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स्वगवासी साधुचरित श्रीमान डालचन्दजी सिंघी

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सिंघी जेन ग्रन्थमाला

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महोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिरचिता

जेन तक भाषा

सिंघी जैन ग्रन्थमाला

जैन भागमिक, दाशनिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, कथाध्मक - इस्यादि विविधविषयगुम्फित प्राकृत, संस्कृत, अपन्रंश, प्राचीनगूजेर, राजस्थानी भादि भाषानिबद्ध बहु उपयुक्त पुरातनवाद्यय तथा नवीन संशोधनाष्मक साहित्यप्रकाशिनी जैन ग्रन्थावलि

कलकत्तानिवासी स्वग॑त््थ श्रीमद्‌ डालचन्दर्जी सिंधी की पृष्यस्मृतिनिमित्त तत्मुपत्र श्रीमान्‌ बहादुरसिंहजी सिंघी एक संस्थापित तथा प्रकाशित -9%9 600-

सम्पादक तथा सल्लालक

जिनविजय मुनि

[ सस्मान्य समभातद-भाण्डारकर प्राच्यविद्या संशोधन मन्दिर पूना, तथा गूजरात साहित्य- सभा अहमदाबाद; भूतपृवाचार्य-गूजरात पुरातत्तमान्दर अहमदाबाद; जेब वाइमयाध्यापक विश्वभारती, शान्तिनिकेतन; संस्कृत, प्राकृत, पाली, प्राचीनगुर्ज' आदि अनेकानेक ग्रंथ सेशाघक-सम्पादक ( ]

गन्थांक

प्राप्रिस्थान # #. ७७. कस व्यवस्थापक -[सघा जन ग्रन्थमाला अनेकान्त विहार सिंघीसदन ९, शान्तिनगर; पोष्ठ-सावरमती (४ #ह ! ४८, गरियाहाटरोड; पो० बालीगंज अहमदाबाद कलकत्ता

हथापनाध्द ] सर्वाधिकार संरक्षित [ वि० सं५ १९८६

महोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिरचिता

जैन तके भाषा

[ तात्पयसंग्रहाख्यवृत्तिसहिता ] 4-८: ८००-कपा्ु 7 (०८-पपी८--ुसर्म्न्‍पटी

सम्पादक पण्डित सुखलालजी संघवा

जैनदर्शनाध्यापक-हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस [8] ध्य कप (का र्‌ [ भ्रतपूव-दशनशाखाध्यापक-गूजरात पुरातत्तमान्द्‌ र-अहमदाबाद ]

है आइए बा आधा तथा पण्डित महेन्द्रकुमार न्‍्यायशास्त्री पण्डित दलसुख मालवणिया भ्यायतीथ, जेनदशनाध्यापक-स्थाद्वादविद्यालय नया यती थे, बनारस बत्तारस ०-८०. है" नै>००००कीव०त००- 6 प्रकाशन कंतो + 5 + छा. ग्रन सचालक -सधा जन अन्यमाला अहमदाबाद-कलकस्ता

विक्रमाब्द १९९४ |] प्रथमाइत्ति, एकसहस्र प्रति [ ९३५८ क्रिध्ाध्यु

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अस्ति बन्नाभिधे देशे सुप्रसिद्धा मनोरमा मुर्शिदाबाद इत्याख्या पुरी वैभवशालिनी निवसन्त्यनेके तत्र जैना ऊकेशवंशजाः | धनाव्या नृपसहशा धर्मकर्मपरायणाः श्रीडालचन्द इत्यासीत्‌ तेष्वेको बहुमाग्यवान्‌ साधुवत्‌ सच्चरित्रों यः सिंचीकुप्रभाकर: बाल्य एवागतो यो हि कतु व्यापारविस्तृतिम्‌ कलिकातामहापुर्या ध्वृतधममार्थनिश्चयः कुशाग्रया स्वबुद्धयेव सद्धत्त्या सुनिष्ठया उपाज्य बिपुरां रुक्ष्मी जातो कोख्यधिपो हि सः तस्य मन्नुकुमारीति सन्नारीकुलमण्डना पतित्रता प्रिया जाता शीलसौभाग्यभूषणा श्रीबहादुर सिंहारूय: सद्गुणी सुपृत्रस्तयो: अस्त्येष सुकृती दानी धर्मग्रियो धियां निधि: प्राप्ता पुण्यवताउनेन प्रिया तिलकसुन्दरी यस्याः सौभाग्यदीपेन प्रदी्त यद्व॒ह्ह्णम्‌ ॥| श्रीमान्‌ राजेन्द्रसिंहो5स्ति ज्येष्ठपुत्र: सुशिक्षितः यः सर्वकारयदक्षत्वात्‌ बाहुयसय हि दक्षिण: नरेन्द्रसिंह इत्याख्यस्तेजस्वी मध्यमः सुतः सूनुर्वीरिन्द्रसिंहश्थ कनिष्ठः सौम्यद्शनः सन्ति त्रयोडपि सत्पुत्रा आप्रमक्तिपरायणा: विनीताः सरला भव्याः पितुर्मागीनुगामिनः अन्येडपि बहवश्चास्य सन्ति स्वस्ादिबान्धवा: धनेजने: समृद्धोडय ततो राजेब राजते अन्यच- सरस्वत्यां सदासक्तो भूत्वा लक्ष्मीप्रियोडप्ययम्‌ तत्राप्येष सदाचारी तब्चित्र विदुषां खड़ गर्बों नाप्यहंकारो विलसो दुष्क्ृति: दृश्यतेडस्थ गृहे कापि सतां तद्‌ विस्मयास्पदम्‌॥ भक्तों गुरुजनानां यो विनीतः सज्जनान्‌ प्रति बन्धुजनेडनुरक्तोडस्ति प्रीतः पोष्यगणप्वपि॥ देश-कालस्थितिज्ञोडय विद्या-विज्ञानपूजकः | इतिहासादिसाहित्य-संस्क्ृति-सत्कलाप्रियः समुन्नत्ये समाजत्य धम्मस्योत्कषहेतवे प्रचारा4थ सुशिक्षाया व्ययत्येष धन घनम्‌ || गत्वा सभा-समित्यादो भूत्वाउध्यक्षपदाद्वितः दत्त्वा दाने यथायोग्यं प्रोत्साहयति करमठान्‌ एवं धनेन देहेन ज्ञानेन शुभनिष्ठया | करोत्यय यथाशक्ति सत्कर्माणि सदाशयः ॥| अथान्यदा प्रसञ्ञैन स्वपितु: स्मृतिदेतवे कतु किश्विदू विशिष्ट यः कार्य मनस्यचिन्तयत्‌ || पूज्य; पिता संदेवासीत्‌ सम्यग्‌-ज्ञानर॒चिः परम्‌ तस्मात्तज्ज्ञानवृद्धयथ यतनीये मया वरम्‌ विचार्यव स्वयं चित्ते पुनः प्राप्य सुसम्मतिम्‌ श्रद्धास्पदस्वमित्राणां विदुषां चापि ताहशाम्‌ जैनज्ञानप्रसाराथ स्थाने शान्तिनिकेतने सिंघीपदाक्लितं जैनज्ञानपीठमतीहिपत श्रीजिनविजयो विज्ञो तस्याधिष्ठातृसत्पदम्‌ स्वीकतु प्रार्थितोडनेन जास्रोद्धारामिलाषिणा अस्य सौजन्य-सौहार्द-स्थैयोदार्यादिसद्वुगेः | वशीभूयाति मुद्रा येन स्वीकृत तत्पदं वरम्‌ तस्थेव प्रेरणां प्राप्प श्रीसिंघीकुलकेतुना स्वपितृश्रेयसे चेषा अन्थमाझा प्रकाश्यते || विद्वजनकृताह्मदा सशिदानन्ददा सदा चिरं नन्दत्वियं छोके जिनविजयभारती ॥|

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भूयांसि ग्रन्थरत्ञानि संस्कृय पृण्यसअयात्‌ साथकाख्यतया ख्यातः श्रीपुण्यविजयो मुनिः वृद्धतरस्य वृद्धस्थ कान्तेश्वल चतुरस्य विजयान्तस्थ सेवासु मुदितिस्थिरमानसः कार्या्थिभ्यः समस्तेभ्यः शास्त्रसंस्कारकर्मसु साहाय्यं ददते तस्मे कृतिरेषा समर्प्यते॥

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संकेतानां खूची क्षनु० टी०--भलुयोगहारसूत्रटीका ( देवचन्द छालभाई, सूरत ) अनुयो० सू०--अनुयोगद्वारसूत्रम्‌ ५» »# 2 आचा०--आाचाराह्नसृत्रम्‌ ( आगमोद्यसमिति, सूरत ) | आब० नि०--भावश्यइनियुक्तिः ( भागमोदयसमिति, सूरत ) तसवारथभा ०--तत्त्वार्थभाष्यम्‌ ( देवचन्द लालभाई, सूरत ) तरवार्थभा ध्रृू०--तस््वाथभाष्यशृत्तिः सिद्लेनगणिकृता ( ,, ) | तसवाधरा

बा | तत्तार्थशाजवात्तिइम्‌ ( सनातन जैनगअन्थमाला, काशी )। राजवा०

तस्वार्थकोफव[०--तच्ार्थछोकवार्सिकम्‌ ( गांधी नाथारंग जैनप्रम्थमाला, मुंबई ) | नयोपदेश: ( भावनगर ) |

