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भू[्तवर्ष के मुसछमान बादझ्षाहों मे अकबर के जैसा पर्जाप्रिय बादशाह आर काई नह हुआ इस महान सुगछ-सज्चनाट के राज्य-चातुद आए विद्यार-आदाय से शिक्षित जनत्‌ सम्यक तया प- रिचित है। इस के ऐश्वयेशाली और घतापयान बन का थाड़ा बडुत परचय मारत के अन्यक विद्यार्थी को अवश्य कराया जाता है। इस अहान नुपात के उदार-हृदय-मेदिर मे दया-देवी की दाध्यत स्थापना करन के लिय, देश्ची के परम-उपायदः और जअनवेतास्यर संअदाय के अभावक आचार्य श्रीह्वरविजयर्साण के छपनिप्ठित विद्वान शिष्य श्रीशान्तिचन्द्र उपाध्याय ने, कृपा-करुणा रूप #स्-असून के कोश-निशि समान इस " कृपारसकादा " की स्मणीय चना की हे | अकवर के समान श्राहरावजयसूरि का भी जीवन, धार्मिक-दर्शिसि, बरड़ए पश्चयदान्टा! और नज्ञामय था। विद्वानों का खलमसुदाय सूरिम- हाकाज़ के पतच्ित्र आअश्विस भी बहुन कुछ परिचित हे-नहीं ते हाना चाहिप !

बादशाह अकबर के आर आचाय॑ श्रीहीरविजयजी के चरित्र के विपय थे अधिक उल्लेख कर्ने की यहां पर अगद नहीं हा ता शी अस्युत पुस्तक क--कृपारस-काश के--साथ संबंध सखन घाले शसि हाख का 7 आस्ताविक कथन ' कह बिना पाठकों को इस दया स्ख के खुदरा सरावर का मंद आर मचुर लहरों का पूर्ण आनन्द नहीं सकता; इस लिये, इस्त शीर्षक नीचे वही लिखा जाता हु!

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अगदरकाव्य॥# मे लिखा है कि---अकवर बादशाह एक दिन

कलहपुर के शाही महल में बैठा हुआ राजमार्ग का निरीक्षण कर

रहा था| इतने मे एक बड़ा सारी जुल्दख उस की नजर नीचे हो कर निकला जिस में एक ख्तती झुन्दर वसख्य पहले हुए आर फल्द- फूछादि के कुछ चाल सामने व्यू हुए, पालखी मे सवार ही कर जा रही थी। बादशाद ने यह देख कर आपने नोकरों से पूछा कि यह कौन है और कहां पर जा रही है ? जवाब में नौकरों ने अजे की कि यह काई जैन श्रीमनन्‍त श्राधिका+ है जिसने छः महिने के कडिन उपवास किये हं। इन उपयासो में केवल गर्म पानी पीने के खिदा--सो भी दिन ही में--आओर कोई भी चीज सुंद में नहीं काली जाती हैं आज जेनचर्म का कोई त्योहार ( पव ) हे इस लिय, यह

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कुछ सत्य प्रतीय इुआ था वा | लिये उस ने बाई को अपने ही किसी घकांत आजा दी | साथ में विश्वास नीकरों हि की दिनखाथों का बड़ी सावधानी के साथ अवलोकन किया जायें और यह कया खाती-पीती है इस की पूरी तलायस ली जायें। काई महिना डेढ महिना इस तरह की ऑॉच-पड़ताछ कण्ते निकल

# यह काव्य, श्रीहारविजयसूरि अकबर के दरबार से वाफ्ता छोट कर जब गुजरात की ओर रहें थे, तब उन के आगमन के समाचार का सुन कर पंडित पहासावरभार्ण ने, काटियावाड के सेंगलपुर ( आांयलोर ) में---सवत्‌ १६४६ के भास पराध्च---ृवच कर, सरिजी को भेंट के रूप में क्पण किया था |

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के इस का नाम अन्यान्य प्रबंध में * चंज ? छिखा हु जोर क्षठ थानातइ, जो अकबर का आान्य साहुकार था, के पराने में से बताई गई हे

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जया, परंतु उस तपल्विनी की विशुद्ध दलसि में किसी प्रकार की दंभती का स्वप्न भी आया। यह जान कर अकबर के आश्चर्य का पार नहीं रहा | बह उस भाविका के पास प्रेम पृर्धक जाकर, प्रभाम के साथ बोला कि- है माता + तू इतला कठिन तप क्यों और कैसे

