भंवरलाल नाहटा

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मुद्रक--जवाहरलाल लोढा इताम्बर प्रेस, मोतीकटरा-आंगरा

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श्री मद जैनाचायेश्री १००८ श्री जिनकृपाचं द्र सरी श्र जी महाराज के शिष्य प्रवत्तेक मुनि श्री सुखसागर जी महाराज | पर

जन्म संबन्‌ १९४३, दीक्षा संबत १५६१, (६६ भी का कद की हे ण्दूर कर रत फुज करू तप पुनफुपुपफफुफ फृन्कूसू नयूल्‍रनप्रमतत अं

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में छेखक नहीं हैँ अपनी परम प्रिय स्वर्गीय जननी के अतुछू वात्सल्य प्रेम की स्सखृति ही इस छोटी सी पुस्तक के लिखे जाने की कारण भूत हुई है.। उसकी काय कोशछता, सहनशीछुता, दयालुता, पातित्रत आदि गुणों को याद कर हृदय सागर में अनेक तरंगें उठा करती हैं जिसमें से एक ऐतिहासिक सती के चरित्र चित्रण के रूप में प्रकट हुईं एक तरंग को जनता के समक्ष उपस्थित करता हूँ। मेरा यह पहला ही प्रयास है, इसके अनेक दोषों की तरफ ध्यान देकर यदि पाठकंगण इसको अपना कर उत्साहित करेंगे तो सम्भव है कि सुअवसर पाकर अन्य तरंगें भी कभी किसो पुस्तक का रूप धारण करें। इस पुस्तक के संशोधनादि कार्यों में श्रीयुत राव गोपालसिंह जी वेद से पूर्ण सहायता मिली है एतदथ उन्हें हृदय धन्यवाद देता हूँ

निवेदक-- लेखक

सती मुगावती मिशन कल लक लक ते प्रथम परिच्छेद $€ पएा#&#&६शइ---८ भारण्ड पक्षी द्वारा हरण

सी भरतत्तेत्र में वत्स नामक देश में अलकापुरी की उपमा को धारण करनले वाली अत्यन्त रस- णीय, सरोवर, वापी, वाटिकाएँ ओर गगनचुंबी अट्टालिकाओं से सुशोभितत, धन धान्य से परिपूर्ण, कोशाम्बी नामक नगरी थी उस नगरी में महान तेजस्वी, शजन्नुओं द्वारा बिजय को पाया हुआ, राजा शतानीक राज्य करता था। उसके शीलादि गुणों से विमूषित वेशालीपति चेटक महाराज की पुत्री सती मगावती अग्म- महिषी थी। जिसने अपने असाधारण शुणों द्वारा महाराज का मुग्घ कर लिया था। सांसारिक सुखों का उपभोग करते हुए क्रम से रानी को गर्भ रद्द | हृतीय मास में गे के प्रभात से रानी को

[ | दोहद उत्पन्न हुआ कि में रुधिर से भरी हुई वापी (बावड़ी ) में स्नान करूँ; किन्तु यह पाप काये समझ कर किसी के सामने प्रकट नहों किया

अब मगावती दिन पर दिन थकने लगी, क्योंकि उसका दोहनद पूर्ण नहीं हुआ था। रानी को शरीर से क्षीण होते हुए देख कर राजा ने मधुर स्वर से पूछा, “प्रिये | तुम्दारे शरीर में ऐसी कौनसी व्याधि उत्पन्न हुई है ? जिससे शरीर दुबे होता जाता है ।” इस प्रकार पति के विशेष आग्रह से मृगावती ने दोहद की बात उन्हें कही तब राजा ने कहद्दा कि तुम किसी तरह की चिन्ता मत करो में शीघ्र ही तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा। ऐसा कह कर राजा ने युगंधर नामक प्रधान मन्त्री को बुढा कर मृगावती के दोहृद पूत्ति करने के लिये कहा। तब मन्त्री ने छाल रंग के पानी से वापी भरवा कर उसमे रानी के स्नान करने का ग्रवन्ध कर दिया।

रानी सगावती भी हर्षित होकर सपरिवार अनेकों सुभट्ट और दास दासियों के साथ वापी के पास गई और भ्रफुल्छित चित्त से उस वापी में प्रवेश करके स्नान करने छगी

वह ज्योंहदी स्नान करके वापी से बाहिर निकली त्योँह्टी आकाश में उड़ता हुआ एक भारण्ड पन्षी रक्त वर्ण मगावती को मांख का पिण्ड समझ कर ले उड़ा | महारानी को लेकर उड्ते हुए देखकर सब छोग हाहाकार करने लगे ओर मसृगावती भी रो रो कर कहने लगी बचाओ ! कोई मुझे बचाओ! नहीं यह पक्षी मुझे मार डालेगा।

[ है |] लेकिन क्‍या करें, सब विवश थे, उस आकाश गामी पत्ती का पीछा करने को कौन समथे था। बस भारण्ड पक्षी सबके देखते इसना दूर चला गया कि उन छोगों की दृष्टि से अदृश्य हो गया

“हा देती तू कहाँ चली गई, जो कि राज प्रासादों में सुख से काल व्यतीत करती थी; सूये के उदय और अस्त होने तक का भी जिसको पता था, सेकड़ों दास दासियाँ जिसके आगे द्वाथ बांधे खड़ी रहतो थीं; आज़ बहीं मेरी अद्धांब्लिनी मगावती एक क्षुद्र पक्षी का ग्रास हो गइ ।” इस प्रकार राजा को विलाप करते हुए देखकर मन्त्री ने कहा, “हे राजन विलछाप करने से क्‍या हाथ आयगा व्रेथा क्यों काछ विलम्ब करते हैं; शीघ्र ही कोई ऐसा उपाय सोचियें' जिससे पुनः आपको महारानी जी प्राप्त हों ।” ऐसा सुन कर राजा .. ने सब स्थान में, प्रति ग्राम, जंगल और पेतों पर रानी की खोज करवाई छेकिन सृभावती का तो कोई पता ही चला |.