न्‍्यायकु०--म्यायकुछुमा श्षलिः ( चौखस्बा संस्कृत सिरीक्ष, काशी )

न्‍्यायदी ०-- न्‍्यायदीपिका ( जैनभिद्धान्तप्रकाशिनी संस्था, कछकत्ता ) स्यायवि० टी -न्‍्यायविन्वुटीफा ( बिब्लीओयेका बुद्धिका )

प्रत्यक्ष ०--प्रध्यक्ष चिन्तामणिः ( कछकत्ता )

प्र, न,“>प्रमाणनयतत््वालोकः ( विजयधमंसूरि अन्थमाला, उम्मेन ) प्रमाणवा ०--प्रमाणवासिकम ( अमुद्वितसम--भोराहुरूस कृत्यायनसत्कम्‌ ) प्र० मी०--प्रमाणमीमाँसा ( आइतसतग्रभाकर, पूना »

परी ०--परीक्षामुखसूत्रम्‌ ( फूछचन्द्रशास्त्री, काशी )

मुक्ता ०---मुक्तावली

रक़्ाकरा०--स्याद्वाद्रस्ताकरावतारिका ( यशोविजय जैनप्रन्थमाला, काशी ) छघीय --छपीयस्प्रयम्‌ ( माणिकचन्द ग्रन्थमाला, मुंबई )

छूघीय० स्वदि०--लघीयस्म्रयस्वविशृतिः ( जमुद्विता )

वादम्यायः ( पटना »।

विशेषा ०--विशेष/चशयकभाष्यम्‌ ( यशोविजय जैनपग्रन्थमाऊा, काशी )। विशेषा० घू०--विशेषावप्यकभाष्यशृहदूबूत्तिः ( श् )। इलोकवा -- मीमांसइलोकवारसिकम्‌ ( चौरर्वा संस्कृत सिरीक्ष, काशी ) सनन्‍्मति० सन्मतितकप्रकरणम्‌ ( गृजरातपुरातत्वमन्दिर; करमदावाद ) सनन्‍्मतिटी०--सन्मतितकंप्रकरणटीक्ष ( ,, ». )।

सर्वांथ है मजे स्वांथंसि | सर्वांथंसिद्धिः

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पृ ८--शष्टम्‌ सं०--संसंक्षकप्रतिः प्र०--प्रसंशकप्रतिः सम्पा०--सम्पादकः

पशु जिद बालइहल

तः पूर्ष सिंघी जैन प्रन्थमालामें जितने प्रन्थ प्रकाशित हुए वे मुख्यतया इतिहास

विषयक हैं; प्रस्तुत प्रन्थके प्रकाशनके साथ, अन्थमाला दशन विषयक साहित्यके

प्रकाशन कार्येका प्रशस्य प्रारम्भ करती है। मालाके मुख्य सम्पादकत्व और सद्लालकत्वके

सम्बन्धसे, यहाँ पर कुछ वक्तव्य प्रकट करना हमारे लिये प्रासंगिक होगा

जैसा कि इस ग्रन्थमालाके प्रकाशित सभी प्रन्थोंके प्रधान मुखपृष्ठ पर इसका कार्ये- प्रदेशसूचक उल्लेख अक्लित किया हुआ है-तदनुसार इसका जैनसाहित्योद्धार विषयक ध्येय तो बहुत विशाल है। मनोरथ तो इसका, जैन-प्रवचनगत “आगमभिक, दाशेनिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, कथात्मक” इत्यादि सभी विपयके महत्त्वके प्रन्थोंका, विशिष्टरूपसे संशोधन- सम्पादन कर यथाशक्य उन्हें प्रकाशित करनेका है। परन्तु सबसे पहले अधिक लक्ष्य हमने इतिहास विषयक साहित्यके प्रकाशित करने पर जो दिया है, उसके दो प्रधान कारण हैं। प्रथम तो यह्‌ क्रि-इस विपय पर हमारी, अपने अध्ययनकालके प्रारम्भ ही से कुछ विशेष प्रीति रही और उससे इस विषयमें हमारी कुछ थोड़ी-बहुत गति भी उल्लेख योग्य हुई इस इतिहासान्वेषणसे हमारी कुछ बौद्धिक सीमा भी विस्तृत हुई और असांप्रदायिक दृष्टि भी विकसित हुई हमारे स्वानुभवकी यह प्रतीति है कि इस इतिहास विषयक साहित्यके अध्ययन ओर मननसे जो कुछ तत्त्वाबबोध हमें प्राप्त हुआ उससे हमारी बुद्धिकी निरीक्षण और परीक्षण शक्तिमें विशिष्ट प्रगति हुई ओर भूतकालीन भावोंके स्वरूपको समझनेमें वह यत्किंचित्‌ सम्यगू दृष्टि प्राप्त हुई जो अन्यथा अप्राप्य होती इस स्वानुभवसे हमारा यह एक हृढ़ मन्तव्य हुआ कि भूतकालोन कोई भी भाव और विचारका यथार्थ अबबोध प्राप्त करनेके छिये सर्घ-प्रथम तत्कालीन ऐतिहासिक परिस्थितिका सम्यग्‌ ज्ञान प्राप्त होना परमावश्यक है। जैन ग्रन्थभण्डारों में इस इतिहासान्वेषणके उपयुक्त बहुत कुछ साहित्यिक सामग्री यत्र तत्र अस्त-व्यस्त रूपमें बपलब्ध होती है, लेकिन उसको परिश्रमपू्वेक संकलित कर, शास्त्रीय पद्धतिसे व्यवस्थित कर, अन्यान्य प्रमाण और उल्लेखादिसे परिष्कृत कर, आलोचनात्मक और ऊहापोहात्मक टीफा- टिप्पणीयोंसे विवेचित कर, विद्वदूप्राद्म और जिज्ञासुजनगम्य रूपमें उसे प्रकाशित करनेका कोई विशिष्ट प्रयज्ञ अभी तक जैन जनताने नहीं किया। इसलिये इस ग्रन्थमालाके संस्थापक दानशील श्रीमान्‌ बाबू श्रीबहादुर सिंहजी सिंघी-जिनको निजको भी हमारे ही जैसी, इतिहासके विषयमें खूब उत्कट जिज्ञासा है और जो भारतके प्राचीन स्थापत्य, भास्कय, चित्र, निष्क एवं पुरातत्त्वके अच्छे ममेझ हैं और लाखों रूपये व्यय कर जिन्होंने इस विषयकी अनेक बहुमूल्य बस्तुएँ संगृह्दीत की है-उनका समानशील विद्याव्यासंगपरक सौहाद पूर्ण परामशे पाकर, सबसे पहले हमने, जैन साहित्यके इसी ऐतिहासिक अन्जको प्रकाशित करनेका उपक्रम किया |

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भौर दूसरा कारण यह है कि-जैन वाहमयका यद्द विभाग, जैन धर्म और समाजकी दृष्टिसे तो मद्त्यका है ही, लेकिन तदुपरान्त, यह समुब्यय भारतवर्षके सर्वेसाधारण प्रजाकीय और राजकीय इतिहासकी दृष्टिसे भी उतना ही मह्वका है। जैनधर्मोय साहित्यका यह ऐतिहासिक अज्ञ जितना परिपुष्ट है उतना भारतके अन्य किसी धर्म या सम्प्रदायका नहीं त्राह्मणघर्मीय साहित्यमें इतनी ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध होती है, बौद्धधर्मीय साहित्यमें इसलिये जैसा कि हमने ऊपर सूचित किया है, तदनुसार जैन प्रन्धंभण्डारोंमें जहाँ तहाँ नाशोन्मुख दक्षामें पड़ी हुईं यह ऐतिहासिक साधन-सम्पत्ति जो, यदि समुचित रूपसे संशोधित-सम्पादित होकर प्रकाशित हो जाय, तो इससे जैन घमके गौरबकी ख्याति तो होगी ही, साथ में भारतके प्राचीन स्वरूपका विशेष ज्ञान प्राप्त करनेमें भी उससे विशिष्ट सहायता प्राप्त होगी और तदूद्वारा जैन साहित्यकी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा विशेष प्रख्यापित होगी इन्हीं दो कारणोंसे प्रेरित होकर हमने सबसे पहले इन इतिहास विषयक ग्रन्थोंका प्रकाशन करना प्रारम्भ किया। इसके फलस्वरूप अद्यपयन्त, इस विषयके ६-७ अन्थ प्रकाशित हो चुके हैं और प्राय: १०-६२ तैयार हो रहे हैं

अब, प्रस्तुत ग्रन्थके प्रकाशनके साथ, सिंधी जैन प्रन्थमाठा, जेन प्रवबचनका विशिष्ट आधारभूत जो दाशनिक अज्ज है तद्विपययक साहित्यके प्रकाशनका उपक्रम करती है और इसके द्वारा ध्येय-निर्दिष्ट कार्य प्रदेशके एक विशेष महत्त्वके क्षेत्रमें पदापण करती हे

