन यस्मिन्‌ शासनकर्मेशि परोपकाराथमेकासी तानू शास्ति। “परोप-

टोकानिरुंक्पजिकामिरलडकत: १५

जज जज+ भा

काशाय सलां हि चेष्टितेम!” इत्यमिधानात | तथा शास्तीजेततु कुतोवगतमित्याह “बिना राग” यतो छाभपूज|ख्यात्यभिकाषलक्षण- परे रागर्विना शास्ति ततो एनात्मा्थ शास्तीत्यवसीयते | अस्यैवाथस्य- समथनाथमाह--- ध्वनन्नित्यादि शिल्पिकर स्पशाद्वादक करामिघाता- न्मुर्जो मदलो ध्वनन्‌ किमात्माथ किंचिदपेक्षते ? नेवापेक्षते | अय- मथे;-यथा मुरज) परोपकाराथमेव विचित्रान्‌ शब्दान्‌ करोति तथा- सबन्नः शात्रप्रशयनमिति || | अन्वय;-शास्ता अनात्मारथ रोगै; बिना सतः हित॑ शास्ति |. शिल्पिकरस्पंशात्‌ ध्वनन्‌ मुरज: किम्‌ अपेक्षते ? अपितु नापेक्षते ॥८॥ निरुक्ति:-- अत्मने इति आत्माथम्‌ आत्माथे इति अना- स्मायम्‌ शिल्पिन: करी शिल्पिकरी शिल्पिकराम्यां स्परशः इति शिल्पिकरस्पशं; तस्मात्‌ शिल्पिकररपशौत्‌ अथ-आप्त अपने विना प्रयोजन तथा रागके बिना ही: सत्पुरुषोंकी ( मव्यजीवोंकों ) हितकारी शिक्षा देता है क्या मृदंग बजानेवालेके दाथकी ताड़नासे बजता हुआ मृदंग कुछ चाहता है? वा कुछ राग करता है ? कुछ भी: नहीं कीच्श तच्छाख्न यत्तेन प्रणीतमित्याह;-- झआगमका लक्षण

आपोपज्ञगनुल्ल्रूय,मदशेष्टविरोधकम्‌

१-'विनातिश्म:' १४४८ इति षष्ठ्याः स्थाने तृतोया २-शास अनुशिष्टी इति द्विकशंकधों रूपम्‌ |

१६ रखकरण्डक्रावकाचारः

ततोपदेशक्रत्‌ साव, शास्त्र कापथघट्टनम्‌ ॥९॥ “' “आप्तोपज्ञ) सर्वज्ञस्य प्रथमोक्ति:। अनुल्लध्य यस्मात्तदाप्तोपन्न ततस्मादिन्द्रादीनामनुल्लंध्यमांदियं कस्मात्‌ ? तदुपज्ञत्वेन तेषामनुल्लध्यं य्तः “अद्दष्टेशविरोधरक! दृष्टं प्रत्यक्षे, इष्टमनुमानादि, वियते इष्टेष्टाम्यां विरोधो यस्य | तथाविधमपि कुतस्तत्सिद्धमित्याह-“ततक्त्योप- देशकृत” यतस्तत्तस्य सप्तविधस्य जीवादिवस्तुनो यथावत्स्थितखरू- पस्य वा उपदेशक्षत्‌ यथावत्मतिदेशक ततो इष्टेणशविरोधकप्‌ | एवं विघमपि कस्मादवगत ? यत$ 'साव” सर्वेभ्यों हित साबमुच्यते तत्क्थ॑ अथावत्तत्खरूपप्ररूपणमन्तरेश घटेत एतदष्यस्य कुतो निश्चित- मित्याह-“कापथघट्टन! यतः कापथस्य कुत्सितमार्मस्य मिथ्यादशेना- देधइन निराकारक॑! सर्वज्ञप्रणीतं शात्र ततस्तत्सावमिति अन्वय; -अप्तोपज्ञप्त अनुल्लध्यम्‌ , अद्ष्टेटविरोधकम्‌ तत्तो- पदेशकृत्‌ साबे कापथघदने शाख्त्र भत्रति। ' निरुक्ति:-आप्तस्य उपज्ञमिति आप्तोपज्ञम। अन्य उल्लड्घयितु योग्य तत्‌ अनुह्ल्ध्यम्‌ | दृष्टा: इष्टे विरोध यस्य तत्‌ अदच्ष्टेटविरोधकर्म ! तत्त्वानाम् उपदेश: इति तत्तोपदेशः