समय व्यतीत हांते देर नहीं छगती, इस प्रकार चौदह बे बीत गये दो भी शतानीक तो रानी को भूला था, दिन रात उसके हृदय में खगावतों का वियोग खटकत्ता था

एक दिन राजा, मन्त्री सामन्‍्तों सद्दित सभा में बेठा था। तब साथ में क्रिसी पुरुष को लिये हुए एक महाजन ने सभा में प्रवेश किया, ओर आते ही राजा को नमस्कार करके एक सोने कारत्न मय कंकण राजा को देकर साथ वाले पुरुष की ओर संकेत करके कद्दा, “मद्दाराज--यह भोऊ इस कंकण को बेच रहा था; में इस

[9४५ ]

पर आपका नाम अंकित देख कर ले आया हूँ ।” राजा ने उस कंकण को पहिचान लिया और हर्षित होकर हृदय से छगा लिया | किन्तु पोछे राजा ने सोचा कि यह सगावती का कंकण इसे क्ष्यों कर मिला, हाय ! वह तो अवश्य मर गई है, अन्यथा इसे उसका कर ऋंकण प्राप्त होना असम्भव था

इस प्रकार चिन्ता में ग्रस्थ राजा ने उस पुरुष से पूछा कि 'तुम कौन हो ? और यह कंकण तुम्हें कहाँ मिला तब उस पुरुष ने हाथ जोड़ कर कहा, “मद्दाराज ! में मलयाचलछ के बन में रहने वाल्म भीम नामक भील हूँ। हाथियों के कुम्भस्थल में रहे हुए नमोतियों का संग्रह करके हार बना कर अपने प्रा्णों से भी अधिक प्यारी भीलनी को पहिना कर प्रफुल्छित होता हूँ। मीठे >े स्स वान्द फलों का भोजन करके जोवन व्यतीत करता हूँ। में एक दिन द्वाथ में खड्ग लिये हुए वन में फिर रहा था, तनत्र चन्दन के वृक्ष पर हलिपटे हुए एक काले साँप को देखा, जो कि अपन मस्तक पर मणि को धारण किये हुए था, मैंने सोचा क्रि इस मणि को अपनी ख्तरी के द्वार के बीच में छगाऊँ तो बहुत अच्छा हो ऐसा विचार कर मैंन ज्यों ही उस साँप को मारने के लिये खड्ग उठाई त्यों ही किधर ही से आवाज़ आई, मत मारो ! मत मारो प्राणियों की हिंसा करने वाले को इस भव में दुःख ओर पर भव में दुर्गंति का _ भाजन हीना पड़ता है। और उसी प्रकार एक जीव कौ अभयदान देने वाले को पर्वत के बराबर स्वणेदान दान के फू से भी अधिक फल होता हैं

कहा भी है कि-- “यो दद्यात्कांचन मेरु, कृत्स्नां चंद दसंधरां एकस्य जीवित दद्यात्‌ नच तुल्य॑ युधिष्टर;॥

अर्थात्‌-हे युधिष्टर ! सोनेका सुमेर पर्वत दान दिया जाय, और इस सारी प्रथ्वी को भी दान में देदी जाय्र, तो भी एक जीव को अभय दान देने के बराबर नहीं हैं

ऐसा सुनते ही मैंने तलवार को तो रखली और इधर उधर देखने लगा। इतने ही में बत्तीस लक्षणवान्‌, अत्यंत सुन्दर बालक ने आकर मुझ से कहा कि तू इसे क्‍यों मारता है ? तब मैं ने उसे कहा कि इस सांप के मस्तक में रही हुई मणि की मुमे आंबश्यक्ता है क्यों कि मोतियों के द्वार के बीच में लगाने की मणि के लिये मेरी खत्री प्रतिदिन मुझे दिक्‌ करती है। तब उस बालक ने दौड़ कर अपनी माता के पास जाकर कहा कि आज में एक सांप को अभयदान दू'गा। इस डिये तुम्हारे हाथ का कंकण मुझे दो पुत्र स्नेह के कारण उसको माता ने उस अपना कंकण दे दिया। उसने वह कंकण छाकर मुझे देते हुए कह्दा-अब इस सांप को मारना | में ने भ्री सोचा कि इस अमूल्य कंकण के सामने नागमणि क्या चौज़ है इसे ब्यर्श क्यों भरूँ? ऐसा विचार कर मैं कंकण को लेकर अपने घर जाया और वह आभरंण स््रीको देदिया। इस कंकण को देख कर बह बहुत प्रसन्न हुई ओर पहन लिया

[ ) इस प्रकार मेरे यहां यह कंकण पांच वर्ष तक रहा | पीछे मेरी ख्री ने वह कंकण मुझे देकर कहा कि तुम कौशास्वी जाओ और इस कंकण को बेच कर मेरे कानों में पद्दिनने के लिये दो कुण्डत्ड छाओ। तब में इस कंकरण. को बेचने के लिये नगरी में आया; मुझे बेचते हुए देख कर ये मुझे यहां ले आये हैं

भील के मुख से इतनी बात सुन कर राजा ने उस को बहुत मा द्रव्य और भीलनी के लिये कानों के कुण्डल देकर सन्तुष्ट किया और कहा “हे पारिधौराज ! तुमने जहां उस दिव्य कुमार को देखा था वहां, तुम आगे चलकर मुझे ले चढछो तो में तरा यह उपकार जन्म भर भूलंगा ओर तुम्हें नाना प्रकार के वस्त्राभूषण दूँगा जिससे तुम अपनी खत्री के साथ सुख से जीवन विताना ऐसा सुन कर वह भील तो आगे हो गया ओर पाछे बेहुत सी सेना के साथ महाराज शतानीक मलया चल जाने के के लिये रवाना हुए मार्ग में तिछक किया हुआ प्रधान पुरुष, कुमारी कन्या, वेद पढता हुआ ब्राह्मण, भेरीनाद, संखनाद, बछड़े सहित गाय, हाथी, सजाया हुआ घोड़ा, मच्छ युगल ओर निधम अग्नि आदि शुभ शकुन मिले। कहा भी है:--

“कन्या गा पूण कुंभ दक्ि मधु कुम्ुम पावक॑ दीप्य पान | यानंवा गो प्रयुक्त करिनुपतिरथः शंख वाद्यध्वेनिवों ।। उत्स्तिप्ता चंद भूधि जलचर मिथुन सिद्धमञ्नं यतियों वेश्या स्री मद्य मांस जनयति सतत मंगल प्रस्थिताना ॥१॥

[ ]] अथोतू--कन्या, गाय, जल से भरा हुआ घड़ा, दद्दी, शहद, फूछ, जछती हुई अग्नि, बेलों से जोती हुईं गाड़ी, द्वाथी, राजाका रथ, संख्र की ध्वनि, बाजिंत्रों की ध्वनि, हु चलने वाली भूमि जलूचर जन्तुओं का जोड़ा, तैयार भोजन, मुनि, वेश्या, सघवाश्नी मदिरा, मांस, इतनी उपरोक्त चीजें प्रयाण करते वक्त सामने मिलें तो शुभ सूचक शकुन है