जैन साहित्यका यह दाशनिक विभाग भी, इतिहास-विभागके जितना ही सर्वोपयोगी और आकर्षक महत्त्व रखता है। भाश्तवर्षकी समुश्चय गंभीर तस्‍््वगवेषणाका यह भी एक बहुत बड़ा और महत्त्वका त्रिचारभंडार है। पूर्वकालीन जैन श्रमणोंने आत्मगवेषणा और मोक्षसाधनाके निमित्त जो कठिनसे कठिनतर तपस्या की तथा अगम्यके ध्यानकी ओर आनन्त्यके ज्ञानकी सिद्धि प्राप्त करनेके लिये जो घोर वितिक्षा अनुभूत फी-उसके फल स्वरूप उन्हें भी कई ऐसे अमूल्य विचाररत्न प्राप्त हुए जो जगतके विशिष्ट कल्याणकारक सिद्ध हुए। अहिंसाका चह महान्‌ विचार जो आज जगत्‌की शांतिका एक सब श्रेप्त साधन समझा जाने छगा है और जिसकी अप्रतिहत शक्तिके सामने संसारकी सर्व संहारक शक्तियाँ कुण्ठित होती दिखाई देने छगी हैं; जैन दशेन-शाश्नका मौलिक तक्त्वविचार है। इस अद्दिसाकी जो श्रतिष्ठा जैन दर्शनशा्तोने स्थापित की है वह अन्यन्न अज्ञात है। मुक्तिका अनन्य साधन अहिंसा है और उसकी सिद्धि करना यह जैन दशेनशास्तरोंका चरम उद्देश है। इसलिये इस अद्दिसाके सिद्धान्वका आकलन यह तो जैन दाशेनिकोंका आदश रहा ही; लेकिन साथमें, उन्होंने अन्यान्य दाशेनिक सिद्धान्तों और तास्विक विचारोंके चिन्तमसमुद्रमें भी खूब गहरे गोते लगाये हैं और उसके अन्तसस्‍्तछू तक पहुँच कर उसकी गंभीरता और विशा- लताका नाप लेनेके लिये पूरा पुरुषार्थ किया है। भारतीय दर्शनशाश्रका ऐसा कोई विशिष्ट प्रदेश या कोना बाक़ी नहीं है जिसमें जैन विद्वानोंकी विचारधाराने मर्मभेदक प्रवेश किया हो। महाबादी सिद्धसेन दिवाकरसे लेकर न्यायाचाये महोपाध्याय यशोविजयजीके समय तकके-अथौत्‌ भारतीय दृशनशास्रके समग्र इतिहासमें दृष्टिगोचर होनेवाली प्रारम्भिक संकलनाके उद्गम काछसे छेकर उसके विकासके अन्तिम पे तकके सारे ही सर्जन-

[३]

समयमें-जैन तार्किक भी इस तक भूमिके उश्च-नीच और सम-विषम तलोँमें सतत चंक्रमण करते रहे हैं. और अपने समकक्ष आह्मण और बौद्ध सतके दाशंनिकों और तस्वचिन्तकोंकी तस्‍्त्वचर्चामें समानरूपसे भाग लेते रहे हैँ। बौद्ध और ब्राह्मण पण्डितोंकी तरद्द जैन पण्डितोंने भी अनेक नये तके और विचार उपस्थित किये; अनेक नये सिद्धान्त स्थापित किये अनेक वादियोंके साथ उन्होंने बाद-विवाद किया और अनेक शास्प्रोंका खण्डन-मण्डन किया। जीव, जगत्‌ और कारूफकी कल्पनाओंके समुद्रमन्‍्थनमें उन्होंने भी अपना पूरा योग दिया। पक्षप्रतिपक्षकी विचार भूमिमें ब्रान्‍्षण और बौद्ध तार्किकोंके साथ उन्होंने भी अपने तक तुरग खूब वेगके साथ दौड़ाये और अपने साथियोंके साथ बराबर रहनेकी पूरी कसरत की इसके फल स्वरूप अनेक उत्तमोत्तम ग्रन्थरत्न निर्मित हुए और उनसे जैन साहित्यकी समृद्धिका शिखर अधिकतर उन्नत हुआ |

जैन बिद्वानोंने दाशेनिक विचारोंकी मीमांसा करनेवाले अनेकानेक ग्रन्थ बनाये हैं. इनमें कई ग्रन्थ मौलिक सिद्धान्त प्रतिपादन करनेवाले शाम्र ग्रन्थ हैं, कई दाशेनिक और न्यायशाखकी परिभाषाओंका संचय करनेवाले संग्रह प्रन्थ हैं; कई अनेक मतों और तर्त्वॉका निरूपण करनेवाले समुच्चय ग्रन्थ हैं और कई विशाल विवेचना करनेवाले व्याख्या भ्न्थ हैं इन जैन तार्किकोंमेंसे कई बविद्वानॉने-खास करके श्रेताम्बर सम्प्रदायानुयायी आचार्योंने- कितने एक बौद्ध और ब्राह्मण शास्रोंपर भी, बहुंत ही निष्पक्ष देष्टिपूषेक, भूल अन्धकारोंके भावोंकी अविकल रक्षा करते हुए, प्रौद़ पाण्डित्यपूणं टीकाएँ की हैं, जो उन प्रन्थोंके अध्येताओंके लिये उत्तम कोटिकी समझो जाती हैं। बौद्ध महातार्किक दिडनागके न्याय- प्रवेश सत्र ऊपर जैनतर्कशिरोमणि हरिभद्र सूरिकी टीका, तथा आह्षण महानैयायिक भासव॑ज्ञके न्यायसार नामक प्रतिष्ठित शाखर पर जैन न्‍्यायविद्‌ जयसिंह सूरिकी व्याख्या इसके प्रांजल उदाहरण हैं

इन जैन दार्शनिक भ्रन्थोंका सूक्ष्मताके साथ अवलोकन करनेसे हमें इस बातका बहुत कुछ ज्ञान हो सकता है कि-भारतमें दाशेनिक विचारोंका, किस क्रमसे विकास और विस्तार हुआ। इन जैन तक प्रन्थोंमेंसे, कई एक ऐसे दाशेनिक सिद्धान्तों और विचारोंका भी पता लगता है जो प्रायः पीछेसे बिल॒प्त हो गये हैं. और जिनका उल्लेख अन्य शाख्रोंमें अप्राप्य है। आजीवक, ज्रेराशिक, कापाकिक, और कई प्रकारके तापस मत इनके विषयमें जितनी ज्ञाठव्य बातें जैन तके ग्रन्थोंमें प्राप्त हो सकती हैं, उतनी अन्य तके शाख्रोंमें नहीं। इन जैन ताकिकोने चार्बाक मतको भी षड्दशेनके अन्तर्हित माना और उसको जैन, बौद्ध, सांख्य, न्याय और मीमांसा दर्शनकी समान पंक्तिमें बिठाया। उन्होंने कहा, चार्बाक मत भी भारतीय तत्त्वज्ञानरूप बिराट्‌ पुरुषका वैसा ही महर्वका एक अज्ञ है जैसे अन्यान्य प्रधान मत हैं

जैन तार्किकोंके दाशेनिक विचार परीक्षाप्रधान रहे किसी आगम विशेषमें कथित होनेसे ही कोई विचार निञ्रौन्‍्त सिद्ध नहीं हो सकता; और किसी तीर्थंकर या आप्त-बिशेषके नामकी छाप रूगी रहनेसे ही कोई कथन या वचन अबाधित नहीं भाना जा सकता। आंगमकी भी परीक्षा होनी चाहिए ओर आप्त पुरुषकी भी परीक्षा करनी चाहिए। परीक्षा

[४ ]

करने पर जो विचार युक्तिसंगत सिद्ध हो उसका स्वीकार करना चाहिए-चाहे फिर वह विचार किसीका क्‍यों हो यह कथन तो तीथंकर महावीरका किया हुआ है इसलिये इसमें कोई शंका होनी चाहिए, और यह बचन तो ऋषि कपिलका कहा हुआ है इसलिये इसमें कोई तथ्य नहीं समझना चाहिए-ऐसा पक्षपातपूर्ण बिचार-कदाग्रह जैन ताकिकोंकी दृष्टिमें कुत्सित माना गया है। श्रद्धानपधान उस प्राचोन युगके ये परीक्षाकारक विचार निस्सन्देह महत्त्वका स्‍थान रखते हैं

जैन ताकिकॉने अपने दाशंनिक मन्तव्योंका केन्द्र स्थान अनेकान्त सिद्धान्त बनाया और 'स्यात्‌” शब्दाड्लित वचन भंगीको उसकी स्वरूपबोधक विचार-पद्धति स्थिर कर उस स्याद्वाद! को अपना ताक्तिविक धुवषद स्थापित किया। इस अनेकान्त सिद्धान्त और स्याह्वाद बिचार-पद्धतिने जैन विद्वानोंको तक्त्ब-चिन्तन और तकं-निरूपण करनेमें बह एक विशिष्ट प्रकारकी समन्वय दृष्टि प्रदान की जिसकी प्राप्तिसे तत्त्वज्ञैं पुरुष, राग-हेषरूप तिमिरपरिपृण्णे इस तमोमय संसार कान्तारकों सरलता पूर्वक पार कर अपने अभीष्ट आनन्द स्थानकों अब्या- बाघतया अधिकृत कर सकता है। जीव और जगत्‌-विषयक अस्तित्व-नास्तित्व नित्यत्व- अनित्यत्य एकत्ब-अनेकत्व आदि जो भिन्न मिन्न एवं परस्पर विरोधी सिद्धान्त तत्तत्‌ तस्ववेत्ताओं और मत प्रचारकोंने भ्रस्थापित किये हैं उनका जैसा सापेक्ष रहस्य इस समन्वय दृष्टिके प्रकाशमें ज्ञात हो सकता है, वह अन्यथा अज्ञेय होगा। इस समन्वय दृष्टिचाला तस्वचिन्तक, किसी एक विचार या सिद्धान्तके पक्षसें अभिनिविष्ट होकर वह सभी प्रकारके विचारों- सिद्धान्तोंका मध्यस्थता पूवेक अध्ययन और मनन करनेके लिये तत्पर रहेगा उसकी जिज्ञासा बुद्धि किसी पक्षविशेषके प्रस्थापित मत-विचारमें आग्रहवाली बनकर, निष्पक्ष न्यायाधीशके विचारकी तरह, पक्ष ओर विपक्षके अभिनिवेशसे तटस्थ रहकर, सत्यान्वेषण करनेके लिये उच्यत रहेगी। यह किसी युक्ति विशेषकों चहाँपर नहीं खींच छे जायगा, जहां उसकी मत्ति चोंट रही हो; लेकिन वह अपनी मतिको बहाँ ले जायगा, जहां युक्ति अपना स्थान पकदे बेठी हो। अनेकान्त सिद्धान्तके अनुयायिओंके ये उदार उद्घार हैं। शायद, ऐसे उद्बार अन्य सिद्धान्तोंके अनुगामिओंके साहियमें अपरिचिति होंगे