कर सकती है? तपश्चिनी ने केवल इतना ही उत्तर दिया कि--

महाराज ! यह तप केचल आत्महिन के छिये किया जाता है और साक्षात्‌ धर्म की मूर्ति समान महात्मा हीरविज्वसूरि जैसे धर्मशुरूओं की सुकपा का एक मात्र फूल है। बाददाह ने अपने अपराध की क्षमा आग कर अच्छे आदर के लाथ उस तपस्चिनी भ्राविका की अपने स्थान पर पहुँचाया | अकबर बड़ा सत्यप्रमी और तस्वरलिक था। इस लिए वह कया हिंदु और क्‍या सुसलमान, कया खीसती और कया पाश्खी: सभी धर्मों के काताओं का अपने दरबार में बुलाता और उन के घम और तत्व शान के विषय मे बहुत कुछ नाना अकार कू प्रश् कर अपना शान बढाला था। जो बाने उसे ठीक लगती उन का स्वीकार भी करता था हीरविजयसूरि का नाम झआुनते ही जुले, उन से मिलने का अवसर सडि महाराज के विधय में बादशाह ने अपने अधिकारियों से, वे कैल और कहां पर ग्हा करते हैं, इस धार में पृछमाछ की | #इविमाद खान-आ जराती-- हे अपने गुजरात के अधिकार कान्द में, सूरिजी से अनेक धार मिला था और उन के पवित्र जीवन ले बहुन कुछ परिचित था--से बादशाह से सरिगाज के सर्वध मे विदा बाने कहाँ; तथा उन का विहार स्थान, जा अधिक तथा शुज़रात था, बतायाहड अकवर ने

# इतिमाद खान, इ० स० १५७४ से १४०२ तक, गमजरात के सुझ्तान अइमदशाइ हे जार मुजफूर शाह रें के सम्रय में, गृजरात के राज्य-हरर्य में अम्रमण्य अमीर था | इक सुक १५८३-८४ में अकबर ने फिर भी इसे गभुज- दांत का सुबदार बचाया था गुजरातनों अर्वार्चान इतिहास, ) < सदा झुदा तत्पद्पह्माचट्पदा 5 लिप्रेलखानः दुभयीरदी5वदन |

इंहा 5क्लि दास्लाहुतिशमवाण शती महामनिहीर इति वतिश्रश्युः | -+विजयश्रश्नस्ति, १०-९५ |

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उसी समय मेवहा जाति के मादी और कमाल नाम के अपने दो खास कर्मचारियों को बुछा कर, अहमदाबाद के तत्कालीन सचे द्वार शर्बनर ) शहाबुद्दीन अहमदबस्यीं के नाम पर एक फरमान पत्र छिख कर, गुजरात की ओर रचाना किये | इस फरमान मे बाद- शाह ने सुवेदार की यह लिखा था कि-जनाचार्य श्रीहीरबिजयरुरि की, बड़े आदर के साथ अपने पास-( दग्घार-ए-अकपरी में ) मेज दै। शहाबईान ने यह फरमान पाते ही अहमदाबाद के प्रधान प्रधान जन आावकी को अपने पाल चलाये ओर उन्हें अकवर का चह फर- भान दिखा कर सूम्मिहाराज़ का, फतहपुण जाने के लिए घार्थना करन की, आज्ञा दा | सब्सि उस समय गधार-बंदर ( जा भरूच जिले मे, खमात का खाई के फकिनाश पर, चसा हुआ आर आज कल वरान पढ़ा हैं ) भर चातुमास रह हुए थे।॥) इस छलिय आवक छोक गंधार पहचे आर अकचर के आमंत्रण का सारा हाल कह खुनाया। साथ में, अपनी आर से यहां पर जाने की प्रार्थना भी की। सहेमदहारालन सोचा कि अकथर बड़ा खन्य-पिय हे इस छिए उस के पाल जाने से और सदपदेदा देने से च्दल कुछ छाम है। सकता | घर्स की ख्याने के साथ देश की भलाई भी हं। सकती हैं। यह घिचार कर, सरिजीन श्राचकों की आशना स्वीकार को जाश संवल १६३८ के मरा्गशिर वाद के दिन शंधार बंदर रू प्रस्थान किया। अहमदाबाद के शावक्र छोक खू- रिज्ञी के साथ ही चन्द। सूसर्मिदहाराज़, अपने मुनिधर्मानुसार, नंगे पवि-पदलछ ही चलते थ। संधार ले चलकर, महँ नदी को पार किया आर +चटददन्द ( जिसे आज्ञ कल वटादरा कहते है) नामक गांव में पहई च। यहां पर खेमात ( जोकि निकट ही था) का जन समुदाय सूरिज्ञी के दशेनाथे आया। दी चार दिन ठहर कर सूरिज्ञी ने आगे ध्रयाण किया और धींडे ही दिनो में अहमदाबाद + ऋमाड़ चटदले फुलाम्माज शड़ इवागमन | स्तमतोथस्य मह्वन तस्मिस्यभुरवन्धत हीरसाभाग्य, सं. ११, ह्छ, १०९ |

