> भीकमंचद्ध भत्ता के प्रवन्‍ध से स्टार प्रेत प्रयाग में छुपा :

(४ तत्सत्‌ ). हक * चर कम संहावलाकबन “विद्वाऊझसे हि देवा|४7

, श्री पं० भखिलानन्द जी फविरत्त तथा उनका अणीत “अथ्व-- घदालोचन० दोनों आयजगत्‌ में प्रसिद्ध हैं| दुर्देव से पं० अखि- लानव जी झ्राय समाज के क्षेत्र से हट कर ऐसे क्षेत्र में, उतरे हैं छित ज्षेत्र में कि उतरने की संभावना नहीं थो | समय की विखचित्र लीला, मनुघवुद्धि की चश्चलता, ओर हठवादिता अथवा स्वार्थ- परायणता का यह ए. 6 उत्कृष्ट उदाहरण है। अस्तु हमने-“लयू- जीवन» में इस पुरुतक का उत्तर देगा प्रारम्भ किया था किन्तु "तासिक पन्न” में प्रकाशित चोटक' खणडनांत्मक लेखों द्वारा जनता के उतना लाभ नहीं हो सकता था जितना कि पुस्तकरुप में प्रका-

' शित खण्डनात्सक सेशन द्वारा | इसलिये पुस्तक रुप में ही खंडन '

छुपाने का उद्योग़ किया गया | जिस उद्योग का फल आज: आपके: संमुल्त उपखित है.। भरी पंडित दरिशह्षर दोक्षितः खाध्यारी पुष्प हैं आपने आयुर्वेदिक रष्ट्र से अयवंवेद पर अ्रत्यतत परि- भ्रम किया है। कुछ भांग भाष्यरूप में जनता के संमुख आरा भी गया है। मेरी प्रेरणां से आपने यद “भीमसा” लिखी है। और जिस. उत्तभ गम्भीर भाव से, सरलंता सुन्द्रता से उत्तर दिया

- हैबह सर्दथा प्रशंसा के योग्य है “मिन्नचविह्ि लोकः”-- इसे

न्याग्र से फिन्हीं पुरुषों को कड़ा प्रतीत दोगों। किन्दीं:फो तरस

(३२)

प्रतीत द्वाथा। परन्तु यह स्मरण रखना थाहिये कि वैदिक ..तथा शाहझीय विचार गम्धोरता पूपरेक्न ही होना चाहिये। सन्ते।ध का विषय है कि 'दीक्षितः जी ने उत्तर देने में त्िद्वान्‌ पुरुषों के मारने का ही अलुसरण किया है।“बेदृ” आर्यसमाज के प्राण स्वरूप हैं--चेद” “आय समाज” का अटूद सम्पन्ध है। वेदों को रक्ता के साथ ही आयज्लमाज्ज का जीवन है। “वेद का पढ़ता पढ़ाना, खुनदा छुदाना . आया. का . परसधम्त- दैट--यदि इस परमधमसे का ध्यान रचना होता ते आज केवल सारतवर्ष में ही नहीं झिम्तु देश देशान्तर्रों में, पृथिव्री के समस्त द्वीप द्वोंपान्तर्स में सो "आये प्रताऋा”फहरा ज्ञाती केवल वोचिक शान की उन्नति हों कर संक्रिय शांत का प्रसार दाता - ते संब्या में, शुंणों में, विद्वता में, अन्वेषण कार्य में, पुरातत्वचिदों में आये का वस्बर सब से ऊँचा द्वेता। एक छोटी सी पुस्तक के निकलते द्वी आयेमरुडल में इतनी ख़लवली मच जाती है.श्रौरुआय लोग अनन्यगतिक दो जाते है इससेबढ़ कर हीन दशा का अवलतर प्रमाण कैौनसा होगा।! ध्वा* इरप्साद जी के “वैदिक सर्वस्व”--से आय लोग कितने घबरा शये थे ? श्रायसमाज के सौमाग्य से श्रत्र 'तक उसके मण्डल में दो चार. वैदिक, शांखी विद्यमान हैं इसलिये आ्राशद्ा का खान नहों है। परन्तु प्रतिब्ष ऐसे विद्वानों की संख्या वृद्धि को प्राप्त होगी तब ते! कल्याण है, नहीं ते। नहीं.) हमारे शिक्षणालयें में इल गे काझिक ध्यान देना चाहिये अस्तु जैसा समय हम देखना या लावा . खाहते हैं उसके लिये उसी ग्रकार के साधन भी होने चाहिये। इस “मीमांसा?-मे “दीक्षित? जी 'ने 'अथर्वालोचन? के तीन प्रकरणों का उच्चर दिया है-मन्यात्मक भाग का उछर बूधक छुपेगा और मेरी समझे में मंबरात्मक भाग 'का उत्तर पृथक ही उपना चाहिये जो लोग .अथवदेदाशोचन” का..उत्तर देखने

( हे)

के लिये उत्करिठित थे उनके संमुख यह उश्तर अस्तुत है मिसके पढ़ कर उनका भय, प्रान्ति, आशह्ला आदि दूर हागी में यह भी" आशा करता हू कि इस पुस्तक का खूब चार होगा श्रौर मन्दरात्मक भाग का उत्तर शीघ्र छुपाने के लिये “दोछ्षित” जी के . उत्तेजना मिलेगी अन्त में पंडित हरिशंकर दीक्षित जी को ,उनके पंरिश्रम के लिये झार्यमात्र की ओर से, में आशां करता हू' छि आर्यमात्र मुंक से सहमत होंगे, धन्यवाद देकर इस सिंहांचलोकन के/ * समप्त करता है सर्वसाधारण की समझ में थ्रा जाय: इललिये पुस्तक में प्रायः “बोलखाल” की भाषा का ही ढक्न 'रक्खा है।' सर्वसाधारण के-सुभीते के लिये दीक्षितजो के! ऐेसा करना पड़ा

पुनश्वरध--दीक्षित मी के आग्रह से मैंने यत्र तत संशोधन कर दिय्रां है नगीना आयंसम/ज्ञ के उत्सव के अवसर पर श्री पं» नन्‍्दक्िशार देव शर्मा जी ( प्रधान आयविद्वत्सभां भारतवर्ष ) भो पघारे थे। उस लमय उन्होंने भी इस पुस्तक के णम्मुख भागों" के पढ़ा था और छपाने के लिये ह॒र्पपूर्वक भ्रनुमति दी थी | उनकी अमुमति के अनुसार यत्र तत्र 'निवेश! " प्रतिनिवेश " कियेह गया हे!

घेदतीशे नरदेव शाल्वी

# ग्रोग्म त्सदब्रह्मगातमः $

अथववदालाचनमागासा

भूमिका

पुराकालमें तोयद प्रचार था फि मूमिका विस्तार से लिखी जानी' शी परन्तु वर्तमान समय में पाठक दृन्द रूम्यी भूमिका से ध्ररचि शकद करते है। कितने द्वो सज्ञन नो भूमिका पढ़ना भी श्ररुड्ा नहीं समभाी | इसलिये दम भो संक्तप से ही अपना अभिप्राय कट कर सज्ानों को रुचिक्रा फाय्य फरेंगे। यह ते पायकों विद्वित है ' कि श्री पं०अ्रखिलानःदजी प्रसिद्ध परिडत है कदाचित ही पढे लिखे सद्भ गो में उनको काई ने जानता हो | श्रापने आय्येसमाज भे भी बशुतकाल पर्यन्त काय्ये किया है | मुझको आपसे बदत मिलने फासोमाप प्रम नहीं हुवा; छुतते हैं कि शाप संस्कृत के श्र्छे परिडत है श्राप झुत्र काल से किन्हीं फारण विशेष से सप्राज, से ' सष्ठ हां कर धम्मंसता में काय्य करते हैं। आपने ( प्रथवद्वेदा लोचन ) इस नाम का एफ पुस्तक बनाया है जिसमें वेदों .के यिंपव की बहुत कुद्ध चर्चा है। यह पता तो चाचक दुन्दर को तभी विदित होगा कि यह वेद विषय को चर्चा कहाँ तक ठोक है सवकि स्तर प्रर इसको मीमांसा करके दिलाई जायगो | सम्प्रति तो केपल इस , प्रन्‍्थ में उसी चर्चा का विशेष है जिसके ऊपर अनेकवार ्त्र तश्र विचार हो छुका है। कोई ववोन चार्ता दृष्टिगत नहीं होती। मुझे भी इस भन्ध के देखने की उत्फाठ चिरकाल से थी परन्तु पुस्तक मिलने के कई फारण हुए गैये सुवय' तो मंग|ना. नहीं