_. >> आप कि >+ट+८ ले

१-विरुन्धन्ति प्रतिबध्नन्तोति विशेधकाः “ण्बुतृच्च”२।१।१२६ इति ण्युः | इष्टरुय विरेधका इति इष्टविशेव्रका. दृष्टा प्रत्यक्षीभूता इश्विरोधका यरूप तत्‌ तथा, अथवा द्वव्ानि इश्विशेधकानि चाक्‍्यानि सूत्राणि यस्मिन्‌ तत्‌। अथवा सन्ति दृए्ख्य प्रत्य- क्षसिद्धस्य इष्टस्य ख्वमान्यस्य विशेधकानि वाक्यानि यश्मिन तत्‌ इद रल्काण्डक्रावकाचारश।स्त्माप्तोपश' भवति

टोकानिशक्पशिकामिरल्ल्छकत १७

बल्ब कली ऑल षिलबल चल लव कल टन. अचल टीऑिलअलन्‍लीडी का त्ज्जिििजििि जल चीज जी न्‍ "

तसबोपदेश कृतवत्‌ इति तत्त्तोपदेशकृत्‌ (क्बिप्‌ प्रत्यय;) सर्वेम्यो द्वितम्‌ इति सावेम्‌ | कुत्सित३ पन्था इति क्रापथ) कापथों घस्यतेडनेन इति कापथघधनम)।

अथ-जिसको प्रथम आपने कद्दा हो, जो दूसरोंसे खंडित नहीं किया जा सके, नहीं है तत्त्वोंमें विरोध जिसके

स>+कनननन-न-न नाम.

इति पक्षः अजुल्लंध्यत्वादिति हेतु: यदु यदजुललकुध्यं भवति तत्तदाप्तोपश्) भवति यथा मोक्षशास्त्रम; तथेचर रसत्कर- पड्थ्रावकाचारः, अनुब्लडनध्यः। तस्मात्‌ आधोपल्चः एव | यच्चा- सुल्लडःप्य भवति ( उछलंघ्यां भवति ) तदाप्तोपश्च' हि भवति यथोन्मत्तवचनम्‌। अत्र श्रावकाचारे अनुदलडम्ध्यख्य निषेधा बर्त॑ते तस्मांदाप्तोपज्ञत्वस्यापि निषेध चर्तते। इदे रलक- रण्डभ्रावकाचारशास्त्र दि अनुल्ठझूष्यं भवति अद्ृष्टे शविशेध- कत्वात्‌। यद यददृुष्टेष्टविरोधक' भवति तत्तदनुल॒डः ध्यं भवति यथा महापुराणम्‌ | यच्यासुरूक घ्यत्वं भवति तच्चादृष्टेष्टवि- शेधकत्वमपि भवति। यथा रथ्यापुरुववचनम्‌ | अय' भ्रावका- आरः अद्गष्टेष्टाचिरो घकत्वात्‌ तत्वोपदेशरूच्वात्‌ इत्यादि | अय' हि तस्वोपदेशइ.त्‌ साञंत्वात्‌ इत्यादि | अर हि सार्च+-कापथ- घटनत्वात्‌ इत्यादि अलुमानप्रयोगाः शोषाः पाठकेनिये- ज्नोया

१-“का पथ्यक्षे” ४३२७१ इति कु शब्दरुय का आदेशः “ऋकपूरप्प थो5त्‌” ४२६० इति सान्‍्तः अत्यः | कापथपूर्वक अआइ धोः “करणाघारे चानद्‌” शश११२ इति अनट रयः | ््‌

श्८ रखकरणइश्रावकाचार:

जी पं अहम की शी 3 अल अजित ििजि-खण जज ++ ४७०० “+४+ँ++ >>

तथा तस्‍्तवोंका उपदेश करनेवाला हों, सर्व भब्यंज्ीवोंका द्वितकारी हो ओर खोटेमागेको दूर करनेवाला दो वही जशाख दे अथेदानों श्रद्धानमोचरस्य तपोभू व: स्वरूप प्ररूपयन्नाह-- गुरुका लक्षण विषयाशावशातीतो, निरारम्भो5परिगूहः ज्ञानध्यानतपोरल स्तपस््री प्रशस्यते १०

विषेषु खग्वनितादिष्वाशा आकाडक्षा तस्या बशमघीनता | तद- तीतो विषयाकाइम््ारद्ितः | “निरारम्भ:” परिचक्तकृष्यादिव्यापार: | “अपरिग्रहो' बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहरद्तित: 'शानध्यानतपोरत्न३! ज्ञान- ध्यानतपांस्थेब रत्नानि यस्य एतदूगुणविशिष्टो य/ तपस्वी गुरु: प्रशस्यते! छाध्यते १० अन्वयः-सः: तपर्वी ग्रशस्यते, सः कः ? य; विषयाशावशातीत: निरारम्भ$ अपरिग्रह; ज्ञानध्यानतपोरत्नं: ॥१०॥ निरुक्तिः-विषयानाम्‌ आशा विषयाशा | विषयाशाया बढ़ा: विषयाशाबशः तेन ( विषयाशावशेन ) श्रतीतः इति विषयाशाब- शातीत: निर्गतः आरम्मो यस्मात्‌ निरासम्भ: | नास्ति परिग्रहो .._१-तपांसि विदुयन्ते यख्य तपर्वी “मायामयामेथास्त्रकः तपोष्सो बिन”४।१॥७३ इति विन्‌। “मत्वर्थों स्तो"१।२१२३ इति

भ-संशात्वात्‌--“नपुवाध्य आसम्‌” १॥२।१०७ इति पदसंक्षाया बाधितत्याहु रिव्वादयो भचन्ति |

टीकानिर्कंव्जिकामिरलइनकत हद

» अल लीडफिना | नल लि ननली जल चलता + +ज+

पस्थ इति अपरिग्रह: | ज्ञान व्यानंच तपथ् हति ज्ञानध्यांन- तपांप्ति। तानि रत्नानि यस्य स“ज्ञानप्यानतपोरत्षः” रक्त: इति : पाठे तु ज्ञानध्यानतपस्पु रक्त: इति ज्ञानध्यानतपोरक्ताः

अथ- वे शुरु प्रशसनीय हैं, कोनसे ? जो विषयोंझी आशाओंसे रहित हैं, आरंभरद्दवित हैं और ज्ञान ध्यान तथा तपमें लव॒लीन हैं। अथवा ज्ञानध्यान और तप हैं रत्न जिनके | अर्थात्‌ उनके पास ये रत्न विद्यमान हैं। किन्तु अन्य परिग्रह नहीं है ॥१०॥

इृदानीमुक्तलक्षणदेवागमगुरुविषयस्य सम्यग्दशनस्य निःशेकितत्वगुणस्वरूप १्रूपयन्नाह--

निरशक्लित अज्ञका, लक्षण कहते हैं इृदमेवेटशमेव, तत नान्यन्न चान्यथा। इत्यकम्पायसाम्मोवत्‌,सन्मागेंसेशया रुचि।११॥

'रुचि/ सम्यग्दशन “असंशया” निःशकितत्वधर्मोपेता कं विशिश् सती £ “अकम्पा? निश्चला | किंवत्‌ ! “आयसाम्भोवतू! अयसि भवमायस तच तदम्भश्व पानीर्य॑तदिव तद्बत्‌ खड़गादियत- _पानीयवदित्य4) सा5कम्पे्याह-'सन्मार्गे! संध्षारक्षम॒द्रोत्तरस्तार्थ सद्विमुग्यते अन्वेष्यत इति सन्मागेः आप्तागमगुरुअ्रवाहस्तस्सिन्‌ | केनोहलेखेनेत्याह-'हदमेवेत्यादि! इदमेवाप्तागमतपस्बिरक्षणं तत्त्तम्‌ | “इंद्शमेव” उक्तप्रकारेशब छक्षणेन छक्षित “नान्‍्यत्‌” एतस्माद्विल