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पहुंचे अहमदाबाद के छोका ने उन का बड़े आरी समारोह से नगर # प्रवेश कराया | शहाबुद्दीन ने सूरिज्ी का शहर में आये सुन कर £* आद्र के साथ उन्हें अपने शाहीमहल में चुलवाये | बहुत से हाथी डर घोड़े तथा हीरा, माणिक्य, मोती आदि बहुमूल्य चौजे ,सूरिजी को & भेंट कर चोला कि--/ है साधु महोदय / मुझे अपने स्वामी * ( अकबर ) की आज्ञा है कि--- हीरविजयसूरिजी की जो कुछ चाह वह भेट कर उन्हें मेरे पास आने की प्रार्थना करें। इस छिये आप इन चीजों को के कर जिस तरह बादशाह मुझ पर खुश रहे धसा कीजिए | सर्गीब्बर ने अपने सुनिजिवन का परिचय देते हुए खो से कहा कि-- रक्षामी जगदड़िनों थे सृपावाद बदामः कचि- जादत अहयामहे सृगदर्शा अन्धृभवामः पुनः

आादध्यो परिधरह निशि पुनर्नाश्वीमदि अमदे

ज्योतिष्कादि भृषणानि ने वर्य दष्मी रवतानवृतान्‌

दौरसौबास्य, ११ सगे, १९० छोक |

» हे जप ! संसार मात्र के प्राणियों की हम रक्षा करते हैं, कभी भी झूंठ नहीं बोलते, किसी के दिये बिना हम कोई चीज हाथ मे नहीं ते, जगत की सभी खियों के हम भाई समान हैं, खुन्ा, सदी, हीरा आदि बहुमल्य वस्तु का हम स्वीकार नहीं करते,न कभी गत को कोई चीज मुंहम डालते, किसी आभूषण को छूते हैँ और नाही, अपने निर्वाह या क्‍्वार्थ के कारण मंत्र, लत या सतादि बताते है। फएसली दश्शाम तुमारी भेट की हुई इन चीजों को ले कर हम क्या करे? खा, सरिजी के इन कठोर नियमों का हाल सन कर खकित हुआ अर बहुत बहुल उन की धरशला करने छूगा

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एवं तेन तदीयमद्गलमटः सम्यक्‌ स्वर्व प्रापिता वाद्याडम्वरपृर्वेक निमगृहात्‌ साध्वाश्रमे प्रेषिताः ॥| जमहुठद्ध काव्य, २०९ |

ये साधु महादय निःस्पृद्चियो-त्यागियाँ में शिरोमाणि और सा- क्षान खुदा की सूर्ति है। इन के जसा स्यागी महात्मा आज़ तक कहीं नही देखा | इस तरह का विद्वार कर खतरों ने, अपने सेनिका के साथ, शाही बाजी के बजने हुए, सूरि महाराज कं, स्वस्थान पर भहुचाये |

कुछ दिन अहमदाबाद मे ठहर कर, जा दो आदमी अकवर का फरमान ले कर ऊाये उनन्‍्हा के साथ सूरिजी फतहपुर की नफ प्रयाण किया+ | रास्त मे सबसे बड़ा दाहर पहले पदन आाया। यहां पर सृज्जी के बड़े सहाध्यायों और प्रखर पंडित उपाध्याय श्षीघरम- सागरजी तथा घधान पदुचर अंधविनयसंनसर आदि विशाल साचु- समुदाय सरिजी के दशनार्थ उपस्थित दुआ | एक श्राविकाने इस शुभ प्रस्रण पर हज़ार रूपय खूले कर बड़ा भारी उत्सव किया और कुछ जिनप्रतिमाये सौश्जी के हाथ प्रतिष्ठित करण पढद्न मे कवल राज ठहर कण सरिमहाराज़ आगे चले घर्मसागरजी उपाध्याय की संघ की संभार रन के लिये यहाँ पर उकखे गये विजयसेनसारि, लिझपुर तक सारिजी की पहुंचान की गये आर बाद में घापस छीट | खिद्धपुर में, इस रूपारलकेाश के कर्ता शॉतिचन्द्र पंडित सूरिज्ञी की मव्रा में हाजर हुए जिन्हें अतियाग्य समझ कर सूरिज्ञी ने अपने साथ मे छिय। महापाध्याय क्रीविमणह पगणि, जो गंधार ही से सूश्जी के साथ थ. उन का अपने पहछे अकवर स्प मिलन के लिय जल्दी के साथ, आग रखाना किय | सारिजी धीरे शीरे! चलछत हुए सरोतरा झाम में पहुंच यहाँ का ठाकुर अज्ञुन, जा बडा डाकू था, साग्जी की अपने मकान पर ले जा कर उन का