(ते

"(५४ ) 'घाह्दा। बिना मूल्य कहीं से मिल्ला नहीं।गत' मास में एक वाए मुझे वेदतीथ भरी० पं० नरदेव शास्री जी से पम्रिखने का सौमसाग्य प्राप्त हुआ आपने इस प्रन्थ के देखने की ओर मेरी रुचि के बढ़ाया और यह भी कहा कि यदि येग्य समझो तो कुछ उसके विपय में लिखना भी, मैंने कहा इच्छा तो मेरी इस अन्य के देखने 'की चिरकाल से है, परम्तु पुस्तक मित्री नहीं थाप ही कृपा कश्फे 'दीजिये। आपने उत्तर दिया फि मैं लि दू गा पुस्तक आपके नाप आजायगी | श्रो० पं० जो ने मेरे नाम्त बों० पो० को पत्र सेज दिया परन्तु पुस्तक एक पक्ष पस्यन्त ने आई सेने भी एक पत्र लिखा, मेरे पत्र पर भी आई। मेरे मिश्र पं० लद्मीनाराथण जी ने अपने नाम से मंगाई तथ पुस्तक मिली | मेने पुस्तफ को सुख से आरम्भ करके अन्त फे पृष्ठ पप्य न्‍त विचार पूत्रेक अवल्ोफरम किया। पुस्तक देखने से जो हुछ मुझे . विदित हुआ उसका उल्लेष नो यहां चूथा है करण कि इन विषयों पर मुझे जा कुछ वकब्प हैं यह शआगे-कहँगा ही पुनः यहां कहता व्यर्थ सा प्रतीत होता है। इस श्यल पर सो थोड़ी सी बानगी पाठकवृन्द करो'इस झत्य के नाम को दिखाते हैं कारण कि/आंगे के प्रकरणों में इस विषय के! अब- 'कारा नहीं मिलेगा | श्ापने अपने प्रत्थ का नामकरण किया है-- “अधर्ववेदालोचन” यदद नाम प्रस्थ का सार्थक नाम है वा केवले 'रोचकऋता को ही लिये चुए है ? सम्पति भारत के नेताओं में प्रायः यह परिषाही देखी जाती है कि व्यक्ति तथा वस्तु का ताम रोचक हो बादे डस व्यक्तिवा पस्तु में नाम के गुण हो वा हो। ऐसे नामों “कौ प्रकट करके दम नाम धर्ताओं कों गष्ट करना नहीं चाहते, वे स्वय' ही विचारलें। सार्थक, नामकरण करना भी पक प्रकार का पांप है ? यदि कहों कि पाप फ्यों है। तो उत्तर यद दोगा कि सार्थक वाक्य फेहना निरर्थंक्र होता है।निरपथ्थक प्रत्ाप है।

“(:६,)

प्रशाप दूघरे श्र्थों में असत्य और अ्रमत्प पाप है | पूर्व ऋषिगण एस प्रकारक नामों फो रखना कि जिनमें रोचकता हो और भर्थ कुछ निकले पाप मानते थे, पाप करने वाल्ला पापी द्वोता है पाप का फन्न नग्क है। तभी तो वे श्पने प्न्धों का साम या ते केवल अपने नाम पर रखते थे, या ग्रन्थ का भाव नाम से प्रकट दो ऐसा रखते थे। चेदे पे लेरर शात्रों परय्य॑न्त प्रस्थों फे नामों का स्मरण फीजिये। यदि और खोज फरके देखाजाय ते पुराणों के कर्ताओं मे भी ऋषियों की इस शैली का उल्लद्त नहीं किया। पुराणों के नाम भी प्रायः साथक दी मिलेंगे “श्रयर्ववेदत्लोचरन” नाम सार्थक नहीं। फेवल प्रस्ध के नाम के शेभायमरीन बनाया गया है। नाम रण फझरते समय घिद्वत्ता को लोकप्रवाहके वेपन में लपैट कर रख 'दिया और ऋषियों की शैली का उल्लक्षत किया | वेदों का धनाइर कर महापाप कम्ताया | पढ़ीलिखी जनता को यह अरे प्रकार बिदित है कि शब्द दो प्रकार के दोते हैं। एक तो पे शब्द होते हैं 'ज्विग का खरूप शास्त्रों में कुड और है और ब्यवद्वार में कुछ भौर है। 'हुसरे शब्द ये है जिनका ब्यवहार नित्य प्रजागय में होता है। चाह आर व्याकरण सेवा शाजों में शुद्ध हो पररतु लोक व्यवद्दार में जक्ष उसका प्रयोग होता है उससे अन्यथा फरनों ज़ोकविरुद्ध है। 'उद्गधदण्ण के लिये देखिये रामताम वा ओमनाम सत्य है।इस 'आब्द का प्रयोग लोकमे सुतक देह को ले जाते समय समता में होता है | यदि कोई पुरुष विवाह में पाणिप्र हण के समय चर कन्या को 'डढाते समय कहे कि वेले ओोरम्‌ नाम सत्यहै तो कितना अनुवित अबीत होगा ! शासमे शब्द के अर्थ युरे हो, परस्तु लोक व्यधहयार: में उनेका प्रयोग जहां होता है यहाँ हेाना श्रच्छा है।इस प्रकार के व्यवद्वार करने वाले को यदि उस समय पूजा भी होजाय तो आश्चर्य, कहीं इसी प्रकार (आलोचन) (आलोचन चुविश्ञाम)

(००)

आलोचन शब्द वस्तुमात्र की स्थूलता कृशता वा हखख. दोर्धर अथवा श्वेता पोनतादि श्रथों में संस्कृतक्षों ने. प्रयोग किग्रा है।' जात से देखने अर्थ में ्रालोचन शब्द का प्रयोग .प्रायः नहीं होता, प्रम्तु सम्प्ति लोक में पुस्तकों के देखने आदि में व्यवहार फरते ईूँ इस हेतु शब्द चाहे अच्छी प्रकार देखने.के अ्र्थो' में हो परन्तु पढ़ी लिखी प्रजा में इस शब्द का व्यवद्दार मुष्यछृत कार््यो की.पर शपर धुराई मत्वाई देखनेकरे श्र्थमे आता है| जहां पेदों की आलोचना £। द्वेती है वहाँ ते! नास्तिकता फा पूर्ण राज्य है| नास्तिक ऐंग्वर फे अस्तित्व के! मालते हुए ही उसके विषय में कुध कहने का साहस करते हैं। यहां ते। जगत्‌ का कर्ता धर्तता दर्ता और उसके ऋथन के , अपना स्ख मान कर उसको श्ाल्लोचना, हे। रही है।पया यह थोड़ा पाप है। इमारे जानने में तो इस पाप से निष्ठति होने डुस्तर ही है। कहा भी है (ऋतप्नश्य निष्कृति)) पेदों की व्याख्या करने प्राले अनेक श्रूषि हो गये | वेदों के. शाखा. क्रम, जटा/ पल्ली आह्यरा साप्य, सभी बने परन्तु श्राल्षोचंन करने को साहस किसी ने 'नहीं किया शायद ऐसा प्रतीत होता है कि:!यह अनुकरण आपने अपनो प्रसिद्धि केभ्र्थ एक प्रसिद्ध पं० का किया. है। आचार की *चं० सत्यवत सामश्रमी जी ने श्रथने दो प्रन्थों का नाम इसी दंगपर ' रक्‍जा है। ऐनरेयालैचन, और निरुक्तालाचन; परन्तु उन्होंने,वे। अपने पहले के हो पुय्षों कै कथन की अलेचना की है ईश्वर चाकथ की ते नहीं इस अनुकरण का फल क्या. मित्रा घोड़े के पैरो मे नाख जड़े जाते थे, मेडक ने भी अपने “पैरों में नाल जड़वाने ' की डर्छो की, एक ही कील लगने. से प्राण पस्लेरू उड़ गये प्रन्‍्य 'कर्ता ने श्रनुकुप्ण करते समय केवल प्रम्थ की रोचकता शरीर 'असिद्ध परिडन के अनुऋरण से अपनो श्याति का ध्यान तो रकला परर्तु इस महूप्राप के शिर प्रए॒ पड़ते का श्यान नहीं रकला | जंग