इस प्रकार शुभ शकुनों से सूचित होऋर मागे उल्लंघन करते हुए महाराज शतानीक उस भील के साथ मल्याचक्त के बंन में पहुँचे | वहाँ बहुत से चन्दन के वृक्ष थे उन वृक्षों पर, जिस प्रकार योगीश्वर ध्यान में बैठे हों, उसी तरह साँप लिपटे हुवे थे #मयूर एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर उड़ कर जा रहे थे; वे मद्दाराज शातानीक फो देख कर नृत्य करने छगे | एवं पवन के वेग से. वृक्ष डालने लगे, वे भी मानो महाराज को नमस्कार करके स्वागत. कर रहे हों; ऐसा प्रवीत होता था। तब उस भील ने कटद्दा--“शजन्‌ यह मलयाचलछ बन है ओर यह वही स्थान है जहाँ उस दिव्य बाछक ने मुझे कर कंकण छाऋर दिया था। अब आप मुझ आज्ञा दीजिये, मैं अपने घर जाना चाहता हूँ; मेरी स्त्री मेरे लिये प्रतीक्षा करती होगी तब राजा ने कहा कि, मुझे तो रानी से वियोग सहते १४ वर्ष वीत गये तुम थोड़ी सी देर में ह्वी क्यों श्ी्रता

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# यद्यपि साँप ओर मयूर का एक स्थान में रहना असम्भव है तो भी यहाँ तापसाश्रम का प्रभाव समझें

[ ८] क्‍ करते हो ? भील ने कद्दा राजन ! यहाँ योगियों के आश्रम हैं, यदि वे मुझ पापी को देख लेंगे तो तत्काछ भस्म कर डालेंगे; परमात्मा की कृपा से आपकी अभिलाषा पूरी हो, में जाता हूँ ऐसा कह वह भील तो अपने स्थान चला गया। अब राजा ने एक तापसों के आश्रम में प्रवश किया जद्दोँ योगियों के तपोब्रछ से सिंह और हरिण एक साथ खेलते थे। उत्तंच--

“सारंगी सिंह शा स्पृशति सुत धिया नंदिनी व्याप्र पोत॑ माजारी हंस बालं प्रणय पर वशा केकि कान्‍्ता झुजंगं।॥ वेशण्या जन्म जाता न्यपि गलित मदा जंतवोःस्ये त्यज॑ति

कक. | योगिन $ रह! त्यक्तवा साम्यक रूढ प्रशमित कलुषष योगिन क्षीण मोह ॥१

अथात्‌ू--जिन श्ान्त स्वभावी क्षीण मोहनीय कर्म वाले योगियों का आश्रय लेकर हरिणी अपने पुत्र की बुद्धि से सिंह के बच्चे से प्यार करती है और गाय व्याप्र के बच्चे से प्यार करती है। प्रेमबती मयूरी साँप से प्रेम करती है। आजन्म से बेर वाले प्राणी भी ढेष को त्याग कर परस्पर प्रेम करते हैं

उस आशभ्रम में आम्र, केला, जंभी री, नारियछ, सुपारी, इला- यर्ची, लौंग आदि नाना प्रकार के वृद्ध थे। पुष्प वाटिका ओर चन्दन वृक्षों की सुगन्ध से वह आश्रम देवों के नन्‍्दन बन को भी जातने वाला था। वहाँ फल फूल आदि का भोजन कर के अपना निर्वाह करने वाले तापसों को देखा, वे एक सुन्दर बालक को राजी कर रहे थे जो कि किसी कारणवश नाराज हो गया था।

[ 3१]

हाँ जाकर राजा ने उन्हें नमस्कार कर के पूछा--“यह बालक कोन है ? इसके साता पिता का क्या नाम है ?” तब एक तपस्वी ने उत्तर दिया राजन्‌ ! यह आश्रम धमे ध्यान तपश्चयों करने का स्थान है। यहाँ अनेकों महात्मा रह कर आत्म साधन करते हें; सब से बड़े योगी का नाम ब्रह्मभूति है। उनका शिष्य विश्वभूति एक दिन गुरु को आज्ञा लेकर ईघन लेने के लिये मखयाचल गया।

उसने वहाँ जाकर एक अत्यन्त सुन्दर खत्री को मूछांगत पड़ी देखी उसे देख कर तपइत्री को करुणा आगई, और शीतलोपचार करके उस सुन्दरी को सचेत किया। वद्द उठते ही विछाप करने. लगी तब विश्वभूति ने कद्दा बहिन ! तुम किसी प्रकार का भय मत करो, में तपस्व्री तुम्हारा भाई हैँ। हमारे आश्रम में चक कर खुशी से रहो जैसे सीता को महर्षि के आश्रम में पुत्र जन्म हुआ था, उसी प्रकार तुम्हारी व्यवस्था करेंगे। उसने भाई के यड़॒ वचन सनते ही सोचा, यदि में वहाँ जाऊँगी तो मुझे किसी प्रकार का सिंह व्याप्रादि जंगली पशुओं का अभय रहेगा। में वहाँ निर्मल शील का पालन करूँगी जिस से बिरह व्यथा दूर हो जायगी, शोल के प्रभाव से मुझे अवश्य ही अपना पति मिलेगा और शीछ ही के प्रभाव से इस भव और पर भव में अक्षय सुख प्राप्त होगा

यथा:--

“शील नाम हणां कुलोन्नति करं, शीलं परंभूषणं शीलं ब्ृप्रतिषाती वित्त मनघं, शीलं सुगत्यादह॥ ..

[ १० ]

'शीले दुगेति नाशनं सुबिषुल, शीत यशः पावन शोल॑ नि ति हत्वनंत सुखद, शौल तु कल्पदुम/॥१॥ अर्थात्‌-त्रक्षचर्य मनुष्यों के कुछ की उन्नति करने वाहां है, ब्रक्षचय उत्कृष्ट भूषण है, अह्यचय अक्षय श्रेष्ट घन है, अह्मचय उत्तम गति में पहुँचाने वाला है, ब्क्मचये दुर्गति का नाश करने वाछा है, अद्यचर्य पविन्न प्रख्यात यश है, ब्रद्मचय अनन्त सुखमय मोत्र हे ओर अद्य वर्य ही कल्प चृक्त है

सती सीता, द्रोपदी, मदन रेखा, दमयन्तो, पश्याववी और ऋषिदसा आदि महासतियों ने शील ही के प्रभाव से सब विध्नों को दूर किया है। ऐसा विचार कर वह विश्वभूति के साथ आश्रम में गई, और तपस्विनियों के साथ रहने छगी क्रमशः गर्भ के दिन पूरे होने से उसके कामदेव के समान रूप लावण्य वाला पुत्र उत्पन्न हुआ पुत्र जन्म के उपलक्ष में वृत्षों ने पुष्पवृष्ठि की पत्ती मधुर ध्वनि गाने छगे, सभी तापस और तापसनियों के हपे का पारावार रहा प्रसूति काय दो जाने के पश्चात्‌ तापस लोग विचार करने छगे कि इस वालक का क्या नाम दिया जाय, इतने

ही में आकाश से देववाणी हुई--

“प्ोणी रक्षण दत्तण पदनता नेक क्षमा धीश्वरः संगीतादिकलाकलापकुशला. तेजस्विनामग्रणी ॥। रुपायास्त मनोमब॒ परिणतः न्यायेक मूर्ति सुधी भावी साहसकांग्रणीरुदयनों, राजाधिराजों हमय॑ ॥१॥