+ सूरिशजा5थ संप्रस्थितस्तत्पुरास्मेयडाश्यां पुरोगाशुकास्यां युतः >> हीरसेीसायय, १२-०१

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खूब आदर-सत्कार किया। सूरिजी ने उसे मीठा धर्मािपदेश दिया जिस से उस ने शिकार वगैरह कुब्यसना का सर्वथा न्याय कर' दिया सारजीआवू--पहाड पर के अखिद्ध मंदिरों की यात्रा कर सिरोहा पहुं चे। यहां का गाज़ा खुलतान-सिंद बडे समारोह के साथ सूरिजी की पेशवाई में सामने आया और सारे नगर की खूब अच्छी तरह सज्ञा कर खूब घूम-धाम से आचाय- महाराज का उवेशान्ल कराया। कुछ दिन ठहर कर सिरोद्दी से आशज्ाय महाराज सादडी नगर की पह महापाध्याय कब्याण- विज्ञयजी ऊं। दक्षिण की आर विचरन थे, सरिजी को फतहपुर की तरफ जाते खुन कर, यहां पर दशनाथ हाजर हुए यहां सर गमन कर सून्जी राणपघुर के घर्णावहार की याजा कर आाउआ नामक स्थान में पहुंच | इस गाँव का सालिक जा ताल्‍्हा सूट था, उस ने आईउंचर पूर्वक सूरि जी का शाहर-अंबशा कराया। जितने आदमी सर्जी की अगवानी में गये थे उन सब को, ताल्‍्हा लठ ने एक एक पिराजी खिक्का-जी उस समय वहां पर रूपये की जगह व्येयट्टार मे छाया जाना था--भट दिया करयाणावजय उपाध्याय, जा खादडी से यहां लक आचाय महाराज को पहचान आये थ, वापस छोटे आडउआ मल चलन कशभू कुछ ही दिन मे सब्जी मडला नगर की पहेंलछ। यहां का सुल्तान खादिम संग्जी का पणवाई से आया। विमलहप उपाध्याय जिनकी सृरिज्ञी ने, शिद्धपुर सर, अपने पहले अकवर स्ते मिलन के लिय जाग मजे थ., किसो कारण चवद्ा यहां पर ठहर हुए थ, आचाये सहाराज़ से सित्ठ नागौर आर बीकानेर शहरों के संघ सरिज्ञी का चंदन करने लिय आय विमलहप उपाध्याय का सरिजी ने आग जाने की आज्ञा दे कर पंडित सिहविमलगणि साथ, जल्दी से रवाना किये और आप चीर*े घीरे वहां मे फलहपुर की तरफ बढ़ने नवग! सूरिमहाराज रांगालेर स्थान पर पहुंचे जितने मे तो उपाध्यायजी जकवर की आचायेजी के आगमन की सूचना दे कर वापस आये और सूश्मसिी की सवामे दास्खल हुए