(“८ .,) ॥॒ यह 'नामकरण 'ही अपने शुणे फो दिखा रहा है तब “फि! अग्रे स्यंत्रीपुलाकन्याय से भी यद्दी निफलेगा ( ग्ात॑ पिलुर्ध पारित्यं हुडई नाम दर्शवात्‌ ) शेष आातों का पता बाचक बस 'दे। खत स्थल पर सगेगा। अब में अपने दोनों मद्दानुमात्रों. को जिनफी महती कृपा से यह अन्य छुभे देखने को मिला, धन्य बाद देता हुआ भूमिका को समाप्त करके परमात्मा से ग्रार्थी हूँ. कि वह सुझे इस प्रपश् के प्रकट करने में सर्च प्रकार की शारिरिक 'आत्मिक कुशलता प्रदान करे। शोश्म शम इरिशदर दीक्षित. ,

'भूमिका के अवलोकन से पाठकबृन्द को यह तो भत्री-प्रकार “विद्त होगया होगा कि ग्रंथ का नामकरण किस हुद्धिमत्तासे किया "गया है। अग्रे ग्रन्थ भर में इसी प्रकार श्रयुक्त वार्ताओं वय समायश “किया गया है। यद्यपि भ्र श्रका उचर देना अपना कील यापन करना !है कहा भी ' है कि (अविचारयतो युक्तिः कत्थनं तुप्ररडनम्‌)

बिना विचारे ज्ञो वात कहो जाय उसका निराकप्ण करना केयल :मु्षों का 'कूटना मात्र है तुप कद्दते हैं धान की पुच्छ को |डस 'के.कूटने सेन घुस को ही लब्धि है और घान्य की तथापि “दिग्दशन मात कराना इप्त हेतु 'से अ्रव्रश्य प्रतीत. होंता' है कि : (अतधथ्यस्तथ्येवा“हरति महिमानं ज़नरवः ) चाहे. वार्ता असत्य 'हो सत्य होःजिसको बहुन से मनुष्य एक मुश्त द्ो$र कहने लग “जाय उस जनरव से पद्ार्थकी मद्दिमा में दोष हो ज्ञाता 'है। आर्य * समाज के जन्मदाता का जन्म ही घरातत पर पेदोफी रकार्थ बुआ 'था। इसमे कोई सन्देद भी नहीं कि याद हृदव से विचार कर और :'पक्षपांत की जबनिका को हटा कर गश्भीर-दृद्वि से देखाजाय तो “उन्होंने वेदों को पुनः दैसा ही करके रुमंता के: सामने “रख दिया

( & )

अत #ि बेद ऋषिकाल में थे। सम्प्रति भार्य्यतमाज के नेता अ्रपने के आय्णंसमाज के ज़न्मदाता का उत्तराधिकारी मानते हैं। उनका ऐसा मानना तभी सफल द्ोता-सम्भव है जय कि वे भी वेदों की रक्षा करना शाय्येसमाज के 'जन्यदाता की भांति अपया कर्तव्य समझे | इत्यादि अनेक कारणों से अथ्॑बेद्ालाचन फी निस्सा- ण्या दिखाना दमारा परम फर्चब्य दै-। अपर शागे अन्य “री सारतों तथा असारता प्र विचार फरते है।सझ्ञमगण उसका विचार निष्पक्ष होकर करे अन्य के विषय में कथन ऋरने के पूर्ण हम अपने भ्रन्थ में भाने पाले संकेती का विवरण करना श्रच्छा सर्म भते हैं ज्लसे कि धाचकव॒नद को. प्रन्धावज्ञोफन [में.सुगमता प्राप्त हो | हम इस ग्रन्ध का उत्तर देना इस प्रकार चादते हैं कि जिससे फक ही के अ्वज्ञो कून से दोगो का श्रभिप्राप प्रकट हो-ज्ञाय इस हनु से हम (उक्ति)) इस शब्द [से सो अथवधेदालाचन क्े कर्ता: का भाव रफखेंगे। और | प्रत्युक्ति: ) इस शब्द से अपने' घिज[रों को प्रगट करे.गे। जहां “उक्ति” शब्द श्रग्ये वहां भी असाधारण बिवार से देखे कि ग्रन्धकर्ता पंया कहता है। फिर “प्रत्युक्तिः . पर भी इसी प्रकार विचार करे |. सामान्य दृष्टि से देखने पर.फथत का रहस्य अरुकी प्रकार हृदयत्॒म. नहीं होता -अथधवेदालेचन,का आर प्रस्तावना से हाता हैं। प्रस्ताववा में प्रन्धकत्ताने प्रथम अथवयेद की उत्पत्ति का घन किया. है। इस. प्रस्तवना में किया हुआ कथन कुछ महत्व को लिये हुये नहीं कारण कि प्रिष्टपे रण है। यथपि इस प्रकार कै चिषय तो श्रायंसमाज के जम्मकाल से ही ' उठते चले श्राये हैं, अ्रनेफ चार इसपर विचार हो चुके हैँ'। तथापि “इस पर कुछु विचार “करना अचछा। प्रतीत होता है। ग्रन्थकर्ता ने अपने विद्यांवल से !इसे अकाहथय प्रवल प्रमाण जान 'करदी इस विपय की डठाया प्रतीत होता:है। एक: ग्रह श्रीकारण विशेष इस

( १० ) पर विद्यार करने का प्रतीत होता है कि साधारणशात वालो जगता प्रत्यक्तर उत्तर से सस्तुष्ट द्ोती है।

[ उक्ति: ) प्रतावना+- ; ब्रह्मा देवानां प्रथम: संवभूव, विश्वस्य कत्तों खुबर्न- स्प गांप्ता। न्रह्मविद्यां सचविद्याप्रतिद्ा माय ज्येण्- पएत्नाय प्रह | विश्व का कर्ता और शुवन का गोप्ता देवताओं में प्रथम अल्लो छुझा | वह समस्त चिद्याओं में प्रतिष्ठित घेद पिया को& स्येप्ठ पुत्र अ्रंथव के प्रति कहने लगा अथर्वणों यां प्रचदेत ब्रह्मा अथवोतां पुरोवाचौ गिरे ब्रह्म विधाम्‌। समारदाजाय सत्वाहायय प्राह। मरदाज़ो गिरि से परावराम २।

बझ्या ने जिस बेदविद्या को अथर्य फे प्रति कहा, अथर्व ने उसी के श्रगाड़ी अंगिर के. प्रति कहा | अंगिर ने मरदांत के प्रति कह | और भरद्वाज ने उसो परावरचिता को श्रंगिरस फे प्रति कहा। अथर्ववेदीय मुएडकोएनिपद की इन दोध तिया से बेद 'भात्र का भ्रथम प्रवक्ता ब्रह्मा सिद्ध होता है।

त->-न-++-+-+नली जन जनन,. अत

७न-++ ०५० नननननभानग»»+3७3>पल्‍न+ जमा वन

# पेद्विधा अपरा विद्या है, बहाविद्या, परा विद्या | फविरत्नडी इतना भेद समझ सके और '्रह्मचिद्या', का श्रथ 'पेद्थिया' कर दिया। यहीं से 'प्रथम आसे मत्तिका पातः' हुआ प्रायः सब खातों पूर कविरतलडी ऐसा हो अनर्थ किया है ( पेरतो्थ: )