[११ | अर्थात्‌-प्रृश्वी को पालन करने वाले अनेक प्रचण्ड राजाओं का अधीक्वर संगीत आदि कछा समूह में कुझंल, प्रंतापियों में तेजस्वी, रूप में साज्ञात्‌ कामदेव, न्याय की भूत्ति, सॉहसियों में महा साहसी यह उदयन राजाधिराज होगा। इस अकार देववाणीं के अनुसार तपसत्वियों ने उस सुन्दर बालक का नाम उदयन रखा | वह बारूक क्रमशः शुछू पक्त के चन्द्रमा की भांति बढ़ने लगा आचाये श्री ब्रह्ममृति ने उसे सकल कछाओं का अभ्यास कराया जब बहू बालक छोटा था तब तो सब की आज्ञा पालन करता था, ढेक्रिन आज कछ क्षत्रियपन का तेज प्रकट होगया है सिंह आदि पशुओं को बांध देता है एवं - उन्हें मारता भी है जो कि आश्रम के विरुद्ध काय है। किसी तापस ने उसे कह दिया कि रे उदायन ! तुम्हारा पिता तो नगरी में राज्य करता है और तुम्हें कभी याद ही नहीं करता ऐसा सुनकर वह अपने पिता के पास जाने को अत्यन्त ही व्यग्र हुआ। उसकी माता के बहुत मना करने पर भी वह आज़ आश्रम से निकल गया तब तापस विश्व गति उसे राजी करके छाया। हे राजन ! में वही विश्वभूति हूँ एवं यह वही उदयन कुमार है विश्वभूति के मुख से इतनी बात सुन कर राजा ने अत्यन्त हपित होकर अपने पुत्र उदयन को हृदय से छगा लिया इतने ही में हाथ में फल लिये हुये, शरीर में दुबे, वल्कलछ वख्रधारी मगावती आती हुई दिखाई दी। राजा ने सोचा कि में इसे केसे अपना मुख दिखाऊँगा। हद्वाय ! इसका चिरक्रार पयन्त वियोग

[ १३ ] हाने पर भी में जीवित रहा ? बहू तो गर्भवती थी और. अपने बालक का पोषण करने के लिये मेरे विरह में भी जीवित रही | किन्तु में उसके सामने छज्जाजनक हूँ ऐसा विचार कर राजा ने अपने पुरुष को सृगावतों के पास क्षमायाचना के लिये भेजा। इतने में वह स्वतः आकर पति से मिली उस समय सब के हर्ष का पारावार रहा | मृगावती ने कुमार को राजा के चरणों में नमस्कार करन को कहा, तब उसने पुन: विनयपूव के नमस्कार किया।

. राज़ा ने विश्वभूति से प्रार्थना की कि यह सब आपही का उपकार है। में कितना वर्णन करूं, आप ही ने मेरे कुछ की रक्ता की है | तब उन्होंने ने कद्दा राजन ! इस सतो के पुण्य एवं शीछ ही के प्रभाव से सब विपत्तियें दूर हुई

पीछे सब ने मिछ कर महर्षि अह्यभूति को नमस्कार किया

उनका आशोवांद पाकर राज़ा शतानीक अपनी सत्री और पुत्र का लकर नगर को तरफ रवाना हुए

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अनोखा-चित्रकार

का] कौशाम्बी नगरी ध्वजा पताकाओं द्वारा सजाई गई घर घर पर तोरण बैंधे हुए हैं। गलियों में फूल विदे हुए हैं मज्भल भेरियें घाज रही हैं, सघवा खियें मड्डल गीत गा रही हैं सब 5 के हृदय में आनन्द छा रहा है, क्योंकि महा- राज शतानीक अपनी स्त्री और पुत्र उदयन के साथ नगर में गये हैं युगंधर मन्त्री ने राजा को नमस्कार करके कुछ समाचार पूछे, एवं राजा ने भी मन्त्रों से प्रजा के कुशल समाचार पूछे, तब मन्त्री कहा--'महाराज ! आपके प्रताप से यहाँ की सब व्यवस्था ठीक है ।”

महारानी मृगांबदी के आते ही बन्दीवान छोड़ दिये गये एवं महारानी धर्म काये में विशेष प्रवृत्त रहने छूगीं। निरन्तर साधु, साध्वी ओर साधर्मियों की भक्ति करने छर्गीं। एवं राजा भी सृगा- 'बती के धर्म काये में सहयोग देता हुआ न्याय से प्रजा का पालन .करने छगा।

[ १४ |]

एक दिन महाराज शतानीक मन्त्री, सामन्तों सदित राज सभा में बैठे थे तथ वीणा बजाने की कढा में निपुण एक पुरुष ने आकर अपनी कछा दिखाने के लिये वीणा बजाना आरम्भ किया। तब

उदायन कुमार उसके बजाने में अशुद्धियाँ बतढ्ा कर स्वयं वीणा बजाने लगे।

कुमार ने वीणा बजा कर मधुर ध्वनि राजा एवं सब सभा के छोगों को रंजित कर लिया | तब राजा से पूछा, “हे वत्स तुमने यह अद्वितीय कछा कहाँ से प्राप्त की, तब कुमार ने विनय पूर्वक कहा इस कला प्राप्त होने की उत्पत्ति कद्दता हूँ सो सुनिये

एक दिन मेंने अपनी माता के हाथ का कंक्रण किसी भीछ को देकर एक सपे की रक्षा की। तब वह सांप सागकुमार के रूप में प्रकट हुआ और सुझे प्रणाम करके कहने छगा “हे कुमार ! में नाग छोक में रहने वाला मह॒पिक देव हूँ। तुम्दारे दया गुण की परीक्षा करने के लिये यहां आया था। और सांप का रूप धारण करके तुम्हारी परीक्षा ली। तुम्हारे में दया की विशेषता पाकर में बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। हे मित्र ! नाग छोक में मेरी नगरी है, मेरे साथ तुम वहां चछकर अपनी चरण रज से मेरी नगरी को पवित्र करो !”