२० रखफरण्डआावकफाचारः

8 जम कलम अमन न्नकिजिजिज अल कीजत न,

न) चान्यथा! उत्ततल्लक्षशादन्यथा परपरिकल्पितलक्षणेन खलक्षितम्‌, “न च! नेव तद्ूधटते इत्येवमुल्लेखेन ११

अन्वयः-तत्त्तम्‌ शदम्‌ एव, अन्यत्‌ | तत्त्वप्‌ इंदशम्‌ एव, अन्य- थान इति सन्प्ार्ग आयसाम्भीत॒त्‌ अकम्पा सा असंशया रुचि; भबति |

निरुक्तिः-तस्य भावः तस्तम्‌, श्रन्येन प्रकारेण इति अन्यया नास्ति कम्पो यस्यां सा अकम्पा,-अयस;$ विकार: इति श्रायलः आय- सेस्प अम्म इति आयसाम्म: | आयसाम्म: इंच इति आयसाम्भो- बतू। संश्चासो मार्ग: सन्मारग; तस्मिन्‌ सन्‍मार्गे नास्ति संशयों बसस्‍्यां सा असंशया ११

अथे-तत्त (हितरूप ) ये आप्त, आगम, तपस्वी ही हैं ओर नहीं हैं | ये आप्त आगम और तपर्वी इसही

१-तेषाम आप्तागमतपोभ्तां भावः खरूप इति तसर्वम। *भावे स्वतल” ३॥४।१३६ इति त्व त्यः | २-प्रकारे था ४।१।१३१ इति था त्यः। ३- हिमादिश्योपओ "३॥३।१२७ इति विकारे अच्त्यः ४-आयसाम्मसः इवेति आयसाम्भोवत्‌ '“तस्य” ३॥७४१३५ इति बस्‌। अथवा “रुप इचे" ३॥४१३३ इति चत्‌। अल रत्ककरण्ड- आरवकाचारे उपासकांप्ययने शास्ले तस्वपदेन आप्तागमत- पस्विनामेत्र श्रहणम्‌ इति सर्वांदन्तगंत इदम्‌ पदेन अंगुल्यां निर्देशेन शायते नात्र जीवादीनां तच्तवयाना प्रहणम | तेषां स्वरूपोपलक्षणं तदेव यच्च उपरितनकारिकासु स्वामिमि- चक्त सवयम।

« -++ चजतीव-क०--__-+-जिननननन-मीतत-++++जज>-+लन मत वी आजम जप अल जम

टीकानिरुक्पजिकामिरलकशत मे श्ह्‌

नमकीन नाक ५० ५० करन अटात २८ > ५० आल बलकजीडली मल जज अनिल न्‍न्‍ नल जल *ट बट न्‍न्‍ ५४+++>3ल जट *+२ >> अल जज+ज ५+०५७०५-+->--

स्वरूपवाले ( लक्षणत्राले ) हैं अन्य प्रकारके नहीं हैं। इस प्रकार सन्मारगमें तलवारके पानीके समान निष्कंप ( निश्वल ) होना सो असंशया रुचि है॥ ११॥ हृदानी निष्काइक्षितत्वगुणं सम्यग्दशने दर्शयज्माह -- अनाकांचषण अगका लक्षण कर्मपरवर्ण सान्ते, दुःखेरन्तरितोदये पापबी जे सुखे5नास्था, श्रद्धाउनाकाइश्षणा स्मृता “अनाकाइक्षणा स्मृता? निष्काइक्षितत्वं निश्चितम्‌ कासौं '्रद्वा' | कथभूता ? “अनास्था? वियते आस्था शाश्वतबुद्धिये- स्थाम्‌। आस्था अनास्था तस्यां तया वा श्रद्धा अनास्था श्रद्धा सा चाप्यनाकाड्क्षणेति स्मृता। क्त्र अनास्था5रुचिः “घुखे! वैष- यिके | कर्थभूते ? “कमपरवशे” कमोयत्ते। तथा 'सान्‍्ते अन्तेन विनशिन सह वततमाने | तथा “दुखरन्‍्तरितोदये ? दुखमोनसशारी रै- रन्‍्तरित उदय; श्रादुर्भावो यस्य तथा 'पापबीजे! पापोत्पत्तिकारणे। १२॥ अन्वयः:-छुखे अनास्था इति श्रद्धा अनाकाइक्षेणा स्मृता | कथंभूते छुखे ? कमंपरवशे, पुनः ? सान्‍्ते पुनरपि दुखैरन्तरि- तोदये | पुनरधि पापवीजे निरुक्ति।-न आस्था अनास्था कर्मणां परवश इति कमपर- १-नाख्ति काहुक्षणा बांछा यस्या रुच्या सा अनाकाइक्षणा रुचि: सासारिकसु्खेब बाञ्छा करेतीत्यथोः