( ६१ )

अथवा त्वा, प्रथमो निरमन्थदग्ने त्वामग्मे धुंष्कारा- दष्यथवों निरमन्थत | ११-३२ यज्ञों रथवों प्रथ्तः प्रथम

पथस्तने। १। ८६१। ५।

च्रह्मा से प्राप्त हुए वेदुका चार विभाग करने चाला#भौर यशा दि क्रियाओं का प्रथम प्रदत्त ब्रह्मा का ज्येष्ट पुत्र श्रथर्वा प्रश्चा उसी ने घेद फे पक विभाग फो अपने नाम से विख्यात झिया। ओर उसो का ( अ्रथर्वाद्षिरिसा मुखम्‌ ) कह फर सुझ्य कर दिया। बाकी विभार्गों को लोगादि की उपमा दे दी

भरीचिमश्यंगिरसो पुलरत्य॑ पुतह ऋतुप प्रचेतम॑

बसिष्ट' चमग नारद मेवच | १। ३५।

मनु के इस प्रमाण से ब्रह्मा के दश पुत्रों में भ्रद्टिता तीसरी संख्या में आता है। श्र मुगड की भ्रति उसको घौथी संख्या में , रखती है होदइस मत भेद से हमारा कोई संबस्ध नहीं £। हमारा प्रयोजन केवल इतनाहो है कि वर्तमान अथर्थमें जिस प्रकार दशकारड अधर्वा के बनाए हुए हैं, उसी प्रकार दशकाणएड भरक्निरा के भी बनाये हुएह | इसीलिए इसका पूरा ताम अ्रधर्षा फ्रेवेद है

इस येदका पूरा पूरा रहस्य जानने वाला प्रह्मा का अ्रष्रम पुत्र चघसिष्ट इआ | इसीलिये उसके प्रात्चीन कवियों ने अ्रथवनिश्ि कह कर संवोधित किया है | काई पुरुष ऐला भी कहते हैं कि ६िसा

# विदित नहीं यह अर्थ .कपिरत्तजी ने कहाँ से किया भूल से शो नहीं निकलता ( चेद्तीर्थः ) | ये देश दशकाएडों का विभाग किस प्रमाण फे आधार पर है ! ( चेद्तीय )

(४२ )

नहोने के कारण इस-वेद का नाम “अथर्वा होगया' है ।पर॒न्तुउन की यह कछ्यता .सर्वथा भसार है| इस वेद्‌ 'का जो निरन्तर, खा- ' जाये करेंगे उनके इस बाते की खंयं पता लग जायगा।

इस बेद में कई सृक्तरस प्रकार के भी हैं। जिंनका संवंध केवल दिया से है और उनमें श्राम्य धर्मका हो अधिक वर्युत है। तथा उसकी विधि शौनफ सू में वणित है इसीलिये शतपथ' प्राह्मस के अश्यमेध प्रकरय में एस प्रकार की एक आख्पायिका आती है कि 'जंब अश्वमेध यश समाप्त हो जावे तब पहिले दिन शहरुयों को ऋग्‌- बेद दूसरे दिभ बूदों के यज़ुरंद तीसरे दिन युवकों फो श्रथवगेद क्र चौथे दिन स्रियों को श्रश्विसस वेद छुनाना चाहिये) इसी विषय का एक मन्त्र भी उच्तमे |

युवतथ! शोभना .उपसमेता. भवन्ति, ता उपदिशत्पां गिरसे-बेद इति। |

इस: प्रकार मिलता है। जित सूक्तो का स्त्रियों में बैठकर सुनाना - लिखा है बह-अत्यन्त रहस्यपूर्ण और आनन्द: परम्परा से परिपूर्ण हैं। उनका : दिशेष रहस्य इसो. प्रन्थ के मन्त्र-भाग में पाठकों को मिलेगा। ,

[म्रत्याक्ति: |

ऊपर का समस्त लेख अविकल रूप से प्रन्थकर्ता का है प्रत्थ कर्ता ने इस लेख से यह सिद्ध करने का साइस हिया है कि अरथर्त वेद का केर्ता भथर्वा और अ'गिरा हैं। साथ ही में यह चिवाद भी इस लेख में उठांया' है कि खासी जी का यह 'कथन मानने योग्य

छि वेदों का प्रकाश ऋषियों पर हुआ है। सनातन से चेदों का प्रकाश ब्रच्चा फे द्वारा ही होना-सिद्ध होता है प्रथम तो इस विषय. पर पूवं से ही विधा३ चले भाता है यदि ऋषियों द्वारा [वेदों को

( ३):

प्रकाश होना स्वामी ज्ञी का निज्ञ मत होता तो यह ल्ाह्हुप भी छोछझ था | यदि इस ब्रिषय का मानता आपका इए हे तो मनु तथा आाह्ण ग्रन्थों में से इस्त लेख को निकाल डालिये | स्वामी जी' सका उत्तर मांगता बुथा है। हमें तो दोनों मत स्वीकार है कऋ्राषयों द्वारा प्रकट हुए और ऋषियों से ब्रह्मा ने पढ़े। प्रथम तो यह विषय उठनाही नहीं चाहिये कारण कि विवाद का मुख्य स्थल घेद है। उदाहरण जैसे एक ऋण पत्र लिखा जाता है, बह उत्तमस और श्रधमर्ण दोनो फेो स्वीकार है यदि उस पर यह विवाद उठाया ज्ञाय कि इसका लिखने बाला अमुक है दूलरा कहे कि इसका लिखने चाला श्रप्ुक है; एक कहै कि अमुर का लिखा होने से तो स्वी कार यदि अमुरू इसका लेखक हेतो स्पोकार नहीं। जब प्रुणपत्र दोनों को स्वीकार है तो फिर लेखकों का अडंगा लगाना यह सिद्ध करताओ कि यातो वादी को शास्यक्षी रीतिष्टी विदित नहों; यदि है तो अपने पत्तकी निर्वलतासे समय टाल देना एहैँ। इतना बड़ा विधाद' उठाकर केघल अपना शोर अनवाका समय नष्ट करना है ह॒म्म इस' घिंपय पर कुछ लिखने की आवश्यकता भी नहों समझते थे परन्तु ग्रन्थकर्ता ने इस प्रमाणकी अकात्य समझ प्रन्थके आदि ही में दिया है दस से संद्ोप से कहने की झावश्यकता समझ कुछ कहते हैं। इस उपनिषद्‌ के प्रमाण के हम असत्य नहों मानते कारण कि १२ उपनिषदों को थी स्थामी शंफ्रराचाय्य जो ने तथां श्री स्थामी दयानन्द जी ने शुद्ध और निर्दोष माना है। ग्रंथ को चार्ता असत्य होने से अन्य सी असत्य है|गा इत्यादि हेतुओं से उपन्तिषद्‌ की गाथा किसी फास पिशेष के विषय फो वशणंत करती है बहुत विधांए फरने से यह चिद्त होता है कि ऋषिकृत भंथों में जो नाम' झाते हैं वे उपाधि विशेषों के प्रतीत होते हैं। एक नाम के अखंख्यों पुरुष तथा री रष्टि में हो,चुके भौर होगे पदि चेदाउुकूल आयु का

( १४ )