बादशाह को सस्मिहाराज के सांगानेर पहुंचने की खबर मिलते

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ही तुरन्त उसने थानलिंह, अमीपाल और मानू शाह आदि राजमान्य जैन साहुकारों को आज्ञा दी कि--सूरिमिहाराज़ की अगचानी बडे भारी ठाद-पाट से की जाय | बादशाह का हुक्म होते ही बड़े बड़े अफुसर और घनाढ्य जैन अनेक हाथी, घाड़े, रथ और फौज के कर सूरिज्ञी के सामने सांगानेर पहु चे। सूरिजी उन के साथ साथ फतहपुर के पाल पहुंचे और शहर के बहार जनमछ कछवाहा के महल में उस दिन ठहर कोई क्ः हिने की मुसाफिरी कर, संचत्‌ १६३५ के ज्येष्ट चदि १३ शुऋवार के दिन सूरिजीमहाराज फतहपुर पहुंचे दूसरे दिन सबरे ही अपने विद्वान और तेजस्वी शिष्यों के साथ सरिज्ञी शाही दरवार भे गये। इस समय मुनीध्वरजी के साथ-सैद्धान्तिक-शिरोमणि महोपाध्याय भ्रीविमलह चर्गणाणि, अशो- सग्शतावधान विधायक और अनेक नृपमनरंजक श्रीशांतिर्चंद्रगणि, पण्डित सहजसागरगाणि, हीरसौभाग्य-महाकाव्य के करता के शुरू अऔीसीहविमलूगाणि, वक्‍तृत्व और कारवित्व कल्प में अद्वितीय निषुण तथा विजयप्रशस्तिमहाकाध्य के रचयिता पंडित श्रीहिमविजयगाणि, वैयाकर चुडामणि पंडित साभविजयगणि और सरिजी के धधान- भूत श्रीघनाविज्ञयगाणि आदि १३६ प्रधान शिष्य थे। थानासिह ने ज्ञा कर अकबर कं सूरिजी के दरबार में आने की सूचना दी बादशाह उस समय किसी अत्यावश्यकीय कार्य में गूंथा हुआ था इस लिय उसने अपने प्रिय-अधान शेख अचुलफजलछ का बुल्ठा कर सूरिमहाराज के आतिथ्य-सत्कार करने की आज्ञा दी | शेख सूरिजी के पास कर अकबर की आज्ञा के विषय मे निवेदन किया और अपने महल में पधारने के लिय सारेजी से प्रार्थना की | सूरिमहाराज उस के महल में पधारे और अपने योग्य उचित स्थान पर शेल की अनुणा ले कर बैठ गये | अबुल-फजल ने प्रथम बड़ी नम्नता के साथ सरिज्ञी से कुशन्द प्रश्षादि पूछे; और बाद में धर्मसंबंधी बाते पूछने छगा कुरान और खुदा के विषय मे उस ने अनेक सवाल जवाब किये जिन का बड़ी

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योग्यता के साथ, युक्तिसंगत अमाणों द्वारा सूरिमहाराज ने खंडता- त्मक जवाब दिया। | सस्मिहाराज के विचार खुन कर अचुछल-फजल बडा खुश इुआ और बोला कि आप के कथन से तो यही सिद्ध होता हैं कि, हमारे कुरान में बहुत सी तथ्यतर बाते लिखी हुई हैं॥।

बातों ही बाता मे मध्याह् का सक्य हो गया देश सूरिजी से कहने छूगाः--- महाराज ! भेजन का समय हे चुका है | यद्यपि आप जैसे निरीह महान्माओं की इदीर की बहुत कम दश्कार रहती हैं तो भी जगन की भल्ताई के छिये थाडा बहुत इस का पोषण करना आवश्यक है | इस लिय किसी उचित अदेश में बेठ कर आप भोजन कर छीजिए शेख के कथन से सूरिजी पास ही में जे कणैराजा का महल था उस मे भाजन करन के लिय गये, जहां पर पहने ही कुछ साथ, गाँव मे से भिक्षाचरी कर छाये थे | सूरिज्ञी संदंव एक ही चार आहार लिया करते थे और वट्ट भी धायः नीरसख !

अपने कार्य सर निवृत्त हो कर बादशाह दरवार में आया और सूरिजी के बुलाने के लिय अवबुछ-फजल के पाल नौकर की भेजा अवुछ-फजअल्ठ सरिमहाराज का साथ में जे. कर दरबार में हाजर हुआ | सरिजी की आते देख कर अकबर अपने सिंहासन से उठा आर कुछ कदम सामने ज्ञा कर बंड भाव से अणास किया बाद- शाह के साथ उस के तीनो पुत्ञा--शरस सल्रीम, मुराद आर शालि- यात्य-न भी तद्लू नमस्कार किया सरिज्ञी ने सब की शुभाशीएं