२-आडम्पर्गक ष्ठा गतिनिवृत्ती घोश "गाबातः” २३१०३ इस्यनेन अडः | आस्थोयते निश्चोयते सा आस्था अद्धा

ब्त्र रखकरण्डश्रावकायार

अर फिनान-- _-_ः..-.-.-- ऑऑ०ऑंंऑं जज +5 -+-- - --++- - बंप

बद्; तस्मिन्‌ कमपरवशे अन्तेन सद्दित सान्‍्ते तस्मिन्‌ सान्‍्ते | अन्त रिति: उदयो यस्थ तत्‌ अन्तरितोदयम्‌ | तस्मिन्‌ श्रन्तरितोदये 4 चापस्व वीज पापबीज तस्मिन्‌ पापवीजे

अर्थ-सांसारिक सुखोंमें “स्थिरता नहीं है” एसी श्रद्धा करना सो अनाछांक्षणा रुचि है, सो सांसारिक सुख कैसा है! कमोंके अधीन है तथा नाशवन्त है ओर दुखरूप फलका है उदय ( दुखोंकरि मिला हुवा है फल ) जिसमें पापका बीज दे ( पापबन्धका कारण है )।॥| १२॥

सम्प्रति निर्विचिकित्सागुणं सम्यर्दशनस्य प्ररूपयज्नाह- - निविचिकित्सा अगका लक्षण | स्रभावतो5शुबो काये. रत्नत्रयपवित्रिते 5 श्‌ः (४: के हि

निजुशुप्सा शुणप्रीति-मत।, नि|विचिकित्मिता। १३

“निर्विचिकित्सिता मता अभ्युपगता। कासी : “निर्ज॑गुप्सा! विचिकित्सामात्र; | ? काये। ।कविशिष्टे ? 'खभावतोडशुचो' स्वरूपे णापवित्रिते | इत्य भूतेडपि काये 'रक्नत्रयपवित्रिते! रन्नत्रयेण पवित्रिते पूज्यतां नीते कुतस्तथाभूते निजुगुप्सा भवतीत्याह-“गुण- ग्रीति:” यतो गुणेन रक्नत्रयाघारमूतमुक्तिसाधकत्वकक्षणेन प्रीतिमनु- ध्यशरीरमेवेद॑ मोक्षसाधर्क नान्यदेबादिशरीरमित्यनुराग/ | ततस्तत्र निजुगुप्सेति १३

अन्वयः-त्रतिनां काये निजनगुप्सा गुणभश्रीतिः निर्वेचिकि-

टोकानिरुक्तपशिक्ञाभिरलक्‍कछतः श्दे

.............>>ल>--+ज+ 3 तन 5 नजनतनजल |

असफल जज जम

त्सिता मता कर्थ भते काये स्रमेवतः अशुचो पुनः रक्त्रयप- विदिते॥ १३ निरुक्तिः-निभता जुगुंप्सा यस्या: सा निजुग्रुप्सा गुणेष॒ प्रीतिः गुणग्रीतिः | निर्गता विचिकित्सिता यस्‍्या:सा निर्विचिकित्सिता जअयो अवयबा: यस्य तत्‌ त्रयम। रम्नानां न्रयम्‌ रह्त्रयम | रतत्रयेरा पबित्रितेंः इति रज्नत्रयपवित्रितः तस्मिन्‌ सह्नत्रयपवित्रिते १३ अथ-जअतियोंके शरीरमें ग्लानि नहीं करना किन्तु उनके चारिब्रादिगुणोंमें प्रीति करना सो नि्विचिकि- व्सिता रुचि जानना केसा है उनका शरीर ? खमावसे तो मलिन है किन्तु रन्नत्रदसे पवित्र है १३॥