प्रमाण माना जाय ते। १०० वर्ष की होतो है।येग, क्रिया के हाण' प्रिक्र से श्रधिक ४०० वर्ष पय्यन्त भी मानी जा सकती है। यदि पुराणों फे कथन के भी मान लें ते सतयुग में एक लक्ष को अवस्था बताई गई है यद्यपि यह कथन मानत्र शरीर की बनाधर देखने से सर्वथा ही असल है परन्तु दुंगन तोप' न्याय. से हम अभिक से अधिक एफ लक्ष फो माने लेते हैं। नारदादि ऋषियों की गाथा और प्रक्षा का पत्येक युग में किसी किसी प्यान पर आता पुराणों दी गायाओं से सिद्ध है। यदि ब्रह्मा के शैश्यरीय सृष्टि रखना को ब्रह्म विष्णु शिव इन शक्तियों में मानो तथ तो बेटे पोते प्रषेकादि नहीं बनते यदि ब्रह्मा के पुत्र पौषादि को माने ते कोई व्यक्ति .. विशेष माननी पड़ेगी। थरदि पुनः हु्जजतोष न्याय से ब्रह्मा के हम उसी शक्ति में से मान से तो नारदादि जिनका छतंयुग से . द्वापर युग पर्य्यन्त-सव युर्गों में आना देखा जाता है मेनुध्य देश भारियों से श्रतिरिक्त मात हो नहीं सकते। मंनुथकी धायु का प्रमाण ऊपर दम श्रधिक . से अधिक एक लक्ष ग्रंथकर्ता के मता- जुकूल घता चुके हैं। यह मान कि आ्रायु का हमें मन्तव्य नहीं में ते ( शतायुव पुरुष: ) ऐसा ही मानता हूँ | तव सी पएकरथुग से क्र्तों से ऊपर ही कही गई .है | मॉनवर्देदधारी का पंक थुग से. ' इसरे थुग पर्य्यन्त पुँचना असम्भव है। परन्तु जिन ऋषियों का बणैत छतयुग. की गाथाओं में आता है उनको हो प्रेता द्वापर कलि शादि युगो की गांथाओं में भ्रातां है | प्रन्ध कर्ता की प्रसन्न ता के अर्थ उन्हीं की मानी श्रायु भी एक युग से द्वितीययुग पश्य न्त- नहीं प्राप्त होती इससे यह निवि वाद सिद्ध होता है कि. में उपांधियों के नाम हैँ ।जिस कोल में जो न्‍्यक्ति 'उस उपा- थश्रि के योग्य धो दद उसी .नाम.से पुकारा जाय-। लोक . का व्येवद्वार किसी. फिसी रूपमे. सवंदां बना रहता है चाहे शब्द समय

( १५ )

ऐश से कुछ के कुछ व्यवहार में आने लगे, परन्तु ध्यवहार ज्यों का त्यें बना रहता है उदाहरण के लिये अ्रवलोकन कोजिये। यवन- राज्य में काज्नी मुल्ज्ञा उपाधियां विदित होती है ३००, ४०० चर के पूर्व ज्ञितफा अभियेग गया काजी के न्यायात्ञय में वा सुद्मानं ने किसी प्रतियेग पर व्यवसा दी, इतिद्ासें से यही विद्त दाता. है वर्तमान में भी लेफ़टिनेन्ट, चाइसराय, बोर्ड, कमिश्षर, कलमुर. ये अधिकारों के नामकरण हैं व्यक्ति विशेषों के नहीं। आप बहुत टूर जाइये सम्प्रति दो दयानन्द झरापफे समष्त उपस्थित हैं एक आय्यसमाज के जम्मदाता और द्वितीय श्रमंलभा के मन्तव्यों के प्रतिपादक श्ागें चल्लफर दोनों का विरोध उत्त समय की जनता का इस सन्‍देद भें डालेगा कि यहां तो दवानन्द सूर्तिल्एडन कर्सा, है और दुसरे स्थान पर मगइन इसी प्रकार सदा से अनेक नामों. में से एफ नाम के घनेक पुरुष होते चले श्राये हैं। उनके लिये विदा ब्रिचारे यद् दुठ फरना कि नहीं ये तो पेही हैं, विचारशीलों के थोग्य नहीं। विचारशील सल्लनों के विच्ारा्थ तो वत्तमान का. बग्यवद्वार बचुत कुछ सहायता देता है। भूत भपिष्यत्‌ कालो का समा-; ब्रश चत्तमान में रहता है ।वत्तम्रान फाल भूत शोर भधषिष्यत्‌ का, केसर है। भूत तथा मविष्यत्‌ वर्तम्रान केन्द्र ही से पीछे भौर भागे, को चलते है,। पिचारशील इस्त“पर पूग घान दें-तो भूत और भविष्यत्‌ देनों कॉलों के ब्ण्यद्वारों को इस्तामलकपत्‌ कर सकता है इत्यादि देतुओं से आप के दिये उपनिषद्‌ प्रमाण किसी झन्य' काल फी घटना विशेष दे इसमें हमें कुछ धक्तव्य विशेष नहीं, परन्तु, , भ्रापका यद सिद्ध करना कि अ्रथवेवेद का प्रा्ु्माव इसी अह्य के पुत्र अधर्वा पर शुआ है अथर्ववेद क्ले आपकी मनभिश्ठता प्रकर, करता है कारण कि अथर्षवेद जिसको अथर्वा और. अगरिरा, दताता है. चहू कोई. व्यक्ति विशेष नदीं। आपने अधये के. तो कई.

( ९६ ) पागयण करे ऐसा आपके” लेखसे' विदित होता है अ्थर्व ' ब्राह्मण गोपथ का भी दशा किया था नहीं? यदि काते तो ऐलसा' कंहने का साइस होता देखिये अश्रर्व का ब्राह्मत गेएथ कया कहना है। (आपो भूवद्वित रुपमापो भृग्वेश्धि रोप्रयस्‌ | सर्व मापे। " मय भूत सर्व भूवक्चिरोमय्। अस्तरे ते पये। शृग्बद्विस्सा5लुगाः) जल ही भृगु और अंगिरा रूप है। जत दी भृगु' अंगिरामय है। यंह सब कुछ जलमय दै ! इसीसे यह सद भ्ृणु अंगिरामय है। श्ृगु' और अंधिर के श्रनुकूल होने से अन्य ' तीन. बेदे भी एसी के अ्न्तर' ग॑त हैं। मन्त्र में मुठ और अगिर शब्दप्राह्ण फा अभिप्राय यद है” कि प्रह्मने सृष्टि रदा काख में ठलाठस रुप से समस्त स्थानों 'में परिपूर्ण प्रकृति को पूर्व तरल भाव कों प्राहः क्रिया। उस तरल' भाव को ब्राह्मण जलपंक्षा से प्रहण करता दै। उस तरज् भावषाली ' प्रकृति के! और छुद्म रूप वताने पर उसकी, परम सूदमावस्था के: भुणु और इल सूच्म को अपेक्षा स्थूल को अ्ंगिया कहता है। बहः व्यवहार लोक में अद्यावधि चला भ्राता है। स्वर्णक्ारादि स्वर्ण के' कुंएडलाएि पनाते समय पूर्व स्वर्ण के अग्नि के द्वारा तरल भाव: पाला करलेता है। मन्च मे सबके भुगु अंगिंरामय दताकर यहीं जताया है कि यह समस्त रचना सूच्म और स्थूल दो दशाओं से' परिपूरं है क्षयवा यूँ समझे। की भृगु सूर्य्य और श्रंगिरा चल्धमा' है। मुगु और अंगिरा शब्द से सृष्टि रचना के देश दी कारण दिखायेः हैं। एक शीत द्वितोय॑ डष्ण इसी के अदुसार प्रश्नोपनिषद्‌ कहती हैं. (रयिश्वप्राणधच) यह उपतिषद्‌ भी अ्थ्ववेद्‌ का दी है। छुशुताचाय्श' ऋंषिवर धन्वन्तरि जी चिकत्सा से' सस्पन्ध रखने चाले शांत अ्रथर्व को उपाज् (इंद खल्वायुवेदो नाम यहुपांगमथर्ववेद्स्थ'): बताते. हैं। उन्दोने'भी रचना के देही कारण' सुख्य माने है। एक शीत भौर द्वितीय उष्छे। ईनदों भाचायों की सस्मति पोपथके अलजु-