ऊपरकी इन कण्डिकाओंके कथनसे ज्ञात होगा कि, जैन साहित्यका यह दाशनिक प्रन्धात्मक अंग भी, समुच्चयय भारतीय दशन-साहित्यके रह्ढ मण्डपमें कितना महत्त्वका स्थान रखता है। बिना जैन तकशाश्षका विशिष्ट आकलन किये, भारतीय तत्त्वज्ञानके इतिहासका अन्वेषण और अबलोकन अपूर्ण ही कहलछायगा

जैनेतर विद्वानोंमें, बहुत ही अल्प ऐसे दाशनिक विद्वान होंगे जो जैन तक प्रन्धोंका कुछ विशिष्ट अध्ययन ओर मनन करते हों। विद्वानोंका बहुत बड़ा समूह तो यह भी नहीं जानता होगा कि स्याद्वाद या अनेकान्तवांद क्‍या चीज है। हज़ारों ही ब्राह्मण पण्डित तो यह भी ठीक नहीं जानते होंगे कि बौद्ध और जैन दशेनमें क्या भेद है। जो कोई विद्वांन. माधवाचायेका बनाया हुआ सर्वदशनसंग्रह नामक प्रंथका अध्ययन करते हैं उन्हें कुछ थोड़ा बहुत ज्ञान जैन दशेनके सिद्धान्तोंका होता है। इसके विपरीत जैन विद्वानोंका दाशलिक ज्ञान

[५ ] बिशेष व्यापक होता है। वे कमसे कम न्यायश्ञाश्रके तो मोलिक प्रन्थोंका अवश्य परिचय प्राप्त करते हैं; और इसके उपरान्त, जिन कितने एक जैन तक प्रन्थोंका वे अध्ययन-मनन करते हैं, उनमें, थोड़ी बहुत, सब ही दशनोंकी चचा और आलोचना की हुई होती है इससे सभी दर्शनोंके मूलभूत सिद्धान्तोंका थोड़ा-बहुत परिचय जैन तकोभ्यासियोंको जरूर रहा करता है। भारतीय इतिहासके भिन्न-भिन्न युगों और उसके प्रमुख प्रज्ञाशालियोंका जब हम परि- चय करते हैं तब हमें यह एक ऐतिहासिक तथ्य विदित होता है कि जिस तरह जैन विद्वानोंने अन्य दाशनिक सिद्धान्तोंका अविपयोसभावसे अवछोकन और सत्यता-पूषेक समालोचन किया है, वैसे अन्य विद्वानोनि-खासकर ब्राह्मण विद्यानोनि-जैन सिद्धान्तोंके विषयमें नहीं किया उदाहरणके लिये वर्तमान युगके एक असाधारण महापुरुष गिने जाने लायक रवामी द्यानन्दका उल्लेख किया जा सकता है। स्वामीजीने अपने सत्या्थंप्रकाश नामक सर्वप्रसिद्ध प्रन्थमें जैन दशेनके मन्तव्योँके विषयमें जो ऊटपटांग और अंड-बंड बातें लिखी हैं, वे यद्यपि विचारशील विद्वानोंकी दृष्टिमें सबेधा नगण्य रही हैं; तथापि उनके जैसे युगपुरुषकी कीर्तिको वे अवश्य कलक्लित करने जैसी हैं ओर अक्षम्य कोटिमें आनेघाली आन्तिकी परिचायक हैं | इसी तरह हम यदि उस पुरातन कालके ब्रह्मबादी अद्वेताचाये स्वामी शह्लरके प्रस्थोंका पठन करते हैं तो उनमें भी, स्वामी दयानन्दके जैसी निन्‍्ध्यकोटिकी तो नहीं, लेकिन अआन्तिमूलक और विपयोससूचक जैनमत-मीमांसा अवश्य दृष्टिगोचर होती है। स्वामी शद्गूरा- चायने अपने अहमसूत्रोंके भाष्यमें, अनेकान्तसिद्धान्तका जिन युक्तियों द्वारा खण्डन करनेका प्रय्न किया है, उन्हें पढ़कर, किसी भी निष्पक्ष विद्वानको कहना पड़ेगा कि-या तो शक्काराचार्य अनेकान्त सिद्धान्तसे प्रायः अज्ञान थे था उन्होंने ज्ञानपूषक इस सिद्धास्तका विपर्यासभावसे परिचय देनेका असाधु प्रयत्न किया है। यही बात प्रायः अन्यान्य शाख्रकारोंके विपयमें भी कही जा सकती है। इस कथनसे हमारा मतरूब सिर्फ इतना ही है कि-ठेठ प्राचीन काछ ही से जैन दाशंनिक मन्तव्योंके विषयमें, जैनेतर दाशेनिकोंका ज्ञान बहुत थोड़ा रहा है और स्यथाह्वाद या अनेकान्त सिद्धान्तका सम्यगू रहस्य क्या है इसके जाननेकी

शुद्ध जिज्ञासा बहुत थोड़े विद्यानोंको जागरित हुई है।

अस्तु, भूतकालमें चाहे जैसा हुआ हो; परंतु, अब समय बदला है। वह पुरानी मत- असहिष्णुता धीरे-धीरे बिदा हो रही है। संसारमें शान और विज्ञानकी बड़ी अद्भुत और बहुत वेगवालली प्रगति हो रही है। मनुष्य जातिकी जिज्ञासांबृत्तिने आज बिलकुल नया रूप॑ धारण कर लिया है। एक तरफ़ हजारों विद्वान भूतकालके अज्ञेय रहस्यों और पदार्थोको सुविज्ञेय करनेमें आकाश-पातांठ एक कर रहे हैं; दूसरी तरफ़ दृज़ांरों विद्वान्‌ शांत विचारों और सिद्धान्तोंका विशेष व्यापक अवलोकन और परीक्षण कर उनकी सत्य-असंत्यता और ताक्ष्विकताकी मीमांसाके पीछे हाथ धो कर पड़ रहे हैं। भांरतीय तस्तवज्ञान जो कलतक मांत्र ब्राह्मणों और श्रम्मणोंके सठोंकी ही देवोत्तर सम्पत्ति समझी जांती थी वह आंज सारै भूखण्डवासियोंकी सर्बंसामान्य सम्पत्ति बन गई है। प्रथ्वीके किसी भी कोनेमें रहने बाला कोई भी रंग या जातिका मनुष्य, यदि चांहे तो आंज इस सम्पत्तिका यथेष्ट उपभोग कर

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सकता है। जिनके सात सौ पुरुषों तकके पू्चेजोंने ज़िस ब्रह्मवाद, शून्यवाद या स्याद्वादकों कभी नाम भी नहीं सुना था और जिनकी जीभ इन शब्दोंका उच्चारण करनेमें भी ठीक समर्थ नहीं हो सकती, वे पश्चिमी आयें, आज इन तत्त्ववादोंके, हम भारतीय आर्योंसे अधिकतर पारगामी समझे जाते हैं त्रह्मयवादका सहत्त्त आज़ हम किसी काशीनिवासी न्राक्षण महामहोपाध्यायके वचनोंसे वैसा नहीं समझते जैसा आंग्लद्ठीपबासी डाक्टर मेंक्षमुल्लरके शब्दों द्वारा समझते हैं; शून्यवादका रहस्य हम किसी लंकावासी बौद्ध मद्दाथेरके कथनोंसे वैसा नहीं अबगत कर सकते जैसा रूसवासी यहुदी विद्वान डॉ त्सेरबेटत्स्कीके लेखों द्वारा कर सकते हैं। स्थाह्मदका तात्पये हम किसी जेनसूरिचक्रचक्रवर्तीकी जिह्लासे वैसा नहीं सुन सकते जैसा जर्मन पण्डित डॉ० हेरमान याकोबीके व्याख्यानोंमें सुन पाते हैं यह सब देख- सुनकर हमें मानना और कहना पड़ता है कि अब समय बदला है। जिनके पूर्वजोंने एक दिन यह घोषणा की थी कि-“न बदेदू यावनीं भाषां प्राणेः कण्ठगतैरपि' उन्हीं ब्राह्यणोंकी सन्‍तान आज प्राणोंके कप्ठ तक जानेपर भी याबनी भापाक्का पारायण नहीं छोड़ती। और, इसी घोषणाके उत्तराष्धमें उन्हीं भूदेवोने अपनी सन्तानोंके लिये यह भी कह रखा था-हस्तिना ताब्यमानो5पि गच्छेत्‌ जैनमन्दिर्म' वे ही ब्राह्मणपुत्र आज प्रत्येक जैन उपाश्रयमें शृद्॒प्राय समझते हुए भी जैन भिक्षुओंकों अहर्निश शाख्राध्ययन कराते हैं. और विशिष्ट दक्षिणा श्राप्त करनेकी छालूसासे मनमें महामूर्ख मानते हुए भी किसी को 'शाख्रविशारद' और किसीको 'सूरिसम्राट' कहकर उनकी काव्यप्रशरितियां गाते हैं