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दी गुरुजी | चेंग ता हा।+ *' यह कह कर बादशाह ने सरिज्ञी का हाथ पकड़ा आर अपन खास कमरे में ले गया वहां पर किमी गालिल विछे हुए थे इस लिये सूरगिजी उन पर पेर रखने से इन- कार किया ! बादशाह का इस बात पर आश्चर्य हुआ और उस का काग्ण जुट सॉरिजी ने कहा कि--' महाराज ! शायद इन के नीचे काई च्यूटी प्राणि हो ते! म० पर के वजन से वे दब कर जाये इस लिये हमारे शास््रा में मुनिया को एस वस्म्राछलन्न-प्रदेश पर पेर रखने की मनाई की गई है ! बादशाह ने साचा कि ये महात्मा-पुरुष हैं आर शायद इनन्‍्हो ने कही इन दिछानो के नीचे अपनी शल्लानटष्टि से प्राणियों का अस्तित्व जान ता लिया हों। क्‍या कि नहीं ते ऐसी पक्की जमीन पर चूटियें बगेग्ह का स्भव ही केसे हो सकता है? अकबर ने गालिच का एक शिरा उठाया तो देवयाग से उस के नीचे बहुत स्री चूंटिये नज़र पड़ी! बादशाह चकित हो गया। मुनीध्वर के उक्त वचन ने उस के दिल से बड़ा गहरा प्रभाव डाला उस ने वहाँ पर खुबणासन ( सत्राने की स्वर्सी ) रखवाया और मरिजी ले उस पर बेठन की प्राथना की स॒रिमहाराज़ ने यह कर कि--' हम लोक कसी प्रकार के धातु का स्पर्श नहों कर सकते उस््र पर भी बैठने की अनिच्छा प्रदर्शित की खेर, वहों पर शुद्ध आर कारी ज़मीन पर अपना ही शक छोटा सा ऊन का कपड़ा बिछा कर सूरिजी बैठ गये | बादशाह भी उन के सामने वहीं गा- लिखे पर बेठ गयां। अबुल-फजल और थार्नीासह आदि अन्यान्य सभ्य भी अपने अपने उचित स्थान पर बैठ गये | अकबर ने सूरिजी से कुदल-प्रकज्षादि पूछि ओर अपनी तकेसे जो तकलीफ दी गई उमर की माफी मांगी | सूरिमहाराज़ ने उच्चित वाकयों ठारा उस

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+ चज्ना हो गुरुजीति वाफ्यचतुरो हस्ते निज्ञ तत्कग्म्‌ कृत्या सरिवराधिनाय सदनान्‍्तर्ेस्त्ररुद्धाह्षणे ताधच्छीगुर वस्तु पादकमले नारोपयन्तस्तदा वम्धाणामुपरीति भूमिपतिना पृष्टाः फिमेलक गुरो ' |

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लाभ विशेष कर तुझे और तरे जातिभाईयों को मिले, तो इस से अधिक स्ोोभाग्य की बात, तुमारे लिये, और क्‍या हो सकती है ? '' खबाददाह के इन बचनों सर सारा ही सभा-मण्डल रुश खुश ही गया

अकबर ने सरिज्ञी से रास्ते का हाल जानना चाहा परन्तु उस का ठीक उच्तर उन की आर से मिलता देख, पास के किसी अधिकारी को पृछा कि सरग्मिहाराज़ को लेने के लिये कोन आदमी गये थे ?--जो गये हो उन्हें यहां बुलाओ। आधिकारी ने जवाब दिया कि-' हजूर मोन्दी और कमाल नाम के, आप के खुद दुत गये थे | बुलाने पर वे तुरन्त हाजर हुए। बादशाह ने उन से सरिमहाराज की सारी मुसाफिरी का हाल पुछा उन्होंने क्रम से, संक्षेप में, वे सब बात कह सुनाई जो सरिजी के साथ चलते हुए रास्ते में उन्हों ने अनुभूत की थी।चे बोलेः-- हुजूर : ये महात्मा, आज़ काई लग भग छः महिने हुए गंधार-बंदर पेदल ही चले रहे हैं। अपना जितना सामान हें सारा आप ही उठा कर चलते है। ओर किसी का नहीं देते। भिक्षा, गोंव में से, घर घर सर, मांग लाते है ओर जेसा मिला वैसा खा लेते है। अपने निमित्त बनी हुई किसी चीज को छूते तक भी नहीं सदा नीचे ज़मीन पर ही सोते हे रात को काई भी वस्तु मंह में नहीं डालते। चाह काइई इन्हे पूज ओर चाहे कोई गालियां द, इन के मन दोनो समान है। ना किस कभी वर देते है ओर नाही कभी शाप। इत्यादि बालें सुन कर अकबर के साथ सागा ही दरबार आश्चर्य ओर आनंद में निमझ् हो गया | अकबर सरिमहाराज़ पर मुग्ध हो गया और अनेक प्रकार उन की प्रशंसा करने लगा