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कूल ही है तीसरा मर भी ब्राह्मण के श्रनुकूल ही जलन से सृष्टि मानता है अथव के उपदेश करा आधार रुप भुगु और अंगिरा हैं। आपने जिन मन्त्रों को प्रमाण में दिया है थे किसी विशेष काल का बरणुन करते हैं। आपके द्वितीय मन्त्र से हमारे पिछले कथन की पुष्टि तो होती है पर बह श्रापके मत को पोपण नहीं करता। आप के मंत्र का अ्रभिप्राय है कि "ब्रह्मा श्रथर्व के अर्थ देता हुआ और शरथर्वा उसकी अद्विरा के लिये कद्दता हुआा।अंगरिरा ने भारद्वाज्ञ के श्रथ कहद्दा भारद्वाज ने सत्यवाह के श्रर्थ, भारद्वांज ने पुनः अंगिराके लिये कहा |” वया श्रक्षिरा उसके भूल गया था जिसको पूर्व श्रथर्चा से पढ़ा था | मन्त्र में एक ही व्यक्ति का नाम दो बार आने से यह' विदित होता है कि एक नाम की श्रनेक व्यक्तियां कालन्तर में होती श्राती हैं जब जिसने जिससे प्रहण किया उसी समग्र में उसका चर्गान हुआ इत्यादि हेतुशं से उपनिपदुकी गाथा फ्रिसौ विशेष काल की है। श्रथर्व का प्रादुर्भाव इस प्रकार मानना चेद भर्मशों फी दृष्टि में अवश्य खटकेगां। अंग्रे जो आपने अंगिरा को प्रह्मा का पुत्र सिद्ध फिया और मु के खाक का प्रमाण भी उसमें दिया है, ये दश पुत्र भो ब्रह्मा के व्यक्ति विशेष नहीं प्रतीत होते, कारण कि प्रथम तो मनु रुष्टिस्‍चना के आदिकाल का वर्णान करता है। उस समय प्राणाधारं प्रजा की उत्पत्ति का समय नहीं,। दूसरे मन्तु की:संख्या से श्रगिरा तीसरा और मन्त्र की संख्या से चै।था देने से” प्रह्मा का ज्येप्ठ पुत्र नहीं रद्या | ज्येप्ठ का, प्रथम उल्लेख करना झसभ्यता है | प्राचीन आचार्य्यों ने इन मरीचि आदि दस संशा : वालों के देदधारी विशेष नहीं माना इनके गुण विशेषों से बायु माना है वायु की ४४-संख्यो ऋषिवरों ने मानो है। उनमें से सूच्मतरं,, सूदम और स्थूत्त ये तीन कक्षा बांधी हैं | सूच्मतर बांयुओ की आपि संझ है भोर सूच्मा की पितर एवम स्थूलो की अंखुर संशा

( 'श८ ) वांधी | बायु की इन तीन संक्षाओं से. सृष्टि में श्रनेक काय्य हो 'रहे हैं। प्रथम तो मंत्रु स्थयं ही इन ऋषियों से पितरों फी और पितरों से श्रागे अन्य स॒ह्टि की रचना मानता है। द्वितीय भारत के अद्विनीय पेदवेत्ता, हमारे मन्तव्य से परम पविच्ात्मा, मोक्ष से श्राकर धर्म को सब प्रकार मर्यादा बांधने वाले और आपके भन्तव्य तथा विश्वासानुकूल साज्षात्‌ ब्रह्म श्रीक्षएचन्द्र थोगिराज़ इनकी देह धारी व्यक्ति विशेष मांनते हुए वायु ही मानते हैं गीता में स्पष्ट कहा है कि ( मरीचिर्मरुतामस्मि ) मरुतों में मरीचि है।इस प्रमाण के समक्ष ये दूस आपके बताये वलह्ला क्रे औरसपुत्र पदञ्च भौतिक शरीर घाले कपूर हुये जाते हैं।दौड़े पकड़े, आपके लेख के बहुत से शब्द “बदतो व्याध्रात”-दोप से युक्त हैं।शआगे आप स्वयं ही कहते हैं कि इस श्रथर्व का रहस्य ज्ञानने बाला अह्मा का आखवां पुत्र वललिष्ठ हुआ है। पूर्व के सातें के मर्म चिदित नहीं हुआ मन्त्र में ते अंगिरा के अतिरिक्त वसिष्ठ के अधर्वचेद पढ़ाने का वशेनभी नहीं आया। इससे उपनिपद्‌ व्यक्ति विशेष का भहरण करनी है जो समग्र पर श्रुन्युक्त नाम चाले. हुए हैं। श्राप का मत इन मनन्‍्त्रों से पुष्ठ नहीं होता आप सत्यगुण का आश्रय लेकर विचार कोजिये, स्थयं स्प्ठ हो ज्ञायगा | भ्रथवं का प्राह्मण गोपथ स्वयं ही भूगु शब्द से ( वायुरायश्रस््धमा हत्येते भूगवः ) चायु, जल और चन्द्रमा को भूगु कहता है। आपने बेद का वहुत अनुशीलन किया है कृपया यह ते। विद्यारिये कि वेद संज्ञाओं का चूरन कर्ता है वा संक्षियों का महाशय | बेद में संज्ञाओं का वर्गुत है संक्षियों का नहीँ संशियों का वर्णुत करने से वेद के श्रवादित्व का पलायन होता है। किसी, व्यक्ति विशेष का वर्णन बेद-नहीं करंते। वेदों फा रहस्य जानने बाले ऋषिबर्स का यही . सिद्धान्त है। आपको ओी ऐसी ही'. व्यव्ां करनी ,चाहिये |बेढों के लिग्रे आप

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फा यद्द कथन कि “अ्रद्धभाग अथर् का “कहा है और दूसरा" आधा अंगिरा का” किसी प्रकार श्रद्ञीकार,केयोग्य नहीं। बेद ते ईश्वरीय घान माना गया है आपके बनाये शब्द कहने से ते। यह प्रत५द्च विदित होना है कि आप वेदों के ऋषियों का वनाथा मानते हैँ इल कथन को करते हुए विचार को नितान्त ही रसातल चा बेठे | इसका तांत्पय्य यह है कि शद्ध के लगभग तो भुंगु का वणन हैं ओर श्राश्र भाग मे आयु का चणुन विशेष है। आपका धन भी आपके पिचारों मे सन्देद्द उत्पन्न करता है कि कोई इल वेद की हिंसा होने से अ्रथव कहते हैं। क्या आप वेदों में द्विसा भी मानते है? बस्तुतः इस बेद्‌ का अथर्वा नाम इस कारण रक़वा गया हैं कि थर्व धातु चलने श्रर्थ में है। जे शान कभी अपने खरूप का परिवर्तन कर स्वद्ा निश्चल रह उलको धर्व कहने हैं! यदि विचार कर देखा जाय ते और तोन हेंदों के नाम गोण है।यह अयवब नाम गौण नहों। वेद ज्ञान की जो सत्यता है उसी से इसका नाम अश्रथवंचेद' पड़ा है | इसका दसरा नाम ब्रह्मदद भी है | श्यपक सूक्ता के नाम धरन से विदित होता है कि आपने मन्‍्ना को अनक सूक्ता में काट छांट कर अपनी छानुकृल कटपना किये हैँ। इस बात का पता तब लंगेगा जब कि बह आयेगे | आपके इतने प्रकरण में इतने ही विपय बिचार गाय थे शेप इसी के श्रन्तर्गत हैं उनका विचार भी हमारे. लेख में , श्रागण है सत्ञन ध्यान पृथक विचारेंगे तो केवल ध्रथववेदा लोचंन का उत्तर ही नहीं मिलेगा श्र - भी अपू्च ,विचार ,.हस्तगत होंगे। यह इतना वर्णन पृष्ठ पांच - पर््यन्त ' है आगे प्रत्थकर्ता' के दूसरे क्रथन पर विचार-हागान।. . “५; [ जाक्ति३ | वेद सत्य विद्योश्रोही पुस्तक ५-१ सत्येके प्रहण और श्रेसेत्य