नाग कुमार के विशेष आम्रह से मैं उसके साथ नाग छोक गया। बह नगरी अत्यंत ही रमणोक थी, जहां:नाना प्रकार के नाटक ह्वो रहे थे, अप्सराएँ नाटक गायन कर रही थी बहां मुझे

[ १५ ]

मर मित्र देव ने बहुत सत्कार सन्मान पूबक रखा थोड़े दिन वहां रह कर मैंने उस देव से कट्टा “हे मित्र ! अब मुझे अपनी माता के पास पहुँचादो, वह मेरे वियोग से अत्यंत दुखित होगी” तब उसने मुझे यह बीणा बजाने की कछा देकर तुरत माला के पास पहुँचा दिया और माता को नमस्कार करके कहा “हे माता ! तुम सरा अपराध ज्ञमा करना, क्यों कि में ने तुम्हें पुत्र वियोग दे कर अगाध दुख दिया है। अब आज से पांच बाद तुम्दें अपना पति मिलेगा, तुम किसी बात की चिन्ता मत करना। बहुत समय तुम राज्य सुख भोग कर चरम तीथर्थकर श्री महावीर स्वामी के पास दीक्षा लेबोगी और चन्दन वाछा गशुरुणी द्वारा शिक्षा पाकर अपनी आत्म निन्दा पश्चात्ताप करते हुए केवल ज्ञान उत्पन्न होबेगा। माता ! में तुम्हारा भक्त सेवक हूँ, कभी काम पड़ने पर मुझे याद करना। ऐसा कहकर वह देव अपने स्थान में चला गया

बीणा बजाने की कला प्राप्त होने की इतनी बात कुमार से सुनकर राजा ने बहुत प्रसन्न होकर कह्दा कि में धन्य हूँ, जिसे ऐसा गुणवान पुत्र प्राप्त हुआ। अन्य दिवस सुबह होते ही मस्तक पर मुकुट और कानों में कुण्डल एवं नाना प्रकार के बहु मूल्य वसत्राभूषण धारण किये हुए मद्दाराज शतानीक अपनी सभा में मंत्री, मंडलिक राजा, सेनापति और सामन्तों सद्दित आकर बेठा अपनी विशाल ऋद्धि देखकर उन्हों ने गबे में. आकर कहा “मेरे दे छोक के सट॒श नगरी है। राज्य की सीमा (अठाईस हज्वार प्राम) भी बहुत विस्तृत है | हाथी घोड़ा, रथ और प्यादों की. सेना भी:बहुत है

[ १६ ]

मणि रह्नादि से तो कोठे भरे हुए हैं मेरा राज्य अठाइस वकार

कर के शोमित है यतः--

“बापी वष्र विहार वर्ण वलिता वास्मी वन बराटिका , बेच ब्राह्मण वादि वेश्य विव॒ुधा वाच॑यमा वच्नकी | विद्या वीर विवेक वित्त बिनया वेश्या वणिक वाहिनी , वस्त्र वारण वाजि वे सरवरं राज्यं वे शोभते” ॥१॥

अथीत्‌--जिस राज्य में वापी, वन (किला), विद्वार (चेत्य), वर्ण (चारों वर्ण के छोग), वनिता, वाचाल मनुष्य, बन, बाग, बगीचा, बंग्र, बाह्यग, बादी, वश्म (हवेंढो) त्रिबुध (देव तथा पंडित), वाचंयम ( साधु ), वल्ड को (वीणा), विद्या, बीर, विवेक, वित्त, विनय, वेइथा, वणिक, वाहिनी ( सेना ), वस्त्र, बारण ( हाथी ), वाजि ( अश्व ) ओर वेसर ( खबच्चर ) इतनो वकारादि श्रेष्ट बस्तुएऐँ हाती हैं, बही शोभा पाता है

अतः मैं सब से विशेष ऋद्धि वाला हैँ | ऐसा सुनकर अनेक देशों में भ्रमण करने वाले एक दूत ने फहा “महाराज | आपका कहना यथार्थ है, आरके यहां जितनी सामग्री है उतनी अन्यत्र कही भी नहीं है, किन्तु द्वो भी कैसे ? क्‍या सूर्य का चेज खद्योतादि में पाया जाता है ? किन्तु जैसे तिलक के बिना स्त्रो का मुख शोभा नहीं देता, वैसे द्वी चित्रों के बिना आपका सभा भवन अच्छा नहीं छगता। मेंने पुष्प शेखर के प्रासाद में किये हुए जैसे चित्र देखे हैं, बेसे किसी भी स्थान में नहीं देखे ।”

[ १७ ]

ऐसा सुन कर राजा ने अच्छे अच्छे त्रित्रकारों फो बुढ़ा कर राज-सभा ग्ें चित्र करने के लिये आज्ञा दी। और एक निपुण चित्रकार को राज-महल चित्र करने के लिये दिया, बह भी चतुयई के साथ दीवाल पर भांति भांति के चित्र करने छगा एक दिन उसने महारानी झ॒गावती के पेर का अंगूठा देख छिया और उम्री के अनुसार रानी का सारा रूप चित्रण कर दिया लेकिन चित्र करते समय जंघा पर एक रंग का छींटा ( तिछ का चिह्न ) पड़ गया उस चिह्न को मिटाने के छिये उसने बहुत परिश्रम किया किन्तु ज्यों ज्यों वह उस को मिद्ाता गया त्यों त्यों वह फिर से रंग का छोंटा पड़ने लगा तब उसने समझ लिया कि उस (म्गावती) की जंघा पर अवश्य तिछ का चिह्न होगा

इतने में राजा चित्रों को देखने के लिये वहाँ आया | उसने रानी का तद्गुप चित्र देख कर चित्रकार पर बहुत प्रसन्नता प्रकट की | एवं अन्यन्न कहीं जाकर केवलछ मृगावती का चित्र देखने लगा। देखते देखते राज़ा को वह तिछ का चिह्द नजर आया। उसे देखते ही तो राजा ने विचार किया कि यह चित्रकार बड़ा दुराचारी है। इसने अवश्य म्गावती से संग किया है। अन्यथा उसको जंबा पर रहे हुये तिछ का इसे कैसे माद्म पढ़ता

क्राध के आवेश में आकर राजा ने चाण्डालों को बुढा कर आज्षा दे दी कि “इस चित्रकार का सिर मुंड कर काछा मुख कर के गधे पर चद्राओ ओर सारे नगर में फिरा कर सूछी पर छठका दो”

[ १८ ]

राजा की आज्ञा के अनुसार चाण्डाल उसे सारे नगर में फिरा कर सूली के पास ले गये ऐसा देख कर नगर के सब चित्रकार एकत्रित हो कर राजा के पास आये ओर नमरकार कर के कहने लगे “स्वामिन्‌ ! आप उस बिचारे को निरपराध मरवा कर वृथा क्यों एक रत्न का विनाश कंरते हैं यक्ष के दिये हुए वर के अनु-

सार उसने यह काये किया है, वह स्बथा निर्दोष है ।” ऐसा सुन कर सूली के पास से उस चित्रकार को बुल्म कर, यक्ष से वर प्राप्त होने के बृत्तान्त पूछा तब उसने कहा "राजन ! में एक दिन अपनी मौसी से मिलने के लिये साकेतपुर गया। उसके एक पुत्र था बह भी चित्रकारी का काम किया करता था। उसी नगर के बाहर कुसुमाकर उद्यान में सुरप्रिय नामक यक्ष का ' मन्दिर था | उस मन्दिर में प्रतिबषे चित्र करवाने पड़ते थे ऐसा नहीं करने से वह यक्ष नगर में नाना प्रकार के उपद्रव करता तब राजा ने सब चित्रकारों के नाम से बारी बांध दी जिस वे में जिस के नाम की बारी होती वही चित्र करता और पीछे उस ' चिन्नकार को यक्ष मार डालता था। उस वषे मेरी मौसी के पुत्र को बारी थी, इसलिये बह बहुत उदास बेठी थी। तब मैंने कहा “माता ! अब को बार चित्र करने के डिये में वहाँ जाऊँगा तुम कुछ चिन्ता करो ।” मेरी मौसी ने कहा “नहीं पुत्र ! तुम और “वह दोनों मेरे छिये एक सरीखे हो, दोनों आँखों में कौन सी अग्रिय हो सकती है। तुम्हारे जाने से: क्‍या मेसी चिन्ता मिद जायगी ।” तब मैंने कहा “साहसिक पुरुषों को किसी प्रकार का

री!