इस सेंबह परस्पर आलाप-सेलाप होने बाद अकबर अकेले सरिजी को एकानत-महल में ले गया ओर अन्यान्य सभ्यों को, शां-

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तिचन्द्र आदि मुनिवरों के साथ विद्धद्वोष्ठी करन की आज्ञा दे गया। उस पकानत-भवन में सरिमहाराज ने अकबर को अनेक प्रकार का भ्रमोपदेश दिया ईश्वर, ज़गत्‌, सुगुरू और सडद्धमे के विषय में भिन्न भिन्न दृष्टि से सूरिजी ने अपने विचार प्रदर्शित किये जिस्म से अकबर के दिल में बहुत कुछ सनन्‍तोष हुआ। अभी तक तो वह सूरिर्जी के चारित्र पर है मुग्ध हो रहा था परन्तु अब तो उन की विद्व्ता का भी बह कायल हुआ धर्म संबंधी बात चीत हो चूकने पर, अकबर ने सूरिजी की परीक्षा करने के लिये पूछा कि महा- राज़ ! आप सब शाम्त्र के पारगामी हँ-आप से काई बालन छीपी नहीं इस लिये कृपा कर कहिए कि-मेरी जन्म कुंडलि मे, मीन राशि पर जो शनैेश्व आया हुआ ह, उस का मुझे क्या फल हाोगा। : सूरिजी बेलिः-- पृथ्वीश ! यह फलाफल बताने का काम गृहस्थो का हैं जिन्हे अपनी आजीविका चलानी होती हैं वे इन बातों का ज्ञान प्राप्त करते है। हमे तो केवल मोक्ष मार्ग के ज्ञान की अभिल्‍ापा रहती हं जिस सर बह जिन दाएरब्रे( सर प्राप्त हे सकता हे। उसी के खिएय में हमारा श्रवण, मनन ओर कथन हुआ करता ह> अकबर अनेक बाग इस प्रश्न का उद्चारण किया परंतु सूरिजी इसी एक उत्तर के सिवा और कुछ भी अक्षर नहीं बोले सार्यकाल का गमय हैं। आया देख कर बादशाह और मुर्नीश्वर अपने स्थान से ऊंठे आर सभा मंडप में पहुंचे इधर भी शेस्च अवल-फजल और अन्यान्य विद्वान सरिजी के शिष्यो के साथ अनक प्रकार के वाता- विनोद और धर्म-विवाद कर आनन्दित हो गह थे नृपति और मनिपति के आते ही सब मान हुए | बादशाह अबुल्-फजल्ठ का लक्ष्य कर सरिजी की खिद्धडला, निःमस्परहता ऑर पवित्रता की बहुत

« पुरे5नयीवाबानमानुपेयिवान एप मीन तग्णस्तनुरूहः मत्सशवापकरिध्यनि प्रभा क्षित: पतीनामुत नौवतां किमु » गुरूजगा उयानतिपिका दिदन्त्यदी धरार्मिकादन्यद्वैमि वाइमयात। यत' प्रवक्तिग्रृहमधिनामिय मुक्तिमार्गे पेथिकीबभूवष्गम हारसाभाग्य काव्य, राग १४ |

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बहुत सराहना की। शखन भी सूरिमहाराज के शिष्यों की बडी «५ तारिफ की | सभा में वादशाह ने सूरिजी के शिष्यों की संख्या पूछी परंतु सरि महाराज हां, कुछ थडे सर है कह कर अपनी # विभुता नहीं बनाई बादशाह ने पहले ही सुन रकखा था कि स- महागाज़ के दा हजार शिप्य हैं: इस लिये उसने आप हैँ उतने # वबताय, जिस का समथेन थानसिह जी हुजूर . कह कर किया। सभा जितने शिष्य बठे हुए थे उन के नाम बादशाहन पूछे; जिन » का उत्तर पक दुसरे शिप्य न, एक दूसरे का नाम बता कर दिया 7