अब त्ब्बविद्या और आहतप्रवचचन केवछ मठों और उपाश्रयोंमें बेठकर ही अध्ययन करनेकी वस्तु नहीं रहीं। उनके सम्मानका स्थान अब ब्राह्मण और श्रमण गुरुओंकी गदियाँ नहीं समझी जातीं, लेकिन विश्वविद्यालयोंके व्याख्यान-व्यासपीठ माने जाते हैं। कौनसे विद्यापीठने किस शाख्रकी अपने पाठ्यक्रममें प्रविष्ट किया है, इसपरसे उस शाम्नका वेशिष्स्य समझा जाता है और उसके अध्ययन-अध्यापनकी ओर अभ्यासियोंकी जिज्ञासा आकर्षित होती है। अब अध्यापकगण भी-चाहे वह फिर ब्राह्मण हो या चाहे अन्य किसी वर्णका-शूद्र ही क्यों हो-सभी शास्मोंका सहानुभूतिपूर्वक पठन-पाठन करते-कराते हैं और तत्त्वजिज्ञासा पूवेक उनका चिन्तन-मनन करते हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, तथा कलकत्ता, बम्बई और इलाहाबादकी युनिवर्सिटियोंने अपने अध्ययन विपयोभें अन्यान्य ब्राक्षण शास्प्रोके साथ जैन शाखॉको भी स्थान दिया है और तदनुसार उन विद्यापीठोंके अधीनस्थ कई महाविद्यालयोंमें इन शा्खोंका पठन-पाठन भी नियतरूपसे हो रहा है काशी हिन्दू विश्वविद्यालयने तो जैनशास्रके अध्यापककी एक स्व॒तन्त्र गद्दी भी प्रतिष्ठित की है

इस प्रकार, शास्रप्रसार निमित्तक इस नवयुगीन नवविधानके कारण, अनेक विद्यार्थी जैन शास््रोंका अध्ययन करने छगे हैं. और जैन न्यायतीर्थ-न्यायविशारद आदि उपाधियोंसे विभूषित होकर विद्योत्ती् होने छगे हैँ जो विद्या और जो ज्ञान पूर्वकालमें बहुत ही कष्ट-साध्य और अति दुर्लूम समझा जाता था बह आज बहुत ही सहज साध्य और सर्चत्र सुलभ जैसा हो गया

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है। अब जो किसी खास बातकी आवश्यकता है तो बह है जैन शास्तरोके अच्छे शाख्रीय पद्धतिसे किये गये संझोघन-संपादनपूर्वक उत्तम संस्करणों की अपने शात्रोंका प्रचार करनेकी अभिलाषावाले जैन संघके ज्ञानप्रेमी जनोंको लिये यह परस कर्तव्य उपस्थित हुआ है, कि अब जैन साहित्यके उन ग्रन्थरह्लोंकी, उस तरहसे अलंकृत कर प्रकाशमें लाये जायँ, जिससे अध्ययनामिलाषी विद्यार्थियोंकी और अध्यापक ज़नोंको अपने अध्ययन-अध्यापनमें प्रोत्साहन मिले जेन अवचनकी सच्ची प्रभावना ऐसा ही करनेसे होगी

यद्यपि, इतःपूर्व, जैन समाजके कुछ विद्यानुरागो भ्रमण और श्रावक बग्गने, जैन प्रन्थोंका प्रकाशन कर कितना एक उत्तम एवं प्रशंसनीय कार्य किया है, और अब भी कर रहे हैं; लेकिन उनकी वह कायपद्धति, आधुनिक ग्रन्थ सम्पादनकी विद्वन्मान्य पढ़ति और विशिष्ट उपयोगिताकी दृष्टिसे अलूकृत होनेसे, उनके प्रकाशन कार्यका जितना प्रचार और समादर होना चाहिए, उतना नहीं हो पाता। उनके प्रकाशित वे ग्रन्थ प्रायः लिखित रूपसे मुद्रित रूपमें परिवर्तित मात्र कर दिये हुए होते हैं, इससे विशेष और कोई संस्कार उनपर नहीं किया जाता; और इस कारणसे, उनका जो कुछ उचित महत्त्व है. वह विद्वानोंके लक्ष्यमें योग्यहपसे नहीं आने पाता। यद्यपि हीरेका बास्तबिक मूल्याइ्ुन उसकी अन्तर्निद्दित तेजस्विताके आधारपर ही होता रहता है; तथापि सर्वसाधारणकी दृष्टिमें उसके मूल्यकी योग्यता कुशल शिल्पी द्वारा उसपर किये गये मनोरम संस्कार और यथोचित परिवेष्टनादि द्वारा ही सिद्ध होती रहती है। ठीक यही हाल ग्रन्थ रत्नका है। किसी भी ग्रन्थका वास्तविक महत्त्व उसके अन्दर रहे हुए अर्थगीरवके अनुसार ही निर्धारित होता रहता है, तथापि, तद्विदू ममेज्ञ संपादक द्वारा उसका उचित संस्कार समापन्न होने पर और विपयोपयुक्त उपोद्घात्‌, टीका, टिप्पणी, तुलना, समीक्षा, सारालेखन, पाठ-भेद, परिशिष्ट, अनुक्रम इत्यादि यथायोग्य परिवेष्टनादि द्वारा अलंकृत होकर प्रकाशित होने पर, सर्वे साधारण अभ्यासियोंके छक्ष्यमें उस प्रन्थकी डपयोगिताका वह महत्त्व, सकता है।

सिंघी जैन अन्थमालाका आदशे इसी प्रकार ग्रन्थोंका संपादन कर प्रकाशित करनेका है। इसका लक्ष्य यह नहीं है कि कितने प्रन्थ अकाशित किये जायँ, लेकिन यह है कि किस प्रकार मन्ध प्रकाशित किये जायूँ। संस्कारप्रिय बाबू श्रीबहादुर सिंहजी सिंघीका ऐसा ही उच्च ध्येय है, और उसी ध्येयके अनुरूप, इस ग्रन्थमाछाके दाशेनिक अद्जका यह प्रथम गन्थरल्न, इसके सुमर्मज्ञ बहुशुत विद्वान संपादक द्वारा, इस प्रकार सर्वाज्ञ संस्क्रत-परिस्कृत होकर प्रकाशित हो रहा है

इसके सम्पादन और संस्करणके विषयमें विशेष कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। हाथ कंकणकों आरसीकी क्या जरूरत है। जो अभ्यासी हैं और जिनका इस विषयमें अधि- कार है वे इसका महत्त्व स्वयं समझ सकते हैं। अध्यापकवर्य पण्डित श्रीसुखछालजीका जैन दर्शन विषयक अध्ययन, अध्यापन, चिन्तन, अबछोकन, संशोधन, संपादन आदि अनुभव गंभीर, तल्स्पर्शी, तुलनामय, ममेग्राही और स्पष्टावभासी है। पण्डितजीके इस प्रखर अवबोधका जितना दीध्ध परिचय हमको है उतना और किसी को नहीं है। आज प्रायः

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२० से भी अधिक वर्ष व्यतीत हो गये, हम दोनों अपने श्ञानमय जीवनकी दृष्टिसे एक प्रथके पथिक बने हुए हैं और हमारा बाह्य जीवन सद्वास और सहचार भी प्रायः एकाघधिकरण रहा है। तकंशाखके जो दो चार शब्द हम जानते हैं वे हमने इन्हींसे पढ़े हैं। अत एवं इस विषयके ये हमारे गुरु हैं और हम इनके शिष्य हैँ। इसलिये इनके ज्ञानके विषयमें हमारा अभिप्राय अधिकारयुक्त हम मानते हैं

पण्डितजीके इस द्ाशंनिक पाण्डित्यका बिशिष्टत्व निद्शक तो, समन्म्तिप्रकरण नामक जैन त्कका सबसे महान्‌ और आकर स्वरूप ग्रन्थका वह संस्करण है जो अहमदाबादके गूजरात पुरातत्त्व मन्दिर द्वारा प्रकाशित हुआ है। पचीस हजार झछोक परि- माणवाले उस महाकाय प्रन्थकी प्रत्येक पद्िक्त अशुद्धियोंसे भरी पड़ी थी। उसका कोई भी ऐसा पुरातन आदशे उपलब्ध नहीं है जो इन अशुद्धियोंके पुंजसे प्रश्रट्ट हो। चरम्मचक्षुविद्दीन होनेपर भी अनेक आदशोके शुद्धाशुद्ध पाठोंका परस्पर मिलान कर, बहुत ही सूक्ष्मताके साथ प्रत्येक पद और प्रत्येक वाक्यकी अरथसंगति लगाकर, उस महान अन्थका जो पाठोद्धार इन्होंने किया है चह इनकी 'प्रज्ञाचक्लुता!का विस्मयावजोधक प्रमाण है