उपद्रव नहीं होता, तुम किसी बात से! मत डरो; में अवश्य ही जीता हुआ बापिस आऊंगा ।”

इस प्रकार मौंसी को समझा बुझा कर मैंने तीन उपवास किये और स्नानांदिं कर के अच्छे वस्त्र पहिने। और चित्र करने की समस्त सामग्री रुकर पस्मात्मा का स्मरण करते हुए यक्ष के मन्दिर में गया.।

मैंने वहाँ जाकर उस यज्ञ का. अत्यन्त सुन्दर वित्रबनाया,खं.. और भो नाता प्रकार के सुन्दर चिञ्बनाये और यक्ष-को पूजा करके बहु भाव भक्ति के साथ. उस. यक्ष की स्तुति की'।. अपनी . स्तुति सुन कर उस देव ने प्रकट हो कर कहा “मैं तुम्हारे पर सन्तुष्ट: हुआ हूँ, तुम कोई बर मांगों” तब मेंने कहा “आप जो, प्रति वर्ष एक आदमी को मारते हैं; यहः कार्य आप जैसे. उच्च कोषि के देवों: को. शोभा नहीं देता, इसलिये अब से. आप किसी. भी पुरुष को हिंसा करें बस, में यही वस्दान चाहता हूँ ।. उसः ने: यह. बावा स्वीकाश कर के फ़िर कोई बर मांगने को: कहा तब मैंने।उस से प्रार्थना की “मुझे एक ऐसा वरु दीजिये कि मैं. किसी:के: शरीर का एक अवयव देख लने'पर भी. उसका सारा? रूप; चित्रितः कर दूँ |! ऐसा खुन करू वह देव “तथारंतु” कहः कर अन्‍्तध्योन हो गया ।! बस उसी के. अनुसार मैंने. रानी! का सिफ, एक अंगूठा देख, कर उसका सारा रूप चित्रण. कर दिया था। यदि आपको. प्रत्तीति न: होदें तो; कोई परीक्षा. कीजिये: |:

[*० |]

इस प्रकार चित्रकार ने अपनी राम कहानी राजा से कह सुनाई | यद्यपि राजा का क्रोध तो इतने पर भी झान्त हुआ था तो भी मन्‍्त्री और सभा जनों के विशेष आम्रह से एक वार परीक्षा करना मंजूर किया। तब मन्त्रो ने कुईबजा नामक दासी का सास शरीर वस्त्र से आच्छादित कर के केवल उसका एक अवयव 'दिखछाया जिस से उस चित्रकार ने कुब्जा दासी का सारा रूप चित्रित कर दिया। ठो भी राजा ने उसका दाहिना हाथ काटन का हुक्म दे दिया। ऐसा अन्याय देख कर मन्त्री ने राजा को बहुत समझाया, किन्तु उन्होंने एक सुनी उस चित्रकार का हाथ कटवा कर राजा ने अपने देश से निकाछ दिया।

$६ तृतीय परिच्छेद $& “-«“+ +४८ 4 - करतूत

अझ है वह चित्रकार क्रोधातुर होकर साकेतपुर गया और कर तीन उपवास करके उस यज्ञ की आराधना को | तब 5६ यक्त ने प्रकट होकर वर दिया कि “तुम बांये द्वाथ से

१४ भी दाहिने हाथ की तरह चित्र कर सकोगे” ऐसा कह . (कर वह अन्तध्यान हो गया।

उस चित्रकार ने विचार किया कि राजा छातानीक ने मुझे बिना अपराध दुःख दिया है ।इसलिये उसके बेर का अवश्य बदछा ढेना चाहिये जिस प्रकार नदी के तट पर रहे हुए वृक्त का उन्मूल होते बिलम्ब नहीं छगता उसी प्रकार राजा झतानीक का नाश फर दूँ गा। उसके प्राणों से भी अधिक प्रिय रानो झगावती है, धस उसी के सुडोछ रूप को चित्रत करके परखी-छम्पट महाराज चंडर अयोतन को दिखत्णडैंगा, जिससे बह अपने आप ही शतानींके का बिनाक् कर छाढेगा।

[२२

'ऐसा विचार करके वह्द चित्रकार उज्जैन नगर गया। वहाँ 'डसने रानी झगावती का, एक चित्र पट बना कर महाराज चण्ड- प्रद्योतन को दिखाया वह उसे देखते ही मोहित होकर कहने छगा-- “यह पूर्णिमा के चन्द्र की भांति मुख वाली, अत्यन्त छावण्यमयी किसी अप्पसरा या विद्याधरी का चित्र है ? है चित्रकार ! तुम्हें मुंह मांगे दाम दूँगा, सत्य कहो तुमने किस सुन्दरी का रूप देख कर यह चित्र बनाया है ?”

तब उस चित्रकार ने अवसर देख कर कट्टा--“राजन्‌ ! यह चित्र काशाम्त्री फे महाराज शतानीक की रानी म्ृगावती का रूप देख कर किंचित मात्र चित्रित किया है। उनका यथाथे रूप तो स्वयं विधाता भी चित्रण करने को असमर्थ है।” ऐसा सुन कर राजा ने सोचा कि जिस प्रकार चम्पक वृत्त बिना बगीचा शोभा नहीं देता, उसी प्रकार ऐसी रूपवतती स्त्री के क्िना मेरे अन्तःपुर में कुछ भी नहीं है। जब तक इसे अपनी अद्धाआ्लिनी के रूप में देखूं तब तक मुझे चेन नहीं ऐसा विचार कर उसने मृगावतोी के लिये छोह जंघ नामक दूत कौशाम्बोपति शतानीक के पास भेजा

वह दूत कौशाम्बी नरेश की सभा. में आकर उनसे कहने छगा “राजन ! विश्व विजयी, प्रचण्ड शक्तिशाली, अयवन्तीनाथ महा- राज चण्डप्रदोतन ने आपकी रानी सगावती को भपनी अद्धान्नलिनी बनाने के लिये बुलाया है, क्योंकि पृथ्वी के सभी रत्न पदार्थ उन्हीं सम्राट योग्य हैं ओर मगावती भी नारियों में श्रेष्ठ होने के

क्‍ [ रह

कारण उन्हीं के योग्य है, इसलिये शीघ्र ही उन्‍हें मेज दीजिये: अन्यथा उन्हें चढ़ाई करके यहाँ आते ही देखना | उनकी सेना और खऋद्धि के सामने आप कौनसी गिनती में हैं। यदि जीविंतव्य की आशा हो तो एक मिनिट भी विरूम्ब करके शीघ्र मृगावती को भेज दें। नहीं तो वे स्वयं आवेंगे तक आपको पराजय होकर देनां पड़ेगा, इस से तो यही ठीक है कि आप चुप चाप उनकी आज्ञा का पाछन करें ।”?