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प्मसुन्दर नामक-नागपुरीय तपागच्छो-जन यति पर, अकबर का, पू्व(वस्था में बडा प्रेम था। अकबर उसे सदा अपन पास ही रखता था। उस के पुस्तकालय में हिन्दु-ओर जैनसाहित्य की ब- हुत पुस्तक थी यति के मर जान पर वे सब पुस्तके अकबर ने' अपन महलः में रग्॒घली थी. यह विचार कर कि जब कोई सब सस्‍्। अच्छा महात्मा मुझे मिलेगा तब उस््र ये भेंट करूंगा अकबर की हृष्टि में हीगविजयसूरि सर्वेश्व साधु मालम दिये इस लिये उसन अपने बड़े पुत्र युवगाज सलीम सुलनतान द्वारा ये सब पुस्तके महल में सर वहां पर मंगवाई | खानखाना नामक अफसर ने पेटियों भे स्तर पुस्तक निकाल (निकाल कर बादशाह के सामन रकक्‍खी « बादशाह ने सूरिजी सत्र, पुस्तकों का पूबे-इतिहाल कह कर उन्हें छन की प्रा- धना की अकबर बोला कि--' आप सर्वधा निःस्पृह महात्मा हे एस लिये और कं।ई मर पास एसी चीज़ नहा है जो आप का भेट करने योग्य हो केवल एक मात्र ये पुस्तक ही ऐसी हैं जे! आप को ग्राह्म हा। इस लिये इन्हे स्वीकार कर मुझ उपकूत कीजिए सजी ने पुस्तके लेन का इनकार कर कहा कि-- गज़श्वर ! हम ले।का को जितनी पुस्तफे चाहिए उतनी ते हमारे पास है फिर

» गृहादथानायितमड़ जन्मना खानखानन मुक्तमग्नतः | महामरुस्‍्वान्प्रमदादिवापदा मुनीशितुर्ढकयतति सम पुस्तकम | टीरसौस'र्य, सर्ग काव्य, १४

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इन्ह, त्रिन ज़रूरत, ले कर हम क्या करे ? यह भी एक प्रकार का परि ग्रह ही ह॑ परंतु आत्मसाधन मे मुख्य सहायक होने के कारण इन का रखना हमारे लिये उचित है परंतु, आवश्यकता से आधिक रखना ममत्व का कारण होने सर हम इन पुस्तकाी की जरूरत नहा ! '' सूरिमहाराज के बहुत इनकार कर ने पर भी अर्र्त में अबुल- फजल बीच मे पड कर उन्ह पुस्तके लेने से बाध्य किये | सूरिजी ने उन का सादर स्वीकार कर अकबगीय-भाण्डागार / के नाम से आगर मे ग्स्व दी

समय हा ज्ञान सर सूरीश्वर स्वस्थान पर जाने की इजाजत मांगी | बादशाह ने थानलखिह का बुछा कर कहा कि भरे जो खुद शाही बाजे हे उन के साथ, बडी धूमधाम पूर्वक, मुनीश्वर का अपने स्थान पर पहुंचा दौःः | शाही हक्म होते ही सब तयारी की गई शाहीफीोज, बड़ बडे अफसर और अनेक प्रकार के वादित्रों के साथ सूरिमहाराज अपने स्थान पर पहुंचे जेन छेकाने इस बात की बर्डा भारी खुशी मनादे आर हजारों रूपये गरीब-गुग्बों को बॉट दिये गये

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कुछ दिन फतहपुर टहर कर सुनीश्वर चातुमोस करने के लिय आगरा को गये | संवत्‌ १६३५ का चातुर्मास बहीं बिताया मारगे- शिर महिने सृरिजी शोरीपुग्-तीथे की यात्रा करने का गये। कछ समय तक इधर उधर घूम कर फिर वापल आगरा आये। चहां पर चितामाण-पाश्वेनाथ की प्रतिष्ट। की | थ।ड दिन ठहर कर, आगरा से फिर फतहपुर पहुंच | सरिजी का शहर में आये सुन कर अकबर फिर उन से मिलन की इच्छा प्रकट की | अबछ-फजल के महला मे, दूसरी वार स॒रि महाराज मुगल-सपम्राट से मिले।

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घंटा तक धर्म-च्चा होती रही सूरिजी ने प्रजा ओर प्राणियों के हिल के लिये बादशाह को अनेक प्रकार का सद्ोध दिया मद्य और मांस का सवबन नहीं करने के लिये उपदेश दिया गया। पहली मलाकात के समय, सूरिजी की निःस्वार्थ बत्ति ने अकबर के दिल में जिस सद्भाव के बीज़ का बोह दिया थ। वह इस समय की सलाकात से अकरित हो गया ! बादशाह बोल-- मुर्नीश्वर : आपने ज्ञा जा बान मझ , अपने हित के लिये कहीं है वे बिल्कुल ठक हैं ओर आप के कथन का में अवइय आदर करूंगा मेने आप को बडी दूर सर, बहुत कष्ट दे कर