इसी जैनतकंभाषा के साथ साथ, सिंघी जैन प्रन्थमाछाके लिये, ऐसा ही आदशे सम्पा- दनवाला एक उत्तम संस्करण, हेमचन्द्रसूरि रचित प्रमाणमीमांसा नामक तक विषयक विशिष्ट ग्रन्थका भी पण्डितजी तैयार कर रहे हैं, जो शीघ्र ही समाप्त प्रायः होगा तुलनात्मक हृष्टिसे न्यायशाखकी परिभाषाका अध्ययन केरनेवालॉंके लिये 'मीमांसा! का यह संस्करण एक महत्त्यकी पुस्तक होगी। बौद्ध, ब्राह्मण और जैन दशेनके पारिभाषिक शब्दोंकी विशिष्ट तुलनाके साथ उनका ऐतिहासिक क्रम बतलानेवाला जैसा विवेचन इस प्रन्थके साथ संकलित किया गया है, वैसा संस्कृत या हिन्दीके और किसी ग्रन्थमें किया गया हो ऐसा हमें ज्ञात नहीं है

यद्यपि, इसमें हमारा कोई कतृत्व नहीं है, तथापि हमारे लिये यह हार्दिक आह्ादकी बात है कि, हमारी प्रेरणाके वशीभूत होकर, शारीरिक दुबंलताकी अस्वस्थकर परिस्थितिमें भी, आज्ञ तीन चार वर्ष जितने दीघे समयसे सतत बौद्धिक परिश्रम उठाकर, पण्डितजीने इन ज्ञानसणियोंको इस प्रकार सुसज्जित किया और सिंघी जैन प्रन्थमालाके सूत्रमें इन्हें पिरोकर तद्द्वारा मालाकी प्रतिष्ठामें हमें अपना सहयोग देते हुए 'सहवीये करवावहे' वाले महर्पियोंके मन्त्रको चरितार्थ किया अन्तमें हमारी प्राथेना है कि--'तेजस्वि नावधीतमस्तु

अनेकान्त विहार |।

झांतिनगर, अहमदाबाद जिन विजय

परिचय।

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ग्रन्थकार--प्रस्तुत ग्रन्थ जैनतर्कभाषाके प्रणेता उपाध्याय श्रीमान्‌ यशोविजय हैं उनके जीवनके बारेमें सत्य, अधसत्य अनेक बांतें प्रचलित थीं पर जबसे उन्हींके समकालीन गणी का- स्तिविजयजीका बनाया 'सुजशवेली भास! पूरा प्राप्त हुआ, जो बिलकुर विश्वसनीय है, तबसे उनके जीवनकी खरी खरी बातें बिलकुल स्पष्ट हो गईं वह “भास” तत्कालीन गुजराती भाषामें पद्यवन्ध है जिसका आधुनिक ग़ुजरातीमें सटिप्पण सार-विवेचन प्रसिद्ध छेखक श्रीयुत मोहन- लाल द० देसाई 3- 8., ... 8, ने लिखा है। उसके आधारसे यहां उपाध्यायजीका जीवन संक्षेपमें दिया जाता है।

उपाध्यायजीका जन्मस्थान गुजरातमें कोल (बी० बी० एण्ड सी० आई० रेलवे ) के पास 'कनोडु! नामक गाँव है, जो अभी भी मौजूद है। उस गाँवमें नारायण नामका व्यापारी था जिसकी धर्मपत्नी सोभागदे थी। उस दम्पतिके जसवंत और पद्मर्सिह दो कुमार थे। कभी अकबरप्रतिषोधक प्रसिद्ध जैनाचार्य हीरविजय सूरिकी शिष्य परंपरामें होनेवाले पण्डितवर्य श्री नयविजय पाटणके समीपवर्ती 'कुणगेर' नामक गॉव्से बिहार करते हुए उस “कनोडु! गाँवमें पधारे। उनके प्रतिबोधसे उक्त दोनों कुमार अपने माता-पिताकी सम्मतिसे उनके साथ हो लिए और दोनोंने पाटणमें पं० नयविजयजीके पास ही वि० सं० १६८८ में दीक्षा ली और उसी साल श्रीविजयदेव सूरिके हाथसे उनकी बड़ी दीक्षा भी हुई ठीक ज्ञात नहीं कि दीक्षाके समय दोनोंकी उम्र क्या होगी, पर संभवतः वे दुस-बारह वर्षसे कम उम्रके रहे होंगे। दीक्षाके समय 'जसबंतां का 'यशोविजय” और “प्मर्सिह' का 'पञ्मविजय” नाम रखा गया उसी पद्मविजयकों उपाध्यायजी अपनी कृतिके अंतमें सहोदर रूपसे स्मरण करते हें

सं० १६९९ में “अहमदाबाद” शहरमें संघ समक्ष पं० यशोविजयजीने आठ अवधान किये इससे प्रभावित होकर वहाँके एक धनजी सूरा नामक प्रसिद्ध व्यापारीने गुरु श्रीनयविज- यजीको विनति की कि पण्डित यशोविजयजीको काशी जैसे स्थानमें पढ़ा कर दूसरा हेमचन्द्र तैयार कीजिए उक्त सेठने इसके वास्ते दो हजार चौदीके दीनार खर्च करना मंजूर किया और हुंडी लिख दी | गुरु नयविजयजी शिष्य यशोविजय आदि सहित काशीमें आए और उन्हें वहँकि प्रसिद्ध किसी भद्टाचार्यके पास न्याय आदि दर्शनोंका तीन वर्षतक दक्षिणा-दान- पूर्वक अभ्यास कराया। काशीमें ही कभी वादमें किसी विद्वान्‌ पर विजय पानेके बाद पं० यशो- विजयजीको 'न्यायविशारद' की पदवी मिली। उन्हें 'न्यायाचार्य” पद भी मिला था ऐसी प्रसिद्धि रही पर इसका निर्देश 'सुजशचेली भास!में नहीं है

काश्ीके बाद उन्होंने आगरामें रहकर चार वर्ष तक न्यायशास्त्रका व्शिष अभ्यास चिन्तन किया इसके बाद वे अहमदाबाद पहुँचे जहाँ उन्होंने औरंगज़ेबके मद्दोबत्

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नामक गुजरातके सूबेके समक्ष अठारह अवधान किये इस विद्वता और कुशछतासे आहृष्ट होकर सभीने ५० यशोविजयजीको “उपाध्याय” पदके योग्य समझा श्री विजयदेव सूरिके शिष्य श्रीविजयप्रमसूरिने उन्हें सं० १७१८ में वाचक-उपाध्याय पद समर्पण किया

बि० सं० १७४२ में डभोई गाँव, जो बड़ोदा स्टेटमें अमी मौजूद है उसमें उपाध्या- यजीका स्वगेवास हुआ जहाँ उनकी पादुका बि० सं० १७४५ में प्रतिष्ठित की हुईं अमी विमान है

उपाध्ययजीके शिष्य परिवारका निर्देश 'सुजशवेलो” में तो नहीं है पर उनके तत्त्वविजय, आदि शिष्यप्रशिष्योंका पता अन्य साधनोंसे चलता है जिसके वास्ते “जैनगूजरकविओ भा० २. प्र० २७ देखिए

उपाध्यायजीके बाह्य जीवनकी स्थूल घटनाओंका जो संक्षिप्त वर्णन ऊपर किया है, उसमें दो घटनाएँ ख़ास मार्केकी हैं जिनके कारण उपाध्यायजीके आन्तरिक जीवनका स्रोत यहातक अन्तर्मुख होकर विकसित हुआ कि जिसके बल पर वे भारतीय साहित्यमें और ख़ासकर जैन परम्परामें अमर हो गण। उनमेंसे पहली घटना अभ्यासके वास्ते काशी जानेकी और दूसरी न्याय आदि दर्शनोंका मौलिक अभ्यास करने की है। उपाध्यायजी कितने ही बुद्धि प्रतिभासम्पन्न क्यों होते उनके बाघ्ते गुजरात आदियमें अध्ययनकी सामग्री कितनी ही क्‍यों जुटाई जाती, पर इसमें कोई संदेह ही नहीं कि वे अगर काशीमें आते तो उनका शास्त्रीय दाशनिक ज्ञान, जैसा उनके अन्धोंमें पाया जाता है, संभव होता काशीमें आकर भी वे उस समय तक विकसित न्याय- शास्त्र ख़स करके नवीन न्याय-शाख््रका पूरे बलसे अध्ययन करते तो उन्होंने जैन-परम्परा- को और तदूद्वारा भारतीय साहित्यको जैन विद्वानकी हैप्तियतसे जो अपूर्व भट दी है वह कभी संभव होती