ऐसा सुनकर महाराज शतानीक क्रोधातुर होकर कहने छगे; “रे दूत ! उस नरपशु चण्डप्रद्योतन को क्या भूत छग गया है? सो ऐसा कहते हुए शर्म भी आई, जिस प्रकार हाथी के कुम्भ- स्थल में स्थित मुक्ताओं को निकाछू कर कौआ नहीं धारण कर सकता ओर पंगु पुरुष मेरु शज्ग पर नहीं पहुँच सकता, उसी प्रकार वह मेरी स्त्री को स्वप्न में भी नहीं छे सकता। तेरे स्वामी को यदिं कल्याण की इच्छा हो तो इस कुचेष्ठा को भूल जाय, नहीं तो पर- स्त्री म्पट रावण और पदओत्तर की तरह दुदंशा होबेगी। रे निछज्ञ दूत ! तूने भी उसके कुत्सित विचारों का सन्देशा कद्दने का दुस्साहस किया है, इसलिये यदि तुम्हें भी जीने की आशा दो वो. दुम दबा कर. शीघ्र भाग जाओ अन्यथा तुम्हारी मैं भी भांति दुदेशा करूँगा ।” हे

ऐसा सुनवे द्वी दूत तो बह्ाँ से चम्पत हुआं। उसने वापिस उज्जैनी आकर महाराज चण्ड्प्रधोतन से सारा वृत्तान्त कद्दू सुनाया।

[ रह -ु दूत के वचन सुनकर वह शतानीक पर आग बबूछा हो गया, और कौशाम्बी पर चढ़ाई करने के लिये रण-मेरी बजवा कर सेना तेथ्यार की

पाँच छाख घोड़े, दो छाख हाथी, दो छाख रथ और सात करोड़ पैदछ सेना के साथ महाराज चण्डप्रद्योतन उज्जैनी से रवाना हुआ सेना के पैरों की धूलि से सूर्य चन्द्रमा को आच्छादित करता हुआ, पेरों की आवाज़ से शेष नाग को भी कंपाता हुआ और मार्ग के सब देशों के राजाओं द्वारा सन्मान पाता हुआ, महाराज चंण्ड- प्रयोतन कोशाम्बी के निकट पहुँचा

शञ्जु की सेना को नगरी के पास आते हुए देख कर उदायन कुमार ने नगरी के सब दरवाजे बन्द करवा दिये। ओर खूब साव- धानता से रहने छगा। प्रवछ शत्रु चण्डप्रयोतन ने आकर चारों ओर से नगरी को घेर लिया

इधर महांराज शतानीक को अतिसार रोग उत्पन्न हो गया, जो कि दिनों दिन असाध्य होता जाता था | वे अपने कृत्यों का पंश्चात्ताप करने लगे कि “मैंने व्यथ ही उस चित्रकार का द्वाथ कंटवाया, जिसका आज यह परिणाम हुआ कि सभों के चित्त में अशान्ति ही अश्ञान्ति देखने में आती है ।”

संती सृगावती भी ऐसा देख कर अपने रूप की निन्‍्दा करने डगी “द्वाये ! यंह अन॑थ का मूल सौन्दर्य मुशे क्‍यों मिला ! जिससे

[ २५ 3 मेरे लिये छोंखों प्राणियों की हिंसा होवेगी, अहो ! मुंझे थिंकंकार

है और संसार में कुरूपा स्त्रियें धन्य हैं, जो कि सुख से अपना शी पाछन कर सकती हैं

अपने पति को मरणान्त व्याधि देख कर सृगावती उनके पास आकर कहने छगी “हे नाथ ! यह संसार दुखों का मूठ है, आप आर्त रौद्र ध्यान को छोड़ कर मन को वश में रखिये। मेरा शी खण्डन और नगरी पर अधिकार कोई नहीं कर सकता। चण्ड- प्रद्योतत तो बाहर पड़ा है, उसकी आप कुछ भी चिन्ता करें, नगरी की रक्षा कुमार अच्छी तरह से कर रहा है। आप निरन्तर परमात्मा श्री अरिहन्त प्रभु का ध्यान हृदय में घारण किये हुए रहें, परभव सुकृत्य रूपी संबरल ही साथ चलेगा। हे स्वामिन ! अनादि काल से संसार में परिभ्रमण करते हुए जीव को मनुष्य भव प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। यदि पा भी लिया तो धर्म सामग्री मिलना तो अत्यन्त ही दुलेभ है। इस लिये मानव जीवन की शेष घड़ियें धम ध्यान में ही बितावें सब प्रांणी मांत्र से राग हंष दूर करके चौरासो छक्ष जीवायोनि से क्षमा याचना करलें। और अपने हृदय में शुभ भावनाओं का समावेश करें। आप को अरिहन्त, सिद्ध, सुसाधु और केवली प्ररुपित धर्म का शरणा होवे। इस अढाई द्वीप में आभरण के समान विहरमान ( विच्रते हुए ) अरिहन्त तीर्थकरों को नमस्कार करके कह ४४ २/में कंध्याणका ५8 जझोर मोक्ष को देने वाढे उपरोक्त चारों शरणों कं पेय में फ्र॑गण करो।

[ २६ |] क्‍

इस प्रकार मृगावती द्वारा शुभ भावनाओं की देशना से धर्म आराधना कर के महासज झतानीक का देहान्त हो गया उनका अग्नि संस्कार हो जान के बाद तत्वों को जानने वाली मृगावती ने मन में किसी भी प्रकार का शोक छाकर निर्मेछ शील का पालन करने लगी