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के छोड़ने में सदा उच्चत, रहना चाहिए २॥ सब काम सल्यो- सत्य फो विचार फरने चाहिये २॥ सावजमिक इन तीन नियमों के श्राधार पर भारतवर्ष का ' प्रत्येक विद्वान अपने सिद्धान्त को सिर कर सकता है। विद्वान को किसी का एक्तपांत नहीं करना चाहिये। चेदों फा विज्ञोर करना चाहिये | शरीर बेद प्रतिपादितधर्म का ही निःशदर हो कर प्रचार करना चाहिये | [ प्रेत्युक्ति: ] पअन्थकर्चा फा पूर्वोक्त लेख जो उन्होंने तीन नियमों का लेकर दिया हमें से।लहों आने मन्तव्य है | इसमें वक्तव्य विशेष की श्राव॑ श्यकता नहीं | केबल इतना कहे देते है कि इस प्रकार के लेख दसरों को बांधने के श्र्थ ही लिखे गये हैँ। खर्य प्रन्थकर्ता का श्राचरण उन पर होता हुआ ग्रन्थ में नहीं पाया जाता खकथन के विपरीत अ्यवदहार कथन को श्रसत्य कर देता है यह चाचक वृस्द्र को आगे , चलकर विदित हो जायगा | [उक्ति: | आजकल समाज में कुछ ऐसे भी पुरुष हैं जो अ्रपनी बुद्धि में मन्द्ता के कारण श्राये हुये किसी गम्भीर विषय को प्रत्षिप्त अथवा गएप कह कर टाल देते हैं परन्तु यह वात श्रोचित्य विचार से वहुत दूर है। जिन पुरुषों ने वंश परंपरा से भी वेद नहीं देखे - वे यंदि गम्भीर वैदिक विपयों का सर्वसाधारण के समक्ष उंपहास करे ते विद्वान इस अ्रनधिकांर चेष्टा का कहां तक सहन कर सकते हैं। इस लिये श्रब हम यहां पर कुछ ऐसी बातें बतलाना चाहते हैं जिनका वेदों में वारम्घार धर्गान आता है और बाबू पार्टी के नास्तिक समाजी जिनकी मानने के लिये तयार नहीं है। -

(२१ ) [ प्रत्यक्तिः ]

इस लेख से यह विद्ित होता है कि अन्थकर्तता ऐत्रिहासिकु विचार से यह लेख नहीं लिख रहे, किन्‍्हीं व्यक्ति विशेषों की ओर कटाक्ष है। ऐतिहासिक विषय, यह सिद्ध कर रहा है कि ऐसे पुरुष स्वदा सब समुदायों में ओर सब कालो में देते आये हैं कुछ भाजद्नि परही यह लांछुत नहीं दिया जा सकता। और साथ में ही यह : कहना दि बुद्धि की मनन्‍्दता के कारण गम्भीर विपयो की दाष्प था प्रत्तिप्त बताते हैं से चेद को मानने चाले के बेद के विपय में ऐसा कहना श्रनुत्चित है | हां साथ ही में यह बात कही जायगी कि इसमे कुछ देप बक्ता को भी है। कहा भी' है ( वक्तरेवहि तज्ञाड्यं यत्र ' श्रोता बुध्यते ) वक्ता को अपना वक्तव्य इतना एपष्ड करना योग्य हैँ कि जिससे सुनने वाला मन्‍्द से मन्द धुद्धिवाला भी समझ ले यह ते आपको भी स्वीकार है कि उनके बंशपरंपरा से वेदों का अध्ययन नहीं हुश्ां। (हमारे अनुभव से यह विदित होता है कि ढ्वापर के पश्चात्‌ फेवल वेदों का अध्ययन उन वबंशे में भी नहीं हुआ जिनके वेद लतस्व रहे है, इतरजनों कां तो कहना ही क्या है) यह दूसरी वात है कि किसी संस्कृत के विद्वान ने आवश्यकता पड़ने * पर ब्राह्मण का काई स्थल देख लिया हे परन्तु मन्त्रभाग़ के क्रिसी मनन के बिना भाष्य देखे अथ करने की गति, दुस्‍्तर थी। इतने अंश में ते स्वामी दयाननन्‍्द्‌ के हम ऋणी ही रहेंगे। चाहे और उपकार उनके हम माने वा माने यह हमारी कृतश्षता के आधीन हूँ। जिन पुरुषों को श्राप आश्यंसमाज में होने से यह लांचन देते है कि वेदों में कहे विपयो को-नहीं मानते, नांस्तिक' हैं; यह दोप प्रथम तो सत्र पर नहीं घंढे सकता, फास्णु कि सब में सब- प्रकार के पुरुष होते हैं। यदि यह देप किन्हीं पुरुषों में हैः ते वहः दैष उन

( २२ )

व्यक्तियों का नहीं, यह दोष फेचल पाखात्य विश्वाध्ययन फा है इस विद्या का पठन पाठन करनेयाले प्रायः सभो समाजा में वाह स्येन हँ'गे। इसी प्रकार के ग्रन्थकर्ता के कथन पद्चयुक्त माने जात है यदि प्रन्थकर्ता अपने लेख में यह खिखते हे कि श्राजदित पाश्ा- ह्मिद्ाानों की शिक्षा पाये हुए कुछ पुरुष 'भारत में एसे है थी दीया होता, घापने ते समाज दी पर यह श्रान्नेप लगाया, यह द्रप है। द्वेव विद्वानों के। शोभा नहीं देता। हमें विशेष दोप अस्थकातों छा ही प्रती दैता है। आपकी कथनशैती दस प्रकार के लिये हुए हैं + नास्तिक तो :नास्तिक श्राक्षिकों के मी सन्देद हालती है | इसका पता श्रागं के कथन में लगेगा।

[ डक्ति;]

पहिली यात उनमें स्वर्गलेक का वर्गाव है। ( सहदाएवीन इसः स्वगों लोकः ) ७। ७। ऐतरेय ब्राह्मण के इस प्रमाण से दख भूलोक से एफ सहस्र श्राश्वीन सुवर्लीक के श्रन्तरं स्वर्गलोक विद्य मौन हैं. इस वात की सभो आवार्य्य मानते है। और भूमेवः स्तर इन तांनों लोकों का श्रनेक ग्रंथों में बन है। इन के ही त्रिविष्टप, ब्रिदिव, नाक, देवलोक शादि नाम से। विद्वान कहते है। (अश्यस्येकाह * गम) १।१। ६६ इस पाशिनीय सूच के श्राधार पर एक जबान तगड़ा घोड़ा एक दिन में जितने मार्ग फो तय करले उतने का एक आशबीन कहते है। इसी प्रकारके सदस्न श्रश्वीन यहांसे स्थ॒र्ग हे

[ मत्युक्ति: ] प्रेदों की उन बहुत सी वार्ताओं में जिन पर नास्तिकों को

विश्वांस करते नहीं बताते, पहिली वात यह संवर्ग की है। जिसमें प्रक प्रमाण ऐतरेय ब्राह्मण का है श्रीर आएवीन का मान निश्चित

( ९२३ )