१-स्वभावेनेति स्वभावतः। 'आाद्यादि+यख्तसिः डारा६० ससे:' ४१११४ इत्याम्यां तस २-शुप्‌ थो: “किद्गुपतिजः सन्‌ भिषज्यादिनिन्दाक्षमे” २११४ इति निन्दायां सन्‌ द्वित्वादि- कार्या पुनः “स्वात्‌” २३६६ अनेन अत्पः स्तोलिड्र टाप्‌ च। हुगप्सा निन्‍दा ग्लानिरिति बावत'। निर्गता नष्टा जगप्सा यख्या। यसरथां था निज्ञ कंप्सा। ३-कित रेगापनयने धोः भिषज्यायां सन्‌ तते भते काले “तः! २२१०० इति क्तत्यः, इट च। विगत चिकित्सितमिति विचलि कित्सितं | निर्गत लि कत्सखितं यख्या रुखेः सा निश्विलिकित्सिता चिकित्साया निषेध्रस्य निषेधो यत्र पताहुशो रुचिरित्यथोः। छ-पयन्ते >दोबा जायन्ते प्राणिनः अनेन इति पचित्रः “इचः इबो देवते” २९१७२ इति इच्च त्यः पत्रित्ः अहंन सः जातः मनसि आत्मनि या श्रख्य पत्रित्रितः।

श्छ ' रखकरण्शआावकानलार:

अ+->>+>+८+++++००+-+ नं ++ - ५० “-+-+ - - “४ ++++८ ल्जजज+न +०ा

अघुना सइर्शनस्पामूददश्त्वगुणं प्रकाक्षयन्नाइ - अमूठदप्टि अगका लक्षण कापये पथि दुःखानां, कापथस्थे5प्यप्तम्मतिः |

असंपृक्ति रनुत्कीति-रमूहा दृष्टि रुच्यते १४॥

अमूढा दृष्टिरमूढत्वगुणाविशिर्ट सम्यग्दशन का ? 'अस- म्मतिः! विद्यते मनसा सम्मति: श्रेय/ साधनतया सम्मनन यत्र दृष्ठो ? 'कापथे” कुत्सितमार्गे मिथ्यादरीनादी कर्यभृते ? 'पथि' मार्ग केषां ? 'दुःखानां” केवल तत्रैवासम्मतिरपि तु 'कापथ थेडपि' मिथ्यादशनादाधारेडपि जीवे। तथा “श्रसंपृक्ति:” विद्वते सम्पृक्ति: कायेन नखच्छीटिकादिना अड्गुलिचालनेन शिरोघूननेन वा प्रशंसा यत्र अनुत्कीर्ति! विद्यते उत्कीर्तिरुत्कीतन बाचा संस्तवने यत्र मनोवाकायैर्मिथ्यादशनादीनां तद्वतां चाप्रशंसाकरणममूटूं सम्यग्दशनमित्यथ; १४ ॥।

अन्वय;-कापथे अपि कापथस्थे असंमति; असंप्रक्ति! अनु-

जे अजब

१-खं पूर्वक मनु अबवोधने सं पूर्येक पृत्रोडः संपर्चाने, उत्पू- ्ॉंक छृत आख्याने एस्यः“स्त्रियां क्तिः?२३८७ अनेन क्तिः | “हन्म- न्‍्यम्‌ रम्‌ नर्स गम बनतितनादेड्लख कलि” |४७४३६ इति डुख्य मफारख्य खम्‌। “वो: कु” ५३६८ इति चकारख्य ककारादेशः थृति जूति स्तानि हेति कोर्लिः ।” २३६२ इति ईरादेशः तस्य खम्‌ | सम्मतिः सम्पृक्तिः उत्कीतिं: इति पदानि सिद्धानि।

टीकानिरुक्तपेजिकामिसलेड-कत रुप

न्न्न लिन अत

त्कीतिं! सा गणघरे) अमृढ़ा दृष्टि; उच्चते। कथभते कापथे, कर्षभते कापथस्थे :