अब प्रजा के दुख को दूर करने के लिये मगावती ने एक दूती को बुछाया और उसे भरत भांति समझा बुझा कर महाराज चण्ड प्रयोवन के पास भेजा उसने जाकर कह “राजन ! मृगावती ने मेरे साथ जो आपके प्रति संदेश भेजा है वह सुनिय--अब मेरा पति तो मर गया है, में आप ही के आधीन हूँ, आपके साथ युद्ध करने को कौन समथ है ? किन्तु अभी तक उदायन कुमार बालक है उसके लिये आप मेरे कहें मूजब व्यवस्था कर दें तो में आपकी आज्ञा पालन करने को तेयार हूँ मेरी यही इच्छा है कि आप कुमार के लिये एक अच्छा गढ़ बनवा कर खूब सेना सामग्री दे दें, जिस से यह शज्रुओं द्वारा अपना बचाव कर सके; क्योंकि आपका नगर तो बहुत दूर है शत्रुओं का उपद्रव होने पर आप शीघ्र कोशाम्बी नहीं सकेंगे

इस प्रकार दूती के वचन सुन कर बिना युद्ध किये ही अपना काये सफल होते देख कर चण्ड प्रद्योतन ने एक खूब संगीन गढ़

बनवाना प्रारम्भ कर दिया। थोड़े ही दिलों में क़रिला तैयार हो जाने पर राजा ने सब प्रकार की सामग्री उज्जैन से मंगवा कर घनधान्य

हज

[ २७ से भर दिया और सेना भी बहुत सी दे दी। और छक दूती को बुठा कर सगावती के पास भेजी

उस दूती ने आकर कहा “स्वामिनी ! महाराज चण्ड प्रयोतन ने आपकी अभिलाषा पूर्ण कर दी, अब आप भी उनकी इच्छा पूरी कोजिये।” तन्न मृगावती ने कहा “सुनो ! यदि तुम्हारे राजा की अभी तक पाप कम में प्रवृत्ति है तो वह क्या राज्य कर सकेगा ? ऐसा करने से लोक में निन्‍्दा होवेगी, क्‍योंकि पराई कन्या तो सर्वत्र मांगने की नीति है किन्तु परश्ली की याचना कभी नहीं की जा सकती | मेंने तो काल बिलम्ब के लिये ही यह कार्य किया था कभी सूय पश्चिम में भी उदय हो जाय तो भी सृगावती अपना शील खण्डन नहीं कर सकती |

दूती ने सब्र वृत्तान्त जाकर चण्ड प्रद्योतन से कहा। वह सुनते हो पश्चाचाप करने छगा “हाय ! मेंने बिना सोचे विचारे ही काय कर डाला, अब क्या किया जाय। सेना उनको बहुत सी दे दी और गढ़ भी नया करवा दिया है जिससे में उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता |

राजा को ऐसा पश्चात्ताप करते हुए देख कर मन्त्री ने कहा “राजन ! अन्याय से कभी काये की सिद्धि नहीं हो सकती अब पश्चात्ताप करने से क्‍या द्वाथ आवेगा ? इस प्रकार मन्त्री के सम- झाने बुझाने से राजा चण्ड प्रद्योतन चुप चाप बेठ गया नहीं तो कर ही क्‍या सकता था

[ २८ ] सती मृगावतो बहुत उत्सव आडम्बर के साथ उदायनकुमार का राज्याभिषेक कर दिया। अब वह नीति से प्रजा का पालन करने लगा

उदायन को राज काये में निपुण देख कर मुगावती ने विचार किया कि अब यहाँ भगवान श्री वद्धमान स्वामी पधारे तो में उनके पास चारित्र अहण करके अपना आत्म-कल्याण करूँ।

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$8 चतुर्थ परिच्छेद #€

केवल ज्ञान ओर निवांण -...८६६-#-४८६----

(४४०१ कि शक समय परमात्मा श्री महावीर स्त्रामी केवली शी | अरिहन्त अबस्था में विचर कर भव्य जीवों का प्रतिबोध देते हुए कोशाम्बी के उद्यान में पधारे | तथ्य वायु कुमार देवों ने एक योजन ( मीछ ) भूमि साफ़ की मेघकुमार देवों से उस स्थान पर सुगन्धित जल को वृष्टि की। इस प्रकार सब देवों ने भक्तिपूर्वेक अपना अपना कारये सम्पादन कर के रजत, हेम, मणिरत्नमय, तीन गद और बारह परषदा वाले समवसरण की रचना की करोड़ों प्राणी उसी समवसरण में आकर शान्ति के साथ बेठ गये। राजा वण्ड प्रद्योतत भी नगर के बाहर घेरी हुई सेना को दूर करके प्रभु के समवसरण में आया (

प्रभु के आगमन का शुभ समाचार सुन कर महारानी मृगा- व॒ती के हृदय में हर का पारावार रहा। वह भी अपने पुत्रादि परिवार के साथ भगवान्‌ की देशना सुनने के लिये आई, और ' अश्लु को दीन प्रदक्षिणा देकर दन्दना कर के बैठ गई

[ ३० “इतने ही में एक भील# पल्लीपति. ने आकर प्रभु को वन्दन कर के पूछा “या सा” तब उत्तर में प्रभु ने कहा “सा सा” इतना

ननना+क >जअापण-+:

# वसन्तपुर नगर में अनंगसेन नामक एक स्वणकार रहता था | वह अत्यन्त विपयी था; उसने एक एक से अधिक रूफ्वती थांचसौ स्त्रियों सेविवाह किया, किन्तु वह हर दम उन्हें घर ही में रखता था कभी भी बाहर जाने देता था। एक दिन वह किसी' स्वजन सम्बन्धी के यहाँ का निमन्त्रण- होने के कारण भोजन: करने के लिये गया। तत्र पीछे से उसकी स्त्रियों के विचार क्रिया कि आज हमें अवसर मिछा है, स्वतन्त्रतापूवक परस्पर क्रीड़ा कर। ऐसा विचार कर के सभों ने स्नान विलेपन' आदि कर के वस्त्र, आभरणों से अपने शरीर को सुसज्जित किया | और हाथ में दपण लेकर अपना अपना रूप निरीक्षण करता हुई परस्पर कहने: छगी कि अपना स्वामी जिस दिन जिस को. वारी होती है उसे ही आभूषणादि से सुशोमित करता है, बाकी स्त्रियों को. शृड्ठार भी नहीं करने देता, अत: आज स्वेच्छापूव क्रीड़ा करनी' चाहिये.। .. .. इतने ही में. उनका स्वामी वापिसः गद्य उसको: अपनी

स्त्रियों की ऐसी स्वच्छन्दता देख कर बहुत क्रोध आया और एक स्त्री को पक्रड़ कर उस के ममंस्थान में प्रहार क्रिया जिस, से बह: लत्काछ मर गई।

. तब बाको स्त्रियों ने सोचा कि जैसे इसने एक कोः मारा वैसे ही सभों को मार डाछेगा: इससे तो यही- ठीक है कि इसी को मार

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[३१ ]]

सुनते ही वह बेराग्य प्राप्त हो कर देशना सुनने के लिये बैठ गया।

तब गणधर श्री गौतम स्वामी ने प्रभु से निवेदन किया “हे! शग- बन्‌ ! इसने आपको