करने के अर्थ पाणिनीय सूत्र का प्रमाण है। इस लेख में नारितिंत ते ब्याज मार है, मुख्य कटाक्ष प्रन्थकर्ता का यह है कि “स्वामी देयान॑न्द यतिवरने मनुष्य 'के खुख दुख भोगने के अथे कोई खान विशेष नहीं माना |? उनका विचार ता इस लक्ष्य के लेकर है कि कर्मानुसार जो सुछ्दुःखादि जीवों को भोगते पड़ते है, वे सत्र पृथिवी पर ही भागे जाते हैं ।-अन्य कोई ऐसा साव विशेष नहां कि जहां जाकर मनुष्य खुखदुःख।दि भोगे। कारण कि खुल दुख दोनों परस्पर विशोेधी है, खुख का भान दुः्खों को देख कर और ढुःखों का भान सु्खों के देखकर होताहै | लेक के व्यवहार में भी यह प्रमाण मित्रता है | एक नियूती स्री सपूती को देखकर वा झुनकर अपने निपूती होने का कष्ट मान सकती है और जहां सभी अपुत्रिणी हो वहां किसी के वंया दुःख ? नेन्नहीन पुरुष नेत्र वालों . से रूपादि की प्रशंसा सुन अपनी नेन्रहीनता का दुःख माने, ऐसा सम्भव है| और जहां सबही नेच्रहीन हो वहां क्या ढु-ख होगा? इस व्यवस्था का जो स्वथा मानने योग्य है और इसी के! सदा से विद्वान मानते आये हैं, लद्यमे घर यतिचर स्वामौद्यानन्द का कथन है। जिन भूभू स्वः के को का वर्णुत अन्थो में है और वे पृथ्िवी से लेकर युल्लोक पर््यन्त की कक्षा मानी गई हैं उनके विषय में यतिवर का कथन नहीं है। प्रथम तो ब्न्थकर्ता को वक्ता का आशय समझ कर कहना था, यदि आशय को समभाकर ही कहना इश्ट था ते अपना ही प्रमाण ऐसा देना था कि जिससे अपनी इए्ट सिद्धि होती परन्तु ऐसा नहीं किया गया अब दम थ्न्थऊर्ता के स्व की खोज बररते हैं। देखिये क्या रहस्य वाचकबुन्द के हस्तगत होगा ग्रन्थकर्ता ने केवल्न इतवो ही बताया है कि भूमएडल से एक सहस्न आएवीन प्रमाण स्वर्गलेाक है परन्तु यह नही बतांया कि सृत्यु के पश्चात जीब बहां जाते हैं या ह्या होता है सात

( रश४ )

लिया हमने, घह भी श्रन्तरित्ष की एक कक्ता विशेष है इतना मान लेने मात्र से फ्या फल ? यो ते इस पृथिवी पर एक' की श्रपेज्ञा इसरा देश शुद्ध है, जैसे हमारे रहने के खानों की: श्रपेत्षा शिमत्रा नेनीताल मंत्री और श्रागे चल कर हिमालय का' बद्रिकाश्रम बड़े उत्तम स्थान है| परन्तु इस कथन से फल नहीं प्रभात दाता जब तक कि हम इन देशों के गुणविशेष झ्रोर लाभ प्रकट कर | श्रपने स्वर्गलाक की दूरी वताकर यह नहीं बताया: कि वहां क्‍या २छाता है। यह हम नहीं कहते कि ऐतरेय फा फथनः असत्य है। जाने किस विपय के लक्ष्य में घर यह काद्दा गया है ऐतरेय प्रन्थकर्ता का यह आशय प्रकट नहीं हाता जा आप करना चाहते हैं। कारण कि मान बताने की शावश्यक्रता उसे होती है जे। स्वय' किसी स्थान पर जान की इच्छा करे था किसी यानादि द्वारा ज्ञाय | आपके वताये स्वर्ग में यदि हम मनुणों का ज्ञाना मान भी ले ते यह मान उनके क्रिस काय्ये का ? रथ घोड़े हाथी पर नहीं जाते, अपने पैरों से नहीं जाते। मच्यु के पश्चात्‌ ईश्वरीय व्यवस्था से जाने किस प्रफार जांते होंगे। जब उनके जाने का मार्ग था यात्र हमें विद्त नहीं तो उनके श्रर्थ मार्ग का प्रमाण बताना कैसा ) भार्ग' बताने बाले के यात्राके अर्थ मार्गकी सभो श्रड़चने' निपटानी पड़ती ' हैं। जैसे काई कहें कि भाई अप्ुकखानपर जाओ ते अम्ुक दिशाको' और अमुझ स्थान मार्ग में आयेंगे। आपके पेतरंय दो प्रमाण में जाने की दिशा शोर मार्ग में शान वाले अन्य लोकी का वर्णुत नहीं ' है। यदि काई धनी वहां जानेका साहस करें ते किस यान से और किस दिशाका जाय ? यदि कहे कि यहां के जीव चहां नहीं ज्ञा सकते तो उन के लिये मान बताना भी व्यर्थ हे। इत्यादि हेतुओं से यह' ' बिद्ित नहीं होता कि ऐतरेयम खर्गका मान इस लक्ष्यकी लेकर बताया “गया हे जो अर्थ आप लेते हू वहां कुछ और ही आशय होगा

( १४ )

सावधानी से पुनः श्रवलोकन .करो शीघ्रता | में देख गये हो यह मान ठीक नहों है, एक अनुमानिक मान है। एक घोड़ा एक दिन में जितना मार्ग चल सके उतने को एक आश्वीन कहते हैँ प्रथम

घोड़े के चलने का प्रमाण नहीं श्रापने एक तगड़ा घोड़ा लिखा है घोड़े का तगड़ापन और है और चाल श्रौर है। बहुत से बलवान प्रोड़े भी चलने में मद होते हैं, बहुत से ढुबले पतले चलने में अच्छे होते है फिर यह भाव नहीं खुलता कि ऐतरंय ब्राह्मण एक सहस्न श्राश्वीन क्रोश मांनता है था योजन मानता है। क्रोश ओर येोजन में १--श्रौर ४७--का श्रन्तर है इत्यादि बहुत से दाप श्राम से ऐतरेय का फथन आपके कथन की पुर नहीं करता | लाक के श्रोर विद्वानों कां मन्तत्य देखने से भी यह पता नहीं चलता श्रन्य विद्वानों ने मोक्ष सार्ग के श्रतिरिक्त और खर्गादि फो नहीं मावा श्रन्य ऋषि सुनियां का मत देखने से विदित द्वोता हैं कि ये भी इसी लोक के! स्वर्ग नरक मानते हैं। श्री कृष्णचन्द्र जी महाराज येगमार्ग से मोच्च का मानते हैं। और यह भी बताते हैँ कि यदि योग किन्हीं कारणों से भ्रष्ट सी द्‌ जाय तो मृत्यु होने पीछे बे जीव (शुच्ीनां भ्रोम्तां गेहे ये।गग्न छो$ भिजायते ) इसी लोक में विद्वानों और धनियों के ग॒द्दों में जन्म लेंगे। , आपके माने स्थग में जाने का वर्णन नहीं। वात भो ठीक है दीर्- दर्शी बुद्धि में आने वाली वात को मान भी कैसे सकते हैं। यदि इस जन्म के किये पुएय पापों के भोगने के खान अ्रन्यत्ष दोते तो यहां सुर्खो तथा हुःखों के सोगने से कया प्रयोजन था| यह तो यव- नमत के दोज़ख़ ओर बहिएत हो गये रही यह बात कि कोशें भें इन देशों; का सास त्रिविएप आदि दें। चुलोक में प्रकाशमात नक्षत्रों को देवुनाम, से कद्दा गया है।इससे उनको देव शब्द से; प्रहण कर उन, लोको, की. ये संशा बांधी, गई हैं ।इसप्रे भ्रुतिप्रमाण *

( २६ ) ; है। ( बातो देवता चन्द्रमा देवता ) यें सब देवता हैँ इनका. निर- न्तर घांस होने से ही उत्त स्थानों का नामे कोशों में, त्रिविष्टपादि रत्रसा गया है। आप जैसे पुएयात्माओं के जाने से नहीं | श्राप चाहे झितना वत्न लगाये, यतिवर का सिद्ध पक्त श्राप से कट नहीं सक्ता। यू तो स्व का श्रर्थ सुख विशेष है। बुलोक में पार्थिव्ररज के परमा- खुओं फ़ा समावेश स्यूनता और शुद्धता से होने पर वहां'रोगांदि का होना न्यूनता से हो। परत्तु यह मान फर उन स्थानों के संतर्ग , मानना क्ि वहां पुरयात्मा जीव जाकर कुछ काल रहते हू बुद्धि में शाता कड़ित है। यदि यह कहो कि हां दुःख नहीं ! इस थात को पुराण सिद्ध करते हैं कि वहां इसी लोक के समान दुःख है। पुराणों, में स्वर्ग, और मो्ञ की तुलना करते हुए काहपनिऋ स्थर्ग के छुत्र वर्णन करे हैं।