दसवीं शताब्दीसे नवीन न्यायके विकासके साथ ही समग्र वैदिक दशनोंमें ही नहीं बढ्िकि समग्र वैदिक साहित्यमें सूक्ष्म विइलेषण और तर्ककी एक नई दिशा प्रारम्भ हुईं और उत्तरोत्त अधिकसे अधिक विचारविकास होता चछा जो अभी तक हो ही रहा है। इस नवीनन्यायकृत नव्य थुगमें उपाध्यायजीके पहले भी अनेक शवेताम्बर दिगम्बर विद्वान्‌ हुए जो बुद्धि-प्रतिभासम्पन्न होनेके अलावा जीवन भर शाखयोगी भी रहे फिर भी हम देखते हैं कि उपाध्यायजीके पूर्ववर्ती किसी जैन विद्वानने जैन मन्तव्योंका उतना सतर्क दाशैनिक्र विश्लेषण प्रतिपादन नहीं किया जितना उपाध्यायजीने किया है इस अन्तरका कारण उपाध्यायजीके काशीगमनमें और नव्य- न्‍्यायशासख्रके गम्मीर अध्ययनमें ही है। नवीनन्यायशाखके अभ्याससे और तम्मूलक सभी तत्कालीन वैदिक दर्शनोंके अभ्याससे उपाध्यायजीका सहज बुद्धि-प्रतिभासंस्कार इतना विक- सित और समृद्ध हुआ कि फिर उसमेंसे अनेक शास्रोंका निमीण होने लूगा उपाध्यायजीके अन्धोंके नि्मोणका निश्चित स्थान समय देना अभी संभव नहीं फिर भी इतना तो

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अवश्य ही कद्दा जा सकता है कि उन्होंने अन्य जैन साधुओंकी तरह मन्दिरनिमौण, मूर्तिप्रतिष्ठा, संघनिकालना आदि बहिर्मुख धर्मकार्योमे अपना मनोयोग छगाकर अपना सारा जीवन जहाँ वे गये और जहाँ वे रहे वहीं एक मात्र शास्त्रोंके चिन्तन तथा नव्य-शात्रोंके निर्माण में लगा दिया

उपाध्यायजीकी सब कृतियाँ उपलब्ध नहीं हैं कुछ तो उपलब्ध हैं पर अधूरी | कुछ बिलकुल अनुपलब्ध हैं फिर भी जो पूर्ण उपलब्ध हैं, वे ही किसी प्रखर बुद्धिशाली और प्रवल पुरुषाथीकि आजीवन अभ्यासके वास्ते पर्याप्त हैं। उनकी लूभ्य, अलभ्य और अपूर्ण लमभ्य कृतियोंकी अभी तककी यादी अलग दी जाती है जिसके देखने से ही यहां संक्षेपमें किया जानेवाछा उन कृतियोंका सामान्य वर्गीकरण मूल्याक्नन पाठकोंके ध्यानमें सकेगा

उपाध्यायजीकी कृतियाँ संम्कृत, प्राकृत, गुजराती और हिंदी-मारवाड़ी इन चार भाषाओंमें गद्यबद्ध, पद्यवद्ध और गद्य-पद्यवद्ध हैं | दाशनिक ज्ञानका असली व्यापक ख़ज़ाना संस्कृत भाषामें होनेसे तथा उसके द्वारा ही सकल देशके सभी विद्वानोंके निकट अपने विचार उपस्थित करनेका संभव होनेसे उपाध्यायजीने संस्क्ृतमें तो लिखा ही, पर उन्होंने अपनी जैनपर- ग्पराकी मूलभूत प्राकृत भाषाकों गौण समझा इसीसे उन्होंने प्राकृतमें भी रचनाएँ कीं संस्कृत-पाकृत नहीं जानने वाले और कम जानने वालों तक अपने विचार पहुँचानेके लिए उन्होंने तत्कालीन गुजराती भाषामें भी विविध रचनाएँ कीं मौका पाकर कभी उन्होंने हिंदी-मारवाड़ीका भी आश्रय लिया

विषयदृष्टिसे उपाध्यायजीका साहित्य सामान्य रूपसे आगमिक, तार्किक दो प्रकारकां होनेपर भी विशेष रूपसे अनेक विषयावरुम्बी है। उन्होंने कर्मतत्त, आचार, चरित्र आदि अनेक आगमिक विषयों पर आगमिक शैलीसे भी लिखा है; और प्रमाण, प्रमेय, नय, मज्ल, मुक्ति, आत्मा, योग आदि अनेक तार्किक विषयों पर भी तार्किकशैलीसे ख़ासकर नव्य तार्किकशैलीसे लिखा है। व्याकरण, काव्य, छन्द, अलझ्जार, दशन आदि सभी तत्काल प्रसिद्ध शास्त्रीय विषयों पर उन्होंने कुछ कुछ पर अति महत्त्वका लिखा ही है

झैलीकी दृष्टिसे उनकी कृतियाँ खण्डनात्मक भी हैं, प्रतिपादनात्मक भी हैं और समन्वयात्सक्ष भी। जब वे खण्डन करते हैं तब पूरी गहराई तक पहुँचते हैं। प्रतिपादन उनका सूक्ष्म और विशद है। वे जब योगशाख या गीता आदिके तत्त्वोंका जैनमन्तव्यके साथ समन्वय करते हैं तब उनके गम्भीर चिन्तनका और आध्यात्मिक भावका पता चलता है। उनकी अनेक कृतियाँ किसी अन्यके अन्थकी व्याख्या होकर मूल, टीका या दोनों रूपसे स्वतन्त्र ही हैं, जब कि अनेक कृतियाँ असिद्ध पूर्वाचार्योंके अन्धोंकी व्याख्यारूप हैं। उपाध्यायजी थे पक्के जैन और श्रेताम्बर फिर भी विद्या विषयक उनकी दृष्टि इतनी विशाल थी कि वह अपने सम्प्रदाय मात्रमें समा सकी अतण्व उन्होंने पातझ्ल ओोगसूत्रके ऊपर भी लिखा और अपनी तीम्र समालोचनाकी लक्ष्य-दिगम्बर परम्पराके सूक्ष्म-

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प्रज्ञ तार्किकपवर विद्यानन्दके कठिनतर अष्टसहखी नामक अन्थके ऊपर कठिनतम व्याख्या भी लिखी

गुजराती और हिंदी-मारवाड़ीमें लिखी हुईं उनकी कृतियोंका थोड़ा बहुत वाचन, पठन प्रचार पहिले ही से रद है; परंतु उनकी संस्क्ृत-प्राकृत कृतियोके अध्ययन-अध्यापनका नामो- निशान भी उनके जीवन कालसे लेकर ३० वर्ष पहले तक देखनेमें नहीं आता | यही सबब है कि ढाई सौ वर्ष जितने कम और खास उपद्रबोंसे मुक्त इस सुरक्षित समयमें भीं उनकी सब कृतियाँ सुरक्षित रहीं। पठन-पाठन होनेसे उनकी कृतियोंके ऊपर टीका टिप्पणी लिखे जानेका तो संभव रहा ही नहीं पर उनकी नकलें भी ठीक-ठीक प्रमाणमें होने पाईं | कुछ कृतियाँ तो ऐसी मी मिल रही हैं कि जिनकी सिर्फ़ एक एक प्रति रही संभव है ऐसी ही एक-एक नकल वाली अनेक कृतियाँ या तो छ॒प्त हो गई, या किन्हीं अज्ञात स्‍्थानोंमें तितर बितर हो गई हों। जो कुछ हो पर अब मी उपाध्ययजीका जितना साहित्य लूभ्य है उतने मात्रका ठीक-ठीक पूरी तैयारीके साथ अध्ययन किया जाय तो जैन परम्पराके चारों अनुयोग तथा आगमिक, तार्किक कोई विषय अज्ञात रहेंगे

उदयन और गद्लेश जैसे मैथिल तार्किक पुहुबोंके द्वारा जो नव्य तर्कशाखका बीजा- रोपण विकास प्रारम्भ हुआ और जिसका व्यापक प्रभाव व्याकरण, साहित्य, छन्द, विविध- दर्शन और धर्मशास्र पर पड़ा और खूब फ़ैला उस विकाससे वश्चित सिर्फ दो सम्प्रदायका साहित्य रह्य जिनमेंसे बौद्ध साहित्यकी उस चुटिकी पूर्तिका तो संभव ही रहा था क्योंकि बारहवीं तैरहवीं शताब्दीके बाद भारतवर्षमें बौद्ध विद्वानोंकी परम्परा नाम मात्रकों मी रही इसलिए वह चुटि उतनी नहीं अखरती जितनी जैन साहित्यकी वह त्रुटि | क्योंकि जैन- सम्रदायके सैकड़ों ही नहीं बल्कि हजारों साधनसम्पन्न त्यागी कुछ गृहस्थ भारतवर्षके प्रायः सभी भागोंमें मौजूद रहे, जिनका मुख्य जीवनव्यापी ध्येय शासत्रचिन्तनके सिवाय और कुछ कहा ही नहीं जा सकता इस जैन साहित्यकी कमीको दूर करने और अकेले हाथसे पूरी तरह दूर करनेका उज्ज्वल स्थायी यश अगर किसी जैन विद्वानकों है तो वह उपाध्याय यशोविजयजीको ही है

ग्रन्थ--प्रस्तुत अन्थके जैनतर्कभाषा इस नामकरणका तथा उसे रचनेकी करपना उत्पन्न होनेका, उसके विभाग, प्रतिपाद्य विषयक्रा चुनाव आदिका बोधप्रद मनोरजञ्ञक इति- हास है जो अवश्य ज्ञातव्य है

जहाँ तक मादूम है इससे पता चलता है कि प्राचीन समयमें तर्कप्रधान दहन गम्थोकि- चाहे वे वैदिक हों, बौद्ध हों या जैन हों-नाम “न्याय पदयुक्त हुआ करते थे। जैसे कि न्यावसूत्र, स्यायभाष्य, न्यायवार्तिक, न्यायसार, न्‍्यायमझ्जरी, न्यायबिन्दु, न्‍्यायमुख, न्याया- बतार आदि अगर प्रो० व्यूचीका रखा हुआ "तर्कशासत्र'' यह नाम असलल्‍्में सच्चा ही है या

१. 77€-2॥7ए88 उपतेतधां॥: !.020८ गत 'तकंशास्र' नामक ग्रन्थ

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प्रमाणसमुखयवृत्तिमें निर्दिष्ट 'तर्कशास्र” नाम सही है तो उस प्राचीन समयमें पाये जानेवाले न्यायशब्दयुक्त नामोंकी परम्पराका यह एक ही अपवाद है जिसमें कि न्याथ शब्दके बदले तर्क शब्द हो। ऐसी परम्पराके होते हुए मी न्याय शब्दके स्थानमें 'तर्क! शब्द लगाकर तर्क- भाषा नाम रखनेवाले और उस नामसे धर्मकीर्ततिक्तत न्‍्यायबिन्दुके पदार्थों पर ही एक प्रकरण लिखनेवाले बौद्ध विद्वान मोक्षाकर हैं, जो बरहवीं शताब्दीके माने जाते हैं। मोक्षाकरकी इस तर्कभाषा कृतिका प्रभाव वैदिक विद्वान केशव मिश्र पर पड़ा हुआ जान पड़ता है जिससे उन्होंने वैदिक परम्परानुसारी अक्षपादके न्यायसूत्रका अवलम्बन लेकर अपना तर्कभाषा नामक अन्ध तेरह॒वीं-चौदहवीं शताब्दीमें रचा। मोक्षाकरका जगत्तल बौद्धविहार केशव मिश्रकी मिथिलासे बहुत दूर होगा ऐसा जान पड़ता है | उपाध्याय यशोविजयजीने बौद्ध विद्वानकी और वैदिक विद्वानकी दोनों 'तर्कमाषाओं” को देखा तब उनकी मी इच्छा हुई कि एक ऐसी तकभाषा लिखी जानी चाहिए, जिसमें जैन मन्तव्योंका वर्णन हो। इसी इच्छासे प्रेरित होकर उन्होंने प्रस्तुत अन्थ रचा और उसका केवल तर्कभाषा यह नाम रखकर जैनतर्क- भाषा ऐसा नाम रखा। इसमें कोई संदेह नहीं कि उपाध्यायजीकी जैनतर्कभाषा रचनेकी कल्पनाका मूल उक्त दो तकेभाषाओंके अवलोकनमें है मोक्षाकरीय तकेभाषाकी प्राचीन ताड- पत्रीय प्रति पाठ्णके भण्डारमें है जिससे जान पड़ता है कि मोक्षाकरीय तर्कभाषाका जैन भण्डारमें संग्रह तो उपाध्यायजीके पहिले ही हुआ होगा पर केशवमिश्रीय तकेभाषाके जैन भण्डारमें संग्रहीत होनेके विषयमें कुछ भारपूर्वक कहा नहीं जा सकता। संभव है जैन भण्डारमें उसका संग्रह सब्से पहिले उपाध्यायजीने ही किया हो क्योंकि इसकी भी विविध टीकायुक्त अनेक प्रतियाँ पाटण आदि अनेक स्थानोंके जैन साहित्यसंग्रहमें हैं

मोक्षाकरीय तकेभाषा तीन परिच्छेदोंमें विभक्त है जैसा कि उसका आधारभूत न्यायबिन्दु भी है। केशवमिश्रीय तर्कभाषामें ऐसे परिच्छेद विभाग नहीं हैं। अतएव उपाध्यायजीकी जैनतर्कभाषाके तीन परिच्छेद करनेकी कल्पनाका आधार मोक्षाकरीय त्कंभाषा है ऐसा कहना असंगत होगा जैनतर्कभाषाको रचनेकी, उसके नामकरणक्की और उसके विभागकी कल्पनाका इतिहास थोड़। बहुत ज्ञात हुआ। पर अब प्रश्न यह है कि उन्होंने अपने प्रन्थकां जो प्रतिपाद्य विषय चुना और उसे प्रत्येक परिच्छेदमें विभाजित किया उसका आधार कोई उनके सामने था या उन्होंने अपने आप ही विषयकी पसंदगी की और उसका परिच्छेद अनुसार विभाजन भी किया !। इस प्रश्नका उत्तर हमें भद्धारक अकलूड्डके लघीयस्रयके अवलोकनसे मिलता है उनका लघीयस्त्रय जो मूल पद्यदद्ध है और स्वोपज्ञविवरणयुक्त है उसके मुख्य- तया प्रतिपाद्य विषय तीन हैं-प्रमाण, नय और निक्षेप उन्हीं तीन विषयोंकों लेकर न्याय प्रस्थापक अकलड्ने तीन विभागमें लघीस्त्रयको रचा जो तीन प्रवेशमें विभाजित है बौद्ध- वैदिक दो तर्कमाषाओंके अनुकरणरूपसे जैनतर्कभाषा बनानेकी उपाध्याबजीकी इच्छा तो हुई थी ही पर उन्हें प्रतिपाथ विषयकी पसंदगी तथा उसके विभागके वास्‍्ते अकलड़की कृति मिल गई जिससे उनकी अन्थनिर्माणयोजना ठीक बन गई। उपाध्यायजीने देखा

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कि लघीयस्तयमें प्रमाण, तय, और निक्षेपका वर्णन है पर वह प्राचीन होनेसे इस विकसित युगके वास्ते पर्याप्त नहीं है इसी तरह शायद उन्होंने यह भी सोचा हो कि दिगग्बराचार्यक्रत लघीयस्त्रय जैसा, पर नवयुगके अनुकूल विशेषोंसे युक्त श्वेताम्बर परम्पराका मी एक अन्थ होना चाहिए इसी इच्छा से प्रेरित होकर नामकरण आदियमें मोक्षाकर आदिका अनुसरण करते हुए मी उन्होंने विषयकी पसंदगीमें तथा उसके विभाजनमें जैनाचार्य अकलकका ही अनुसरण किया। उपाध्यायजीके पूर्ववर्ती इवेताम्बर-द्गिम्बर अनेक आचार्योके तर्क विषयक सूत्र प्रकरण ग्रन्थ हैं पर अकलइके लघीयस्त्रयके सिवाय ऐसा कोई तर्क विषयक ग्रन्थ नहीं है जिसमें प्रमाण, नय और निक्षेप तीनोंका तार्किक शैलीसे एक साथ निरूपण हो। अतएब उपाध्यायजीकी विषय पसंदगीका आधार लघीयस्त्रय ही है इसमें तनिक मी संदेह नहीं रहता इसके सिवाय उपाध्यायजीकी प्रस्तुत कृतिमें लघीयस्त्रयके अनेक वाक्य ज्योंके त्यों हैं जो उसके आधारत्वके अनुमानको और मी पुष्ट करते हैं बाह्मस्वरूपका थोड़ा सा इतिहास जान लेनेके बाद आन्तरिक स्वरूपका भी ऐतिहासिक वर्णन आवश्यक है। जैनतरकभाषाके विषयनिरूपणके मुख्य आधारभूत दो जेन भन्थ हैं--- सटीक विशेषावश्यकभाष्य और सटीक प्रमाणनयतत्त्वाछोक इसी तरह इसके निरूपणमें मुख्यतया आधारभूत दो न्याय ग्रन्थ मी हैं-कुसुमाज्ञलि और चिन्तामणि। इसके अछावा विषय निरूपणमें दिगम्बरीय न्‍्यायदीपिकाका भी थोड़ा सा साक्षात्‌ उपयोग अवश्य हुआ है। जेन- तकेभाषाके नयनिरूपण आदिके साथ लघीयस्त्रय और तत्त्वार्थछोकवार्तिक आदिका शब्दशः साहइय अधिक होनेसे यह प्रश्न होना स्वाभाविक है कि इसमें लघीयस्त्रय तथा तक्तार्थछोक- वार्त्तिकका साक्षात्‌ उपयोग क्‍यों नहीं मानते, पर इसका जवाब यह है कि उपाध्यायजीने जैन तकेभाषाके विषयनिरूपणमें वस्तुतः सटीक प्रमाणनयतत्त्वालोकका ताकिक अन्थ रूपसे साक्षात्‌ उपयोग किया है लघीयस्त्रय, तत्त्वार्थकोकवार्त्तिक आदि दिगम्बरीय अन्थोंके आधारसे सटीक प्रमाणनयतक्त्वालोककी रचना की जानेके कारण जेनतर्कभाषाके साथ लघीयस्त्रय और तत्त्वार्थ- इलोकवात्तिकका शब्दसाहश्य सटीक प्रमाणनयतत्त्वाडोकके द्वारा ही आया है, साक्षात्‌ नहीं मोक्षाकरने धर्मकीर्त्तिके न्यायबिन्दुको आधारभूत रखकर उसके कतिपय सूत्रोंकी वयारख्या- रूपसे थोड़ा बहुत अन्य अन्य शात्त्रार्थीय विषय पूर्ववर्ती बौद्ध ग्रन्थोंमें से लेकर अपनी नाति- संक्षिप्त नातिविस्तृत ऐसी पठनोपयोगी तकेभाषा लिखी | केशव मिश्रने मी अक्षपादके प्रथम सूत्रको आधार रख कर उसके निरूपणमें संक्षेप रूपसे नेयायिकसम्मत सोछइ पदार्थ और वैशेषिकसम्मत सात पदार